जिस जिस ने प्रेम किया होगा, हो ही नहीं सकता कि उसने निपट अकेलेपन की चाह न की हो. यह अकेलापन एक आदिम चाह है, दुनिया की नाइंसाफी के खिलाफ प्रेमियों की अनसुनी दुआ है. इस इच्छा को जिस तरह पीलू शायर की साहिबां ने जबान दी है, वैसा दुनिया के किसी साहित्य में नहीं मिलता.
एक होते थे सर रिचर्ड टेम्पल. कंपनी बहादुर की नौकरी के सिलसिले में भारत आये थे. संग्रहालयों और लोक कथाओं में ख़ास दिलचस्पी रखने वाले रिचर्ड को आगे जा कर अंडमान जैसी बीहड़ जगह का चीफ कमिश्नर बनाया गया. भारत के जिन जिन इलाको में रिचर्ड की पोस्टिंग हुई उन्होंने वहां की कहानियां इकठ्ठा कीं और ऐतिहासिक महत्त्व के संग्रह तैयार किये. अंडमान की बोलियों और भारत के मुहावरों के कोष बनाये.
1879 में पंजाब के कैंटोनमेंट मजिस्ट्रेट के तौर पर काम करते हुए उन्होंने पंजाब की लोककथाओं को जमा करने की नीयत से इलाके भर के मीरासियों को तलब किया और संसार चंद-फ़तेह प्रकाश, सस्सी-पुन्नू, राजा रतन सेन, पूरण भगत जैसी तमाम कथाओं को लिपिबद्ध किया. तीन खण्डों में प्रकाशित उनकी ‘द लेजेंड्स ऑफ़ द पंजाब’ में सबसे आकर्षक है चार सौ बरस पुरानी मिर्ज़ा और साहिबां के उद्दाम प्रेम की दुखद त्रासदी.
मकतब में साथ-साथ पढ़ते हुए छोटी उम्र में दोनों की मोहब्बत होती है. उनकी मंगनी भी हो जाती है. पूरे इलाके में कोई बहादुर-बांका नहीं है जो मिर्ज़ा जैसी तीरंदाजी कर सके न कोई स्त्री है जिसकी खूबसूरती साहिबां के हुस्न से टक्कर ले पाए. कुछ पारिवारिक विवादों के चलते मंगनी तोड़ कर साहिबां की शादी कहीं और तय कर दी जाती है. वह अपने वफादार नौकर करमू बरहमन के हाथ इस खबर को मिर्ज़ा तक पहुंचवा देती है. मिर्ज़ा के घर उसकी बहन की शादी चल रही है. उसके माँ-बाप उसे बहुत समझाते हैं, तमाम तरह के अपशकुन घटते हैं लेकिन वह अपनी बक्की घोड़ी पर सवार होकर अपनी माशूका से मिलने झंग गाँव पहुँच जाता है. यहीं उसकी ननिहाल भी है. घर में कैद कर दी गयी साहिबां को उसके कमरे से बाहर निकाल लाने के उद्देश्य से वह जाम लुहार से एक हजार लोहे की कीलें बनवाता है. इन्हीं कीलों को दीवारों पर ठोंकता हुआ वह उस तक पहुंचता है और भगा ले जाता है. उनके भागने की खबर फीरोज डागर साहिबां के बाप खीवे खान को देता है. क्रोधित होकर साहिबां का भाई और होने वाला खाविन्द प्रतिशोध लेने को उनका पीछा करते हैं.
उधर दोनों प्रेमी खुद को सुरक्षित जान एक पेड़ के नीचे सुस्ता रहे हैं. मिर्ज़ा तो बाकायदा सोया हुआ है. दूर से आती घोड़ों की टापों को सुनकर सहमी हुई साहिबां मिर्ज़ा से कहती है कि उसका भाई आ रहा है और उन्हें भाग जाना चाहिए. अपनी बहादुरी और तीरंदाजी-कौशल पर इतराता मिर्ज़ा कहता है कि उसके तरकश में रहने वाले तीन सौ बाण उसके भाई और उसके साथियों को छलनी कर देंगे और फिर से सो जाता है.
साहिबां के सामने एक तरफ भाई है दूसरी तरफ प्रेम. वह एक निगाह सोते हुए मिर्ज़ा पर डालती है और उसके सारे तीर तोड़ देती है. मिर्ज़ा मारा जाता है. कहानी के अनेक उपलब्ध संस्करणों में इसके बाद हुई साहिबां की मौत के अलग-अलग किस्से हैं – किसी में उसे मार डाला जाता है किसी में वह टूटे हुए तीरों को अपने सीने में भोंक कर आत्मघात कर लेती है.
हाफ़िज़ बरखुरदार द्वारा फारसी में लिखे गए यूसुफ-जुलैखा के किस्से की तर्ज पर इस कथा को पीलू शायर ने लिपिबद्ध किया था. पहली कहानी 1090 ई. की लिखी गयी है जबकि पीलू शायर ने इसे 1625 ई. के आसपास लिखा था.
पंजाब की धरती मेहनत और मोहब्बत की धरती रही है. हीर-रांझा और लैला-मजनूं भी इसी मिट्टी से जन्मे थे. शताब्दियों से सैकड़ों प्रेमगाथाएं पंजाब की फिजा में सुवास घोलती रही हैं और उसके संगीत का प्राण बनी हुई हैं.
दलेर मेंहदी और हनी सिंह के योयो संगीत को पंजाब का प्रतिनिधि संगीत समझ बैठने की भूल कर सकने वालों ने तुफैल नियाजी की गई हीर सुननी चाहिए, उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान के गाये पंजाबी लोकगीत सुनने चाहिए.
फिलहाल मिर्ज़ा साहिबां की कथा में वापस लौटता हूँ. मिर्ज़ा से मिलने को तड़पती हुई साहिबाँ मुकीम के हुजरे शाह की मजार पर दुआ मांगती है:
“हुजरे ज़ाह मुकीम दे, इक जट्टी अर्ज़ करे
मैं बकरा देणीयां पीर मेरे सिर दा साईं मरे
पंज सत्त मरण गवांढणा, रैंदियां नू ताप चढ़े
हट्टी सड़े कराड़ दी, जित्थे दीवा नित्त बले
कुत्ती मरे फकीर दी, जिहड़ी टऊं टऊं नित्त करे
गलियां होवण सूणीयां, विच्च मिर्ज़ा यार फिरे”
यानी – “अय मुकीम के हुजरे शाह, यह लड़की तुम्हारे दरबार में अर्ज करती है कि अगर मेरा होने वाला स्वामी मर जाए तो मैं बकरा चढ़ाऊंगी. यूं कर दो कि मेरे और मिर्ज़ा के बारे में बतकही करती रहने वाली पांच सात औरतें मर जायें और बची खुची औरतों को बुखार आ जाए. उस बनिए की दुकान जल जाए जिसमें रात भर दिया जलता रहता है जिसकी रोशनी के कारण मुझसे मिलने आता हुआ मिर्ज़ा सभी लोगों को दिख जाता है. फ़कीर की वह कुतिया मर जाए जो हरदम भूँकती रहती है. सारी गलियां सूनी हो जाएं ताकि मैं और मेरा यार उनमें बेखटके फिरा करें.”
अनंत काल से एकांत खोज रहे प्रेमी युगलों ने कैसी-कैसी दुआएं की होंगी. दिल को चटखा कर रख देने वाली साहिबाँ की जैसी दुआ शायद ही कभी किसी ने की हो!
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अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।
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