बारिश के बाद जब आसमान में इंद्रधनुष खिलता है, तो उसके हर रंग में एक अलग कहानी छिपी होती है। ठीक वैसा ही रंगों से भरा संसार था लोक कवि Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली)। उनकी कविता में मालवा की मिट्टी की ख़ुशबू थी, गांवों की धड़कन थी, बेटियों का दर्द था, वीरों की शौर्यगाथाएं थी और इंसानियत की ऐसी आवाज थी, जो धर्म और सरहदों से कहीं ऊपर उठकर बोलती थी।
“मालवा देश” शब्द आज भले थोड़ा अनजाना लगे, लेकिन इस इलाके की लोक काव्य परंपरा में बुज़ुर्गों ने इस धरती को हमेशा “देश” कहा। “जंगल देश ना ब्याहीं मेरी मां” जैसी दर्द से भरी पुकार करने वाली बेटियों के दुख, भाइयों की बेबसी और पिता के टूटते मन को यहां की कवीशरी परंपरा ने बड़ी खूबसूरती से सहेज कर रखा। जब भी मालवा की कवीशरी की बात होती है, ऐसा लगता है जैसे बारिश के बाद आसमान में फैली सतरंगी पिंग को निहार रहे हों।
चाहे मेहराज वाले भाई भगवान सिंह हों, करनैल सिंह पारस रामूवालिया हों, किशोर चंद बद्दोवालिया की किस्सागोई हो या Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) की कवीशरी — हर रंग अपने भीतर एक अलग संसार समेटे हुए है।
Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) सिर्फ़ कवि नहीं थे, वो दिलों को जोड़ने वाले शायर थे। जगराओं के पास अखाड़ा गांव की ओर जाने वाले पुल के पास उन्होंने लंबा समय बिताया। शायद इसलिए आज भी लगता है कि उस पुल का नाम “बाबू रजब अली पुल” होना चाहिए। क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी कविता के ज़रिए इंसानों के बीच अदृश्य पुल बनाने में गुज़ार दी।
1973 में पहली बार उनकी शायरी से मुलाक़ात हुई। लुधियाना के विद्वान डॉ. आत्म हमराही और कोटकपूरा के डॉ. रुलिया सिंह सिद्धू के कोशिशों से गुरदेव सिंह साहोके वालों के कवीशरी जत्थे ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, अमृतसर में Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) की रचनाओं के रंग बिखेरे। 1975 में पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह और विद्वान डॉ. अतर सिंह पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनसे मिले। कुछ महीनों बाद ये लोक कवि हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया, लेकिन उसकी आवाज़ आज भी मालवा की हवाओं में सुनाई देती है।
“कोई देश पंजाबों सोहणा ना” लिखने वाले Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) के लिए मालवा सिर्फ़ एक इलाका नहीं, बल्कि पंजाब की आत्मा था। नहरी विभाग में नौकरी करते हुए उन्होंने इस धरती के कण-कण को महसूस किया था। उनकी कविता में खेतों की हरियाली, गांवों की ख़ुशबू, रिश्तों की गर्माहट और समाज की सच्चाइयां साफ दिखाई देती हैं।
उनकी रचनाओं को सहेजने का काम भाषा विभाग पंजाब और डॉ. आत्म हमराही ने किया। बाद में पक्का कलां के कवीशर सुखविंदर सिंह स्वतंत्र ने उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। रंगीला रजब अली, अनमोल रजब अली, अलबेला रजब अली जैसी कई किताबों के ज़रिए उन्होंने इस लोक कवि की विरासत को ज़िंदा रखा।
Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) की ख़ासियत सिर्फ़ उनकी भाषा नहीं थी, बल्कि उनका नज़रिया भी था। गुरु अर्जन देव जी की शहादत लिखते समय वो धर्म की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं। एक मुस्लिम परिवार में पैदा होने वाले ये कवि जब गुरु अर्जन देव जी को तपती तवी पर बैठा देखता है, तो उसकी कविता इंसानियत की आवाज़ बन जाती है। वो दौर ऐसा था जब हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सबके लिए असली दुश्मन अंग्रेज़ हुक़ूमत थी। यही वजह है कि बाबू रजब अली ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों पर भी लिखा।
उनकी कविता की सबसे बड़ी ताक़त उनका लोक से जुड़ाव था। महाभारत का किस्सा लिखते हुए भी वो पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू साथ लेकर चलते हैं। ऐसा लगता है जैसे वो ख़ुद कुरुक्षेत्र के मैदान में मौजूद हों और आंखों देखा हाल सुना रहे हों।
Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) ने शब्द किताबों से नहीं, बल्कि लोक ज़िंदगी से सीखे थे। इसलिए उनके शब्द सीधे दिल में उतरते हैं। बीबी हरनाम कौर और हरफूल सिंह सूरमा जैसे स्थानीय नायकों पर लिखते समय वे मालवा की बहादुर बेटियों और वीरों की तस्वीर हमारे सामने खड़ी कर देते हैं। उनकी कविता में औरत सिर्फ़ एक किरदार नहीं, बल्कि ताक़त और साहस की पहचान बनकर सामने आती है।
उनकी शायरी में दर्द है, विरह है, प्रेम है, वीरता है और ज़िंदगी की सादगी भी। वो शब्दों को ऐसे इस्तेमाल करते थे जैसे कोई चित्रकार रंगों को करता है। हर पंक्ति एक नया रंग खोलती है, हर छंद एक नई तस्वीर बनाता है। शायद यही वजह है कि आज भी मालवा में सैकड़ों कवीशर Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) का कलाम गाते हैं। मोहम्मद सदीक से लेकर सतिंदर सरताज तक उनकी रचनाओं को अपनी आवाज़ दे चुके हैं।
Babu Rajab Ali (बाबू रजब अली) की कविता में धरती खुद बोलती है। वो अपने दुख सुनाती है, अपने लोगों के गुण गाती है और उनकी कमियों को भी छिपाती नहीं। यही कारण है कि उनकी शायरी सिर्फ़ कविता नहीं, बल्कि मालवा की मिट्टी की ज़िंदा आत्मकथा बन जाती है।
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