हर शहर की अपनी एक कहानी होती है कुछ कहानियां वक़्त की गर्द में खो जाती हैं, तो कुछ अपने किरदारों की वजह से सदियों तक ज़िंदा रहती हैं। हमारी और आपकी ज़िंदगी में भी ऐसी अनगिनत दास्तानें बसी होती हैं कुछ गुमनाम, तो कुछ मशहूर, लेकिन हर कहानी में एक किरदार छुपा होता है और हर किरदार अपने आप में एक नई दास्तान कहता है।
उर्दू अदब के सुनहरे दौर में एक ऐसा फ़न पनपा जिसने सिर्फ़ कहानी कहना नहीं, बल्कि सुनने वालों के दिलो-दिमाग़ पर एक तिलिस्मी दुनिया आबाद करना सिखाया। यह फ़न था दास्तानगोई।
दास्तानगोई वो जादुई कला है जहां लफ़्ज़ हवा में तैरते हैं, आवाज़ें लहरों की तरह बहती हैं और सुनने वाला अपने आसपास की दुनिया भूलकर किसी और ही जहान में दाख़िल हो जाता है।
18वीं और 19वीं सदी में जब यह फ़न अपने उरूज पर था, तब दास्तानगो महफ़िलों में बैठकर अमीर हमज़ा, अयारी और तिलिस्म जैसे किरदारों को इस तरह ज़िंदा कर देते थे मानो वो आंखों के सामने चल-फिर रहे हों।
उनकी ज़ुबान से निकला हर लफ़्ज़ जादू रखता था। हर ठहराव में सस्पेंस होता था और हर अदायगी में एक रूहानी कैफ़ियत। मगर वक़्त की धूल ने इस कला को धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया। दास्तानगोई तकरीबन दफ़्न हो चुकी थी। लेकिन हर महान फ़न की तरह इसकी रूह कभी मरी नहीं… बस ख़ामोश हो गई थी। और आज वही रूह एक बार फिर नई नस्लों के बीच सांस ले रही है।
दास्तानगोई : एहसास और तख़य्युल का सफ़र
दास्तानगोई महज़ कहानी सुनाने का फ़न नहीं, बल्कि एहसास, तख़य्युल और इंसानी जज़्बात को ज़िंदा करने का ज़रिया है। पल्लवी शाही कहती हैं कि दास्तान एक ऐसा खूबसूरत ज़रिया है जो सिर्फ़ जानकारी नहीं देता, बल्कि इंसान के जज़्बात को भी झकझोर देता है। कहानी ख़त्म होने के बाद इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है। वह महसूस करता है, समझता है और फिर एक बेहतर इंसान की तरह फैसले लेने की कोशिश करता है।
कभी मुग़ल दौर की महफ़िलों में और कभी पुराने शहरों की चौपालों में यह फ़न लोगों को घंटों बांधे रखता था। दास्तानगो अपने अंदाज़-ए-बयां से एक पूरा शहर, एक पूरा जहान आबाद कर देते थे।

सैयद साहिल आगा कहते हैं
“दास्तानों से अगर गुज़रो, कई किरदार मिलते हैं…
गए वक़्तों की ड्योढ़ी पर खड़े कुछ यार मिलते हैं…”
उनके मुताबिक दास्तानगोई दरअसल गुज़रे हुए ज़मानों से मुलाक़ात का नाम है। यह एक ऐसा सफ़र है जहां इंसान अतीत को महसूस करके फिर आज की दुनिया में लौटता है।
दास्तानगोई और सिनेमा का रिश्ता
वक़्त बदला, ज़माने बदले, मगर इंसान का किस्सों से रिश्ता कभी कम नहीं हुआ। यही वजह है कि बॉलीवुड और सिनेमा में भी कहानियों की बादशाहत हमेशा कायम रही। मशहूर फ़िल्मकार Muzaffar Ali मानते हैं कि दास्तानगोई हमारी क़दीमी विरासत है। उनके मुताबिक दास्तानगोई और सिनेमा दोनों कहानी सुनाते हैं, मगर दोनों का अंदाज़ अलग है।

सिनेमा में कैमरा, संगीत, प्रोडक्शन डिज़ाइन और कई दूसरे फ़न इस्तेमाल होते हैं, जबकि दास्तानगोई एक अकेले इंसान का फ़न है। दास्तानगो अपनी आवाज़, लहजे और अल्फ़ाज़ से ही सुनने वाले के ज़ेहन में पूरी तस्वीर बना देता है।
जहां-ए-ख़ुसरो से नई पहचान तक
जहां-ए-ख़ुसरो जैसी महफ़िलों ने दास्तानगोई को एक नई पहचान दी। इसी सफ़र में सैयद साहिल आगा ने इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अहम काम किया।
साहिल आगा बताते हैं कि दास्तानगोई में सबसे अहम चीज़ “सहर” यानी जादू पैदा करना है। यह ज़रूरी नहीं कि कहानी में जादूगर हो, बल्कि सुनाने वाले के अंदाज़ में ऐसा असर होना चाहिए कि सुनने वाला उसी दुनिया में खो जाए।
अमीर ख़ुसरो से शुरू हुआ सफ़र
दास्तानगोई की जड़ें हिंदुस्तान की सूफ़ियाना रवायतों में भी मिलती हैं। माना जाता है कि इस फ़न की शुरुआत सूफ़ी शायर Amir Khusro से जुड़ती है। उनके उस्ताद Nizamuddin Auliya की महफ़िलों में किस्से, मसनवियां और सूफ़ियाना कलाम सुनाए जाते थे। यही सिलसिला आगे चलकर मौसीक़ाना दास्तानगोई की शक्ल में भी सामने आया, जहां संगीत और कहानी एक-दूसरे में घुल गए।
डॉ. नीता पांडे मानती हैं कि सूफ़ी संगीत और दास्तानगोई में गहरी समानताएं हैं। दोनों ही फ़न इंसान को सोचने, महसूस करने और अपने-अपने अंदाज़ में मतलब निकालने की आज़ादी देते हैं।

दास्तान-ए-अमीर हमज़ा और उर्दू अदब
मुग़ल बादशाह अकबर को दास्तानों से इतनी दिलचस्पी थी कि उन्होंने दास्तान-ए-अमीर हमज़ा की बाकायदा तस्वीरें तैयार करवाईं।
18वीं और 19वीं सदी में जब यह फ़न उर्दू ज़बान में मक़बूल हुआ तो अदब और पेशकश का ऐसा मेल पैदा हुआ जिसने दास्तानगोई को बुलंदी पर पहुंचा दिया। लखनऊ के मशहूर Munshi Nawal Kishore ने दास्तानों को इकट्ठा कर उन्हें छपवाने का काम शुरू किया। दास्तान-ए-अमीर हमज़ा के कई वॉल्यूम तैयार हुए और यह फ़न लोगों के बीच और मशहूर होता चला गया।
अंग्रेज़ी हुकूमत और दास्तानगोई का पतन
मगर अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में हालात बदल गए। दास्तानगोई की महफ़िलें धीरे-धीरे उजड़ने लगीं।
साहिल आगा बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने उन तमाम आर्ट फ़ॉर्म्स पर पाबंदियां लगाईं जिनमें एक इंसान बोलता हो और लोग इकट्ठा होकर उसे सुनते हों। क्योंकि दास्तानगो अपने किस्सों में इतिहास, बादशाहों और आज़ादी की रूह ज़िंदा रखते थे।
दिल्ली, आगरा और लखनऊ जैसे शहरों में कई दास्तानगोओं को सज़ाएं दी गईं।
1923 तक आते-आते मशहूर दास्तानगो Mir Baqar Ali के दौर में यह फ़न तकरीबन ख़ामोश हो चुका था।
दास्तानगोई में उर्दू रूह की तरह
दास्तानगोई की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती उसकी ज़बान है। यह सिर्फ़ कहानी सुनाने का अंदाज़ नहीं, बल्कि उर्दू तहज़ीब की जीती-जागती तस्वीर है।
डॉ. शम्स इक़बाल के मुताबिक किस्सागोई और दास्तानगोई सदियों पुराना फ़न है, जिसकी जड़ें अरब, फ़ारस और हिंदुस्तान की मिली-जुली तहज़ीब में मौजूद हैं।
साहिल साहब कहते हैं कि दास्तानगोई में उर्दू सिर्फ़ एक भाषा नहीं, बल्कि उसकी रूह है। अगर यह रूह खत्म हो जाए, तो दास्तानगोई सिर्फ़ एक खाली जिस्म बनकर रह जाएगी।
आज जब लोग स्क्रीन की तेज़ रफ़्तार दुनिया में जी रहे हैं, तब भी दास्तानगोई अपने लफ़्ज़ों के जादू से लोगों को ठहरना, सुनना और महसूस करना सिखा रही है।
यही वजह है कि सदियों पुराना यह फ़न आज भी ज़िंदा है… और शायद हमेशा ज़िंदा रहेगा।
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