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मोहनजोदड़ो से मुगल दरबार तक: कैसे बदली Zari-Zardozi की कहानी? भोपाल के सुनहरे धागों में बसती नवाबी कला 

झीलों की ठंडी हवा जब पुराने भोपाल के चौक बाज़ार की तंग गलियों से होकर गुजरती है, तो वो सिर्फ़ इमारतों को नहीं छूती, वो उन कमरों में भी उतरती है, जहां लकड़ी के अड्डों पर झुके कारीगर सुई में सुनहरे धागे पिरोते हुए इतिहास को फिर से जन्म दे रहे होते हैं। ये नज़ारा किसी साधारण कढ़ाई का नहीं, बल्कि ज़री-ज़रदोज़ी का है। एक ऐसी कला, जिसमें धागे सिर्फ़ कपड़े पर नहीं, बल्कि वक्त पर भी अपनी छाप छोड़ते हैं।

Zari-Zardozi की सोने-चांदी से शुरू हुई कहानी

भारत में ऋग्वेद काल से ही जरदोजी कढ़ाई का प्रचलन रहा है। ‘ज़र’ यानी सोना और ‘दोज़ी’ यानी कढ़ाई, नाम में ही इसकी शान छिपी है। इस कला की जड़ें फारस में मानी जाती हैं, लेकिन भारत में इसे असली पहचान मुगल काल में मिली। शाही पोशाकें, दरबारी परदे, तलवारों के म्यान,सब पर ज़रदोज़ी की चमक दिखाई देती थी। जब मुगल कारीगर अलग-अलग रियासतों में पहुंचे, तो नवाबों के शहर भोपाल ने उन्हें न सिर्फ़ ठिकाना दिया, बल्कि पहचान भी दी। भोपाल की बेगमों ने इस कला को संरक्षण दिया और देखते ही देखते यह शहर ज़रदोज़ी का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। भोपाल की बेगमें अपने निजी सामान रखने के लिए जरदोजी से सजे बटुआ का इस्तेमाल करती थीं। इन जैसे पारंपरिक जरदोजी वाले थैले आज भी मशहूर हैं और इन्हें ‘भोपाली बटुआ’ के नाम से जाना जाता है । ये भोपाल शहर से ले जाने लायक बेहतरीन सामानों में से एक हैं।

सुई-धागे से चलती पीढ़ियां

लकड़ी के अड्डे पर तने कपड़े पर जब उनकी सुई चलती है, तो हर टांका एक अभ्यास, एक अनुभव और एक परंपरा का परिणाम होता है। ये काम मशीन से नहीं, बल्कि धैर्य से होता है। एक भारी दुल्हन का लहंगा तैयार करने में कई-कई महीने लग जाते हैं। इस काम मो.अली पिछले 30 सालों से कर रहे हैं। वो पहले किसान हुआ करते थे, फिर उन्होंने इस हुनर को चुना । इस चुनाव के बाद वो ज़री-ज़रदोज़ी में रम गए और अपनी कला से लोगों को प्रभावित करने लगे।

चौक बाज़ार: जहां धागे बोलते हैं

भोपाल का चौक बाज़ार आज भी इस कला की धड़कन है। यहां छोटी-छोटी दुकानों और घरों में कारीगर दिन-भर सुनहरे और चांदी जैसे धागों से कपड़ों को सजाते रहते हैं। इनके हाथों से निकले लहंगे, शेरवानी और साड़ियां न सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुबई, लंदन और न्यूयॉर्क तक पहुंचती हैं। कारीगर मोहम्मद अली बताते हैं कि मो.अली पिछले 30 साल से काम कर रहे हैं। हमने ये काम कलकत्ता में रहकर सीखा है। ड्रैस डिजाइन में लगभग 2 दिन लग जाते हैं। वर्क करने में 2 दिन से कई महीनों का काम होता है। भोपाल , -चांदी या तांबे के धात्विक धागों और मोतियों का उपयोग करके भारी कढ़ाई की जाती है। इसमें अड्डा (लकड़ी का फ्रेम), अरी सुई (हुक वाली सुई), धात्विक तार (दबका, कसक), मोती, सीक्वेंस (सितारे) और भारी कपड़े जैसे रेशम या मखमल का उपयोग प्रमुखता से होता है।

इस काम में कारिगर को कितना मुनाफ़ा?

मो.अली बताते हैं कि उनको इस काम में लगभग 15 फीसदी का मुनाफ़ा होता है। अगर उनका किसी साड़ी, लहंगा और दुपट्टा बनाने में लगभग दो हजार रुपए तक का खर्चा आ रहे है। तो वो बाज़ार में वो 2500 रुपए तक बेचते हैं। अगर किसी बड़ी दुकान है तो आपको 4000 रुपए तक का भी मिल सकता है। आपको बतादें कि मो.अली 8 से10 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। अली दिल्ली, फरुखाबाद में भी काम करवाते हैं।

बदलते समय की चुनौती

लेकिन ये सुनहरी कहानी पूरी तरह आसान नहीं है। मशीन से बनने वाली कढ़ाई और बदलते फैशन ने इस परंपरागत कला के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। हाथ की ज़रदोज़ी में समय और मेहनत ज़्यादा लगती है, जबकि मशीन कम समय में सस्ता विकल्प दे देती है। इसके बावजूद, भोपाल के कारीगर हार मानने को तैयार नहीं हैं। उनके लिए यह काम सिर्फ़ कमाई नहीं, बल्कि पहचान है।

ज़रदोज़ी कला का क्या है मोहनजोदाड़ो से संबंध ?

ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि भारत में प्राचीन काल से ही सुई-धागे का काम और कढ़ाई की जाती रही है। सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ो स्थल (2300-1500 ईसा पूर्व) से उत्खनित कांस्य सुइयां और मूर्तियां कढ़ाई वाले वस्त्रों की गवाही देती हैं। ईसा पूर्व 300 में यूनानी अन्वेषक मेगास्थनीज ने अपने भारतीय यात्रा वृत्तांत में जरदोजी कढ़ाई का वर्णन किया है । उन्होंने सोने से सजे और बहुमूल्य पत्थरों से अलंकृत फूलों वाले मलमल के वस्त्रों का वर्णन किया है। वैदिक युग में भी इस शिल्प का प्रचलन पाया जा सकता है। ऋग्वेद में अटका, द्रापी, पेसा जैसे शब्द मिलते हैं, जो सिले हुए वस्त्रों को दर्शाते हैं। यहां अटका शब्द का अर्थ है सोने के धागे से कढ़ाई किया हुआ और अलंकृत वस्त्र। इसे ‘सोने का वस्त्र’ भी कहा जाता था।

सुनहरे धागों में जीवित शहर

ज़री-ज़रदोज़ी भोपाल के लिए सिर्फ़ एक कला नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का हिस्सा है। यह शहर की नवाबी विरासत, उसकी तहज़ीब और उसके लोगों की मेहनत का जीवंत प्रमाण है। जब अगली बार आप भोपाल आएं और चौक की गलियों से गुजरें, तो इन अड्डों के पास ज़रूर रुकें। क्योंकि वहां आपको सिर्फ़ कढ़ाई नहीं, बल्कि सुनहरे धागों में बुना एक शहर दिखाई देगा। इस शिल्प में उच्च स्तर की कुशलता और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। कारीगर की निपुणता उसकी गति और निर्णय क्षमता का मापदंड है। सभी टांके आदर्श रूप से एक ही आकार के होने चाहिए। ज़री का काम अरी सुई से किया जाता है और ज़रदोज़ी कढ़ाई की विभिन्न प्रकार की सुइयों से की जाती है।

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