आज जब हम Olympic में भारतीय महिला खिलाड़ियों को मेडल जीतते देखते हैं, तो ये सफ़र हमे काफ़ी आसान लगता है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब किसी भारतीय महिला का Olympic तक पहुंचना ही अपने आप में इतिहास बन जाता था। आज पीवी सिंधु, कर्णम मल्लेश्वरी, मनु भाकर, मैरी कॉम, साक्षी मलिक, मीराबाई चानू, साइना नेहवाल और लवलीना बोरगोहेन जैसी खिलाड़ी दुनिया के मंच पर भारत का नाम रोशन करती हैं। लेकिन इस पूरी कहानी की शुरुआत एक ऐसी महिला से हुई, जिसने सबसे पहले Olympic में भारत को रिप्रेंज़ेंट किया और वो नाम है नोरा पॉली।
जब एक भारतीय महिला ने पहली बार Olympic में कदम रखा
नोरा पॉली की पैदाइश साल 1894 में ब्रिटिश राज के दौर में भारत में हुई। उनका असल नाम नोरा मार्गरेट फिशर था। बचपन का बड़ा हिस्सा उन्होंने यूनाइटेड किंगडम में अपने भाई-बहनों के साथ बिताया। 1901 के आसपास वो स्कॉटलैंड में रहती थी और 1911 में इंग्लैंड के ईस्टबॉर्न के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की। साल 1915 में उन्होंने ब्रिटिश सैनिक सिडनी ट्रेपास पॉली से शादी की।
शादी के बाद जब उनके पति की पोस्टिंग भारत में हुई, तो 1921 में नोरा भी वापस भारत आ गई। इसके सिर्फ़ तीन साल बाद उन्होंने ऐसा काम किया, जिसने भारतीय खेल इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। 1924 के पेरिस Olympic में हिस्सा लेकर नोरा पॉली भारत की ओर से Olympic में खेलने वाली पहली महिला बन गई।
पेरिस Olympic में नोरा पॉली का प्रदर्शन
पेरिस Olympic में नोरा पॉली ने टेनिस की महिलाओं की सिंगल्स और मिक्स्ड डबल्स कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया। मिक्स्ड डबल्स में उनके कॉम्पिटेटर सिडनी जैकब थे। महिलाओं की सिंगल्स कॉम्पिटिशन में उन्हें पहले राउंड में बाई (खिलाड़ी को पहला राउंड खेले बिना ही सीधे अगले राउंड में जाने का मौका मिल गया) मिला। दूसरे राउंड में उनका मुकाबला ग्रीस की लेना वलाओरिटू-स्कारामागा से हुआ।
शुरुआत में वो पीछे रही, लेकिन उन्होंने शानदार वापसी करते हुए मैच 1-6, 6-3 और 6-2 से जीत लिया। हालांकि तीसरे राउंड में उनका सामना स्पेन की मशहूर खिलाड़ी लिली अल्वारेज़ से हुआ और उन्हें 6-0, 6-3 से हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद तीसरे राउंड तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि माना गया। आज भी ये प्रदर्शन भारतीय महिला टेनिस खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल की तरह देखा जाता है।
मिक्स्ड डबल्स में नोरा पॉली और सिडनी जैकब की जोड़ी को पहले राउंड में बाई मिला था। दूसरे राउंड में उनका मुकाबला आयरलैंड की जोड़ी हिल्डा वालिस और डार्सी मैक्रिया से हुआ। ये मुकाबला काफ़ी रोमांचक रहा, लेकिन आखिर में भारतीय जोड़ी 9-7, 4-6, 9-7 से हार गई। नोरा पॉली Olympic में भारत की पहली महिला रिप्रेज़ेंट बनने की वजह उनका नाम हमेशा भारतीय खेल इतिहास में याद किया जाएगा। 1988 में वो इस दुनिया से रुख़सत हो गई, लेकिन उनका वो एक साहसी कदम आज भी याद दिलाता है कि हर बड़ी कहानी की शुरुआत एक छोटे से क़दम से होती है।
लेडी मेहरबाई टाटा: एक दिलचस्प नाम
भारतीय खेल इतिहास में नोरा पॉली का नाम Olympic में हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय महिला के तौर पर दर्ज है। लेकिन Olympic के पुराने रिकॉर्ड में एक और दिलचस्प नाम मिलता है लेडी मेहरबाई टाटा का। Olympic डेटाबेस में उनका नाम 1920 और 1924 Olympic के रिकॉर्ड में दिखाई देता है। बताया जाता है कि 1924 के पेरिस Olympic में उन्हें मोहम्मद सलीम के साथ मिक्स्ड डबल्स टेनिस में खेलना था, लेकिन रिकॉर्ड के मुताबिक दोनों ही बार उन्हें “नॉन-स्टार्टर” बताया गया, यानी वो कॉम्पिटिशन में हिस्सा नहीं ले पाई।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक “मेहर टाटा” दरअसल लेडी मेहरबाई टाटा ही हो सकती हैं।
वो मशहूर उद्योगपति दोराबजी टाटा की पत्नी थीं। दोराबजी टाटा भारतीय खेलों के बड़े समर्थक थे और बाद में भारतीय ओलंपिक संघ के पहले अध्यक्ष भी बने। मेहरबाई टाटा न सिर्फ एक बड़े उद्योगपति परिवार से जुड़ी महिला थी, बल्कि वो Women Empowerment की भी मज़बूत आवाज़ थी। उन्हें टेनिस खेलना बेहद पसंद था और उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कई टेनिस कॉम्पिटिशन जीते थे। उनकी पैदाइश 10 अक्टूबर 1879 को मुंबई में हुई और 18 जून 1931 को वेल्स में उनका इंतकाल हुआ।
नीलिमा घोष: स्वतंत्र भारत की पहली महिला ओलंपियन
पेरिस Olympic 1924 में नोरा पॉली के खेलने के बाद भारत की किसी महिला को Olympic में फिर उतरने के लिए पूरे 28 साल इंतज़ार करना पड़ा। आख़िरकार ये मौक़ा 1952 हेलसिंकी Olympic में आया, जब पहली बार चार भारतीय महिलाओं ने Olympic में देश को रिप्रेंज़ेंट किया। इनमें से एक थी नीलिमा घोष, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की पहली महिला Olympic एथलीट बनकर इतिहास रच दिया।
इससे पहले 1928, 1932 और 1936 के Olympic में भारत की कोई महिला खिलाड़ी शामिल नहीं थी। फिर आया 1948 का लंदन Olympic , जो आज़ाद भारत का पहला Olympic था। भारत ने इसमें 79 खिलाड़ियों का दल भेजा, लेकिन हैरानी की बात ये थी कि उस टीम में एक भी महिला शामिल नहीं थी। आख़िरकार 1952 में ये तस्वीर बदली। उस साल भारत की ओर से चार महिलाओं ने हिस्सा लिया नीलिमा घोष, मैरी डी’सूजा, डॉली नाज़िर और आरती साहा।
हेलसिंकी ओलंपिक: एक नई शुरुआत
ओलंपिक में एथलेटिक्स की प्रतियोगिताएं तैराकी से पहले शुरू हुई। 21 जुलाई 1952 को महिलाओं की 100 मीटर दौड़ का पहला हिट हुआ, जिसमें नीलिमा घोष ने हिस्सा लिया। वही मैरी डी’सूजा नौवें हीट में दौड़ीं। इस तरह सबसे पहले ट्रैक पर उतरकर नीलिमा घोष ने इतिहास रच दिया और स्वतंत्र भारत की पहली महिला ओलंपिक एथलीट बन गई। उस समय उनकी उम्र सिर्फ़ 17 साल थी। इतनी कम उम्र में ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश को रिप्रेंज़ेंट करना अपने आप में बड़ी बात थी।
नीलिमा घोष ने 100 मीटर दौड़ 13.60 सेकंड में पूरी की और अपनी हीट में पांचवें स्थान पर रही। हालांकि वो क्वार्टर फाइनल में नहीं पहुंच सकी, लेकिन उनकी ये दौड़ भारतीय खेल इतिहास में हमेशा याद की जाती है। क्योंकि उस दिन सिर्फ़ एक दौड़ नहीं हुई थी उस दिन भारतीय महिलाओं के लिए ओलंपिक के रास्ते की शुरुआत हुई थी।
मैरी डी’सूजा और दूसरी खिलाड़ी
21 साल की मैरी डी’सूजा ने 100 मीटर दौड़ में 13.10 सेकंड का समय लिया, जो थोड़ा बेहतर था। लेकिन इसके बावजूद वो भी अगले राउंड तक नहीं पहुंच पाई। हालांकि बाद में उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल की। दो साल बाद 1954 एशियन गेम्स में उन्होंने रिले रेस में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। साल 2013 में उनके योगदान के लिए उन्हें ध्यानचंद पुरस्कार से नवाज़ा गया।

हेलसिंकी 1952 ओलंपिक में मैरी डी’सूजा सेक्वेरा
हेलसिंकी ओलंपिक में मैरी डी’सूजा ने 200 मीटर दौड़ में भी हिस्सा लिया। यही वो कॉम्पिटिशन था, जिसमें उन्होंने 1951 एशियन गेम्स में रजत पदक जीता था। लेकिन ओलंपिक में 26.30 सेकंड का समय उन्हें हीट से आगे नहीं ले जा सका। वहीं नीलिमा घोष ने 80 मीटर बाधा दौड़ में भी हिस्सा लिया। इस रेस में उन्होंने 12.90 सेकंड का समय निकाला और अपनी हीट में आख़िरी स्थान पर रही। कुछ ही दिनों बाद आरती साहा सिर्फ़ 11 साल की उम्र में ओलंपिक में उतरने वाली अब तक की सबसे कम उम्र की भारतीय खिलाड़ी बन गई।
एक छोटी शुरुआत, जिसने रास्ता खोल दिया
1952 हेलसिंकी ओलंपिक में भले ही कुश्ती में केडी जाधव का ऐतिहासिक कांस्य पदक और भारतीय हॉकी टीम का लगातार पांचवां गोल्ड मेडल सुर्खियों में रहा, लेकिन नीलिमा घोष, मैरी डी’सूजा और आरती साहा जैसी खिलाड़ियों की भागीदारी भी एक बड़ी शुरुआत थी। 1924 में नोरा पॉली ने जो रास्ता बनाया था, उसी पर चलते हुए इन महिलाओं की मौजूदगी सिर्फ़ प्रतीक भर नहीं थी। ये एक मज़बूत नींव थी, जिस पर आगे चलकर भारतीय महिला खिलाड़ियों की नई पीढ़ियां खड़ी हुई और दुनिया में अपनी चमक बिखेरी।
ये भी पढ़ें: Shahid Bashir: कश्मीर के मल्टी-स्पोर्ट्स कोच का ओपन ग्राउंड से नेशनल स्टेज तक का सफ़र
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।


