“DBD Enterprise” आज ये नाम असम में भरोसे, क्वालिटी और पारंपरिक स्वाद की पहचान बन चुका है। लेकिन इस नाम के पीछे एक ऐसी कहानी है, जो बताती है कि बड़ी कामयाबी हमेशा बड़े पैसों से नहीं, बल्कि बड़े हौसले से मिलती है। सिर्फ 500 रुपये से घर की रसोई में शुरू हुई ये छोटी सी कोशिश आज एक सफल फूड प्रोसेसिंग ब्रांड बन चुकी है। ये कहानी है Dalimi Deka की जिन्होंने लिमिटिड रिसोर्सिस में भी बड़े सपने देखने की हिम्मत की और उन्हें सच करके दिखाया।
घर की चार दीवारों से बाज़ार तक का सफ़र
गुवाहाटी के कालीपाड़ा इलाके में एक घर का एक छोटा-सा किचन। वही किचन आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुका है। यही से दालिमी डेका ने अपने सपनों को नई दिशा देनी शुरू की थी। वो याद करती हैं, “मैंने 500 रुपये लेकर शुरुआत की। कोई 100 रुपये का सामान ले जाता था, तो उसमें से थोड़ा-बहुत मुनाफा मिलता था। कभी दुकान में दिया, कभी लोगों ने चखकर लिया। उस समय मैंने पैसों के बारे में ज़्यादा नहीं सोचा, बस ये सोचा कि काम कैसे आगे बढ़े।”
शुरुआत में न कोई मशीन थी, न कोई स्टाफ। हर सुबह मसालों की खुशबू के साथ दिन शुरू होता था। अपने हाथों से अचार काटना, मसाले मिलाना, धूप में सुखाना, फिर सावधानी से पैक करना सब कुछ वो अकेले करती थी। धीरे-धीरे उनके बनाए अचार और प्रोडक्ट्स लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने लगे। पड़ोसियों से लेकर स्थानीय दुकानों तक, उनका स्वाद पहुंचने लगा। हर छोटा ऑर्डर उनके लिए सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि उम्मीद का एक नया दरवाज़ा था।
कोयंबटूर में मिला आत्मविश्वास
दालिमी के पति गोकुल चंद्र डेका वायु सेना में थे। जब उनकी पोस्टिंग कोयंबटूर में थी, तब दालिमी ने एक फूड फेस्टिवल में हिस्सा लेने का फैसला लिया। ये उनकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ साबित हुआ। उन्होंने अपने हाथों से बनाए प्रोडक्ट्स वहां प्रदर्शित किए। मन में हल्की घबराहट थी क्या लोग पसंद करेंगे? क्या उनका स्वाद सबको अच्छा लगेगा? लेकिन जब रिज़ल्ट का ऐलान हुआ और उन्हें पहला पुरस्कार मिला, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
वो पल सिर्फ एक ट्रॉफी जीतने का नहीं था, बल्कि खुद पर भरोसा जीतने का था। उन्हें महसूस हुआ कि उनका हुनर सिर्फ घर की रसोई तक सीमित नहीं है। उसमें इतनी ताकत है कि वह बड़े मंच पर भी पहचान बना सकता है।
सीख से मिली नई दिशा
साल 2012 में रिटायरमेंट के बाद परिवार गुवाहाटी लौटा। यहां दालिमी ने Indian Institute of Entrepreneurship (आईआईई) से फूड प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग ली। इस ट्रेनिंग ने उनके भीतर छिपे हुनर को एक दिशा दी। उन्होंने सीखा कि प्रोडक्ट की क्वालिटी कैसे मेंटेन करनी है, पैकेजिंग कैसे बेहतर बनानी है, और मार्केटिंग के जरिए ग्राहकों तक कैसे पहुंचना है। रिज़ल्ट चौंकाने वाले थे। सिर्फ एक हफ्ते में उनके अचार की बिक्री 100 रुपये से बढ़कर 5000 रुपये हो गई। ये सिर्फ आंकड़ा नहीं था, ये उनके आत्मविश्वास की नई ऊंचाई थी। उन्हें समझ आ गया था लोग उनके स्वाद को पसंद कर रहे हैं, और ये काम आगे बढ़ सकता है।
कमाई ही बनी पूंजी, मेहनत बनी ताकत
दालिमी ने कभी बड़े इन्वेस्ट का इंतज़ार नहीं किया। जो कमाया, उसी को आगे बढ़ाने में लगाया। 5000 रुपये की बिक्री हुई, तो एक छोटी मशीन खरीदी। काम बढ़ा, तो एक employee रखा। वो कहती हैं, “जितना पैसा आता था, उसी से मशीन लेती थी। फिर एक और employee रखा। करीब एक साल में मुझे समझ आ गया कि ये काम आगे जा सकता है।” धीरे-धीरे वही छोटा-सा किचन एक व्यवस्थित फूड प्रोसेसिंग यूनिट में बदल गया। जहां कभी अकेली दालिमी काम करती थी, आज वहां कई महिलाएं साथ मिलकर काम करती हैं। उनके लिए ये सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का ज़रिया है।
700 से ज़्यादा महिलाओं को सिखाया हुनर
दालिमी ने अपने सपनों को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अब तक 700 से ज़्यादा महिलाओं को फूड प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग की ट्रेनिंग दी है। सरकारी स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत वो अलग-अलग जिलों में जाकर ट्रेनिंग देती हैं। कहीं 3 दिन का प्रोग्राम, कहीं 5 दिन का, कहीं 20 दिन का और कहीं 40 दिन का। उनका मानना है “अगर एक महिला आत्मनिर्भर बनती है, तो पूरा परिवार मज़बूत होता है।” जब कोई महिला ट्रेनिंग के बाद अपना छोटा बिज़नेस शुरू करती है और मुस्कुराते हुए कहती है, “अब मैं खुद कमाती हूं,” तो वही दालिमी के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
क्वालिटी ही सबसे बड़ी पहचान
DBD Enterprise के सभी प्रोडक्ट स्थानीय कच्चे माल से बनाए जाते हैं। पारंपरिक असमिया स्वाद को बरकरार रखते हुए पूरी साफ-सफाई और हाइजीन का ध्यान रखा जाता है। दालिमी कहती हैं, “क्वालिटी मेंटेन करना ज़रूरी है। हमें हर चीज़ का प्रूफ देना पड़ता है। पानी का सर्टिफिकेट है, कर्मचारियों का मेडिकल सर्टिफिकेट है। हर चीज़ का रिकॉर्ड रखना पड़ता है।” कस्टमर का भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी है। वो जानती हैं कि एक बार अगर भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा पाना मुश्किल होता है। इसलिए हर पैकेट में सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि ईमानदारी भी पैक होती है।
रिसर्च से जुड़ा स्वाद का सफर
दालिमी सिर्फ प्रोडक्शन तक सीमित नहीं रहतीं, वो रिसर्च पर भी ध्यान देती हैं। कौन सा प्रोडक्ट कितने समय तक सुरक्षित रह सकता है, किस तरीके से ज़्यादा दिन तक स्टोर किया जा सकता है इन सब पर वो लगातार काम करती हैं। वो अलग-अलग तरीकों से चीजों को नमक या दूसरे नेचुरल तरीकों से सुरक्षित रखकर देखती हैं कि उनकी क्वालिटी कितने समय तक बनी रहती है। उनके किंग चिली पिकल, बैंबू शूट और असमिया नींबू के अचार की सबसे ज़्यादा मांग है। इन प्रोडक्ट्स में सिर्फ मसालों का स्वाद नहीं, बल्कि असम की मिट्टी की खुशबू और परंपरा की गर्माहट भी होती है।
एग्ज़ीबिशन से मिली पहचान
शुरुआती दिनों में दालिमी देशभर में सरकार एग्ज़ीबिशन में हिस्सा लेती थी। वहां उन्हें नए कस्टमर मिले, नए अनुभव मिले, और अपने काम को बेहतर बनाने का मौका मिला। कोविड के दौरान जब लोग घरों में थे, तब स्थानीय और भरोसेमंद प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ी। इसी दौरान DBD Enterprise ने असम के बाज़ार में मजबूत पहचान बना ली। 15 साल के इस सफर में परिवार ने उनका पूरा साथ दिया। उनके पति, जो एक्स-सर्विसमैन हैं, बताते हैं, “हमारा आर्मी नेटवर्क था।
वहीं से थोड़ा-थोड़ा सामान देना शुरू किया। पहले 10–20 प्रोडक्ट दिए, फिर 30 दिए। धीरे-धीरे डिमांड बढ़ती गई। जब काम ज़्यादा हुआ, तो मैंने नौकरी छोड़ दी और पूरा समय देने लगा।” उनका बेटा भी इस काम से जुड़ गया। लॉकडाउन के दौरान उसने 6 महीने तक प्रोडक्शन और पूरे प्रोसेस को समझा। आज वो फाइनेंस और अकाउंट संभालता है सेल का हिसाब, बैंक का काम, पेमेंट कलेक्शन और तालमेल। अब परिवार मिलकर DBD Enterprise को आगे बढ़ा रहा है और प्रोडक्ट्स को Amazon जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी कर रहा है, ताकि असम का स्वाद देश-विदेश तक पहुंचे।
एक महिला नहीं, सैकड़ों उम्मीदों की कहानी
आज DBD Enterprise के प्रोडक्ट्स स्थानीय बाज़ारों में सप्लाई हो रहे हैं। ग्राहकों का भरोसा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। दालिमी डेका की कहानी ये साबित करती है कि आत्मनिर्भरता किसी बड़े इन्वेस्टमेंट की मोहताज नहीं होती। ज़रूरत होती है तो सिर्फ मेहनत, सब्र और सही दिशा की।
500 रुपये से शुरू हुआ ये सफ़र आज राष्ट्रीय पहचान बन चुका है। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। ये कहानी सिर्फ एक ब्रांड की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है, जो कहती है छोटी शुरुआत से भी बड़ा बदलाव आ सकता है। DBD Enterprise आज आत्मनिर्भर भारत की सच्ची मिसाल है जहां एक रसोई से निकला स्वाद सैकड़ों घरों तक उम्मीद, सम्मान और रोज़गार लेकर पहुंच रहा है।
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