उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं बल्कि एहसास, रूहानियत और दर्द की गहरी तस्वीर बन जाती है। ऐसा ही एक नाम था बेख़ुद बदायूंनी । उनका असली नाम मुहम्मद अब्दुल हई सिद्दीकी था, लेकिन अदबी दुनिया उन्हें “बेख़ुद बदायूंनी” के नाम से जानती है। “बेख़ुद” यानी वह शख़्स जो इश्क़, दर्द या रूहानी कैफ़ियत में खुद को भूल जाए। उनकी शायरी में यही बेखुदी, यही दर्द और यही नर्मी साफ़ दिखाई देती है।
बेख़ुद बदायूंनी की पैदाइश 17 सितंबर 1857 को बदायूं के एक मशहूर सिद्दीकी ख़ानदान में हुआ। यह परिवार इल्मी, सूफ़ियाना और अदबी माहौल के लिए जाना जाता था। कहा जाता है कि उनके बुज़ुर्गों का रिश्ता ईरान और दिल्ली सल्तनत के दौर से जुड़ा हुआ था। घर का माहौल ऐसा था जहां इल्म, तसव्वुफ़ और शायरी सांसों की तरह मौजूद थे। शायद यही वजह थी कि बचपन से ही उनके अंदर अदब का ज़ौक पैदा हो गया।
उन्होंने शुरुआती तालीम हासिल करने के बाद कानून की पढ़ाई की और वकालत भी की। मुरादाबाद और शाहजहांपुर में उन्होंने कुछ वक़्त तक वकालत की, लेकिन उनका दिल इस पेशे में पूरी तरह नहीं लगा। आख़िरकार उन्होंने सरकारी नौकरी का रास्ता चुना। पहले राजस्थान की रियासत सिरोही और फिर जोधपुर रियासत में ऊंचे ओहदों पर काम किया। हालांकि नौकरी की दुनिया में रहते हुए भी उनका असली रिश्ता शायरी और अदब से ही बना रहा।
बेख़ुद बदायूंनी की शायरी का सफ़र भी बेहद दिलचस्प है। शुरुआत में वह मशहूर शायर अल्ताफ़ हुसैन हाली के शागिर्द बने। हाली, मिर्ज़ा ग़ालिब के सबसे बड़े शागिर्दों में माने जाते थे। कहा जाता है कि “बेख़ुद ” तख़ल्लुस भी हाली साहब की सलाह पर ही चुना गया था। लेकिन कुछ समय बाद बेखुद ने हाली से अलग होकर दाग़ दहेलवी की शागिर्दी अपना ली। दाग़ देहलवी उस दौर के सबसे बड़े उस्ताद शायरों में गिने जाते थे। बेखुद ने उनसे सिर्फ़ शायरी नहीं सीखी, बल्कि लफ़्ज़ों की नज़ाकत और एहसास की गहराई भी सीखी।
दाग़ देहलवी की मौत के बाद उनके कई शागिर्द ख़ुद को उनका असली वारिस साबित करने में लग गए, लेकिन बेख़ुद इन बहसों से दूर रहे। उनकी शख़्सियत में एक तरह की सादगी और ख़ामोशी थी। यही वजह थी कि उन्होंने अपनी शोहरत के लिए कभी कोशिश नहीं की। यहां तक कि उन्होंने अपना दीवान भी बहुत देर से, साल 1910 में प्रकाशित किया, जबकि उनकी ज़्यादातर शायरी उससे कई साल पहले लिखी जा चुकी थी।
उनकी शायरी में दर्द, मोहब्बत, रूहानियत और इंसानी जज़्बात की गहराई दिखाई देती है। उनके अशआर पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई दिल की बात बहुत सादगी से कह रहा हो।
“दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए
दोस्ती दुश्मनी न हो जाए”
इस शेर में मोहब्बत का डर, रिश्तों की नाज़ुकियत और दिल की बेचैनी बड़ी खूबसूरती से नज़र आती है।
“रक़ीबों का मुझ से गिला हो रहा है
ये क्या कर रहे हो ये क्या हो रहा है”
इन अल्फ़ाज़ में इश्क़ की हल्की सी शरारत भी है और दर्द की मिठास भी। यही अंदाज़ बेख़ुद बदायूंनी को दूसरे शायरों से अलग बनाता है।
उनकी मशहूर किताबों में “होश-ओ-ख़िरद की दुकान”, “सब्र-ओ-शकीब की लूट”, “मरआत-उल-ख़याल” और “अफ़साना-ए-बेख़ुद” शामिल हैं। हालांकि उनकी शायरी आज आम लोगों के बीच उतनी मशहूर नहीं रही, लेकिन उर्दू अदब के जानकार आज भी उन्हें बड़े एहतराम से याद करते हैं।
इसकी एक वजह यह भी मानी जाती है कि बेख़ुद बदायूंनी ने कभी खुद को मशहूर करने की कोशिश नहीं की। वह दिल्ली और लखनऊ जैसे बड़े अदबी मरकज़ों से दूर जोधपुर में रहे, इसलिए उनकी शायरी उतनी तेज़ी से लोगों तक नहीं पहुंच सकी। यहां तक कि उनके कई अशआर दूसरे शायरों के नाम से भी मशहूर हो गए।
1912 में बेख़ुद बदायूंनी इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब की महफिलों में ज़िंदा है। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत की नरमी, सूफ़ियाना एहसास और दिल का दर्द आज भी उसी तरह महसूस होता है, जैसे एक सदी पहले होता था। बेख़ुद बदायूंनी उन शायरों में शामिल हैं, जिनकी आवाज़ वक़्त के शोर में दब तो गई, लेकिन कभी ख़त्म नहीं हुई।
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