यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नहयान की हालिया भारत यात्रा ने भारत–यूएई संबंधों के एक नए चरण को स्पष्ट रूप से दिखाया है। इस यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में हुए कई समझौतों ने दोनों देशों के रिश्तों को एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप दिया है। यह विकास स्वाभाविक भी है, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो न केवल सामाजिक रूप से जुड़े हुए हैं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी अहम भूमिका निभाते हैं। शिवानी रावत इस यात्रा के नतीजों का विश्लेषण करती हैं।
यह यात्रा भले ही छोटी रही, लेकिन इसका प्रभाव गहरा था। यूएई के राष्ट्रपति ने भारत की राजधानी नई दिल्ली में लगभग तीन घंटे का ही प्रवास किया। हालांकि, उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ आई इस यात्रा में कई महत्वपूर्ण समझौते हुए, जो दोनों देशों के करीबी संबंधों को दर्शाते हैं। पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के दौर में यह यात्रा भारत–यूएई संबंधों के लेन-देन आधारित रिश्ते से आगे बढ़कर दीर्घकालिक रणनीतिक तालमेल की ओर बढ़ने का संकेत देती है।
हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्वागत किए जाने से लेकर राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री आवास तक अपनी आधिकारिक गाड़ी में ले जाने तक, यह यात्रा दो घनिष्ठ मित्रों की मुलाकात जैसी प्रतीत हुई। लकड़ी के झूले पर बैठे दोनों नेताओं की मुस्कुराती तस्वीर ने उनके आपसी व्यक्तिगत रिश्ते की गर्मजोशी को दर्शाया। यूएई राष्ट्रपति बनने के बाद चार वर्षों में यह शेख़ मोहम्मद की तीसरी भारत यात्रा थी।
इस दौरे ने भारत और यूएई के रक्षा संबंधों की परिपक्वता को भी दिखाया। दोनों देशों ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी की दिशा में एक आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें संयुक्त रक्षा उत्पादन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और दोनों देशों की विशेष बलों के बीच प्रशिक्षण शामिल है। यह हाल के उच्चस्तरीय सैन्य दौरों और संयुक्त अभ्यासों का ही विस्तार है।
दोनों देशों के बीच गहरे भरोसे को दर्शाते हुए, एक-दूसरे के क्षेत्र में डिजिटल दूतावास स्थापित करने के लिए नियामक ढांचे पर भी बातचीत चल रही है। यह एक नई और दिलचस्प अवधारणा है, जिसका उद्देश्य महत्वपूर्ण और रणनीतिक डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखना है, ताकि साइबर हमलों, प्राकृतिक आपदाओं या भू-राजनीतिक संकट के समय डिजिटल निरंतरता और संप्रभुता बनी रहे।
इस व्यवस्था के तहत, यदि किसी देश में महत्वपूर्ण डाटाबेस तक भौतिक पहुंच बाधित हो जाए, तो वह मित्र देश में मौजूद सुरक्षित बैकअप के ज़रिए आवश्यक सेवाएं जारी रख सकता है। यह ढांचा भारत की भरोसेमंद डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) प्रदाता की छवि और यूएई की वैश्विक साइबर सुरक्षा केंद्र बनने की महत्वाकांक्षा—दोनों को मज़बूती देता है।
भारत और यूएई अंतरिक्ष क्षेत्र में भी संयुक्त पहल पर विचार कर रहे हैं। इसमें नए लॉन्च कॉम्प्लेक्स, सैटेलाइट निर्माण सुविधाएं, संयुक्त मिशन, अंतरिक्ष अकादमी और प्रशिक्षण केंद्र शामिल हो सकते हैं। इन पहलों का जलवायु निगरानी, आपदा प्रबंधन और सुरक्षित संचार पर रणनीतिक प्रभाव पड़ेगा।
ऊर्जा क्षेत्र में यूएई लंबे समय से भारत का प्रमुख साझेदार रहा है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक दीर्घकालिक समझौता किया, जिसके तहत HPCL वर्ष 2028 से अगले 10 वर्षों तक ADNOC Gas से हर साल 0.5 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी खरीदेगी। इसके साथ ही यूएई भारत का दूसरा सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता बन गया है।
CEPA से प्रोत्साहित होकर भारत–यूएई द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है, जिससे यूएई, चीन और अमेरिका के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर ऊंचे शुल्क लगाए जाने के बीच यह यात्रा भारत के लिए अन्य साझेदारों के साथ व्यापार विस्तार का अवसर भी बनी। 2022 में CEPA के बाद से गैर-तेल व्यापार में तेज़ी आई है, खासकर रत्न-आभूषण, दवाइयों, खाद्य प्रसंस्करण और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में। अब दोनों देशों ने 2032 तक व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
आज यूएई में लगभग 45 लाख भारतीय रहते हैं। यहां से भारत को होने वाला वार्षिक प्रेषण दुनिया में सबसे अधिक में से एक है। भारतीय प्रवासी समुदाय निर्माण, स्वास्थ्य, वित्त और तकनीक जैसे कई क्षेत्रों में इस रिश्ते की मज़बूत कड़ी बन चुका है। भुगतान प्लेटफॉर्म को जोड़ना, यूएई में UPI की शुरुआत और भारत के RuPay कार्ड को यूएई के Jaywan से जोड़ना—ये सभी कदम लोगों के बीच संबंधों को और गहरा करेंगे।
भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि दिखाते हुए अबू धाबी ने “हाउस ऑफ इंडिया” नाम से एक अत्याधुनिक संग्रहालय स्थापित करने का फैसला किया है, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को दर्शाएगा। अंतरधार्मिक संस्थानों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ यह पहल यूएई के सांस्कृतिक बहुलता और सॉफ्ट पावर को संस्थागत रूप देने के प्रयास को दिखाती है।
इन ठोस उपलब्धियों के पीछे एक और शांत लेकिन महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू भी छिपा है—मुस्लिम आउटरीच। धार्मिक कूटनीति की भाषा का प्रयोग किए बिना, भारत–यूएई संबंध एक ऐसे माध्यम के रूप में उभरे हैं, जिनके ज़रिए भारत इस्लामी दुनिया से—बाहरी और आंतरिक दोनों स्तरों पर—संवाद करता है। अब भारत की यह भागीदारी क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि सीधे आर्थिक, रणनीतिक और जन-संपर्क संबंधों पर आधारित है। यूएई के साथ मजबूत रिश्ते भारत को यह तर्क देने का आधार देते हैं कि मुस्लिम बहुल देशों से जुड़ाव भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
यूएई के साथ रिश्तों को ठोस परिणामों और भरोसे पर टिकाकर भारत ने एक ऐसी मुस्लिम आउटरीच रणनीति गढ़ी है, जो केवल प्रतीकों पर निर्भर नहीं है। बिखरी हुई वैश्विक राजनीति और तीखी पहचान-आधारित बहसों के इस दौर में, भारत–यूएई संबंध यह याद दिलाते हैं कि साझा हितों और लोगों के बीच रिश्तों पर आधारित शांत कूटनीति अक्सर सबसे टिकाऊ होती है।
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