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नाटक ‘लोई’ का शानदार मंचन– जिसने दिल भी जीता और सोच भी बदल दी

मुंबई में हाल ही में हुए हिंदी नाटक लोई की शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। Mumbai के मशहूर Veda Kunba Theatre में जब यह नाटक मंचित हुआ, तो ऐसा लगा जैसे 15वीं सदी का बनारस दर्शकों के सामने जीवंत हो उठा हो।

इस नाटक को मशहूर शायर और गीतकार Pratap Somvanshi ने लिखा है और इसका निर्देशन Akashaditya Lama ने किया, जबकि सह-निर्देशक के रूप में Vikram TDR जुड़े रहे। नाटक के गीतों का संगीत प्रसिद्ध संगीतकार Kuldeep Singh ने तैयार किया, जिसने पूरे नाटक में एक अलग ही रूहानी माहौल बना दिया।

लोई – महज़ कबीर की पत्नी नहीं, एक मज़बूत आवाज़ भी

इतिहास में अक्सर लोई को सिर्फ़ संत Kabir की पत्नी के रूप में याद किया जाता है। लेकिन इस नाटक ने उनकी एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की। यहां लोई एक ऐसी औरत के रूप में सामने आती हैं, जो समाज की गलत परंपराओं, पितृसत्ता और धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ खड़ी होती है।

नाटक में लोई को एक बहादुर औरत के रूप में दिखाया गया है, लोई पूरे हौसले और बेबाकी के साथ पंडितों, मौलवियों और सुल्तान Sikandar Lodi के सामने खड़ी होती है। वह औरतों के हक़, बराबरी और इंसानियत की बात करती है।

नाटक का एक बेहद असरदार लम्हा तब आता है, जब लोई खुलकर Kabir के कुछ दोहों पर भी सवाल उठाती है ख़ासकर वे, जो औरतों को कमतर दिखाते हैं। उसका यह जज़्बा सिर्फ़ हिम्मत नहीं, बल्कि सोच की गहराई और दलील की ताक़त भी दिखाता है।

नाटक अपने शिखर पर तब पहुंचता है, जब सुल्तान सिकंदर लोदी के दरबार में लोई की आवाज़ गूंजती है। वह हिंदू-मुस्लिम फ़साद, समाज में फैली नफ़रत और औरतों पर हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ़ गरजती है।

नाटक का सबसे बड़ा आकर्षण इसके संवाद हैं, जो सीधे दिल पर असर करते हैं। लोई का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री ने ग़ज़ब का अभिनय किया। उनके चेहरे के हाव-भाव, आवाज़ की मज़बूती और आत्मविश्वास ने दर्शकों को बांध कर रखा।

Source: DNN24

इसके अलावा विक्रम TDR, मिताली नाग, मुकुल नाग, अदिति मिश्रा, पुनिश त्रिपाठी, सोहैल मालिया, मेहरिन सबा, अपूर्वा महेश, रेशमा मेस्त्री, दुर्गेश, प्रतीक महाले और अरुणोदय वाजपेयी जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों में जान डाल दी। हर कलाकार का अभिनय बहुत स्वाभाविक और असरदार लगा।

इंसानियत का पैग़ाम

नाटक का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि यह सिर्फ़ इतिहास की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि आज के समाज को भी आईना दिखाता है। हिंदू-मुस्लिम एकता, औरतों के अधिकार और इंसानियत जैसे मुद्दों को बहुत ही सादगी और असर के साथ पेश किया गया है।

Akashaditya Lama के निर्देशन ने पूरे नाटक को एक मज़बूत रफ़्तार दी और आखिर तक दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखी। वहीं Pratap Somvanshi के लिखे संवादों में हल्का-सा उर्दू का रंग भी नज़र आता है, जो नाटक को और भी ख़ूबसूरत बना देता है।

Source: DNN24

दर्शकों की तालियों ने बना दिया यादगार पल

नाटक खत्म होते ही पूरे थिएटर में तालियों की गूंज सुनाई दी। मुंबई के थिएटर प्रेमियों ने इस प्रस्तुति को बहुत सराहा। लोई सिर्फ़ एक नाटक नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी है जो बताती है कि औरत की आवाज़ कभी कमज़ोर नहीं होती- बस उसे सुनने वाला समाज चाहिए।

यह प्रस्तुति सचमुच दिल को छू लेने वाली रही और यह उम्मीद जगाती है कि ऐसे नाटक हमारे समाज में मोहब्बत, बराबरी और इंसानियत का पैग़ाम फैलाते रहेंगे।

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