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बीजिंग की सोची-समझी अफ़ग़ान भागीदारी

अफगानिस्तान में निवेश की दिशा में चीन के सतर्क कदम उसके नागरिकों पर हो रहे हमलों के कारण बाधित हो रहे हैं, जिससे उसे तालिबान के नियंत्रण वाले इस क्षेत्र में अपनी नीति पर दोबारा सोचने को मजबूर होना पड़ रहा है। चीन को अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक हितों और इससे जुड़ी लागत के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट की रिसर्च एसोसिएट अफ़सारा शाहीन ने चीन और उसके पश्चिमी पड़ोसी के बीच संबंधों का विश्लेषण किया है।

19 जनवरी 2026 को काबुल में एक चीनी रेस्तरां पर हुए आत्मघाती हमले में एक चीनी नागरिक और छह अफगान नागरिकों की मौत हो गई, जबकि कम से कम पाँच अन्य चीनी नागरिक घायल हुए। इस हमले की बीजिंग ने कड़ी निंदा की। इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली, जो राजधानी के एक कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में हुआ था। यह घटना एक बार फिर तालिबान के सुरक्षा दावों और ज़मीनी सच्चाइयों के बीच मौजूद गहरे अंतर को उजागर करती है।

यह हमला अफगानिस्तान में चीन के सामने खड़ी होती सुरक्षा चुनौती को रेखांकित करता है, जबकि चीन लगातार तालिबान शासन से कूटनीतिक संपर्क बनाए हुए है। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से चीन ने खुद को अफगानिस्तान का सबसे बड़ा बाहरी आर्थिक साझेदार दिखाने की कोशिश की है, लेकिन बढ़ते सुरक्षा जोखिम उसके इस पूरे आकलन की नाज़ुक स्थिति को सामने लाते हैं।

तालिबान की वापसी के बाद चीन ने वैचारिक मेल की बजाय सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक हितों से प्रेरित व्यावहारिक नीति अपनाई है। बीजिंग ने अपना दूतावास खुला रखा, तालिबान प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी की और औपचारिक मान्यता दिए बिना गहरे सहयोग के संकेत दिए। अफगानिस्तान को चीन दो नजरियों से देखता है: एक ऐसे क्षेत्र के रूप में जो उसके पश्चिमी इलाकों और शिनजियांग के लिए अस्थिरता का कारण बन सकता है, और दूसरी ओर ऐसे देश के रूप में जहां खनिज संसाधनों की अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से जोड़ा जा सकता है। हालांकि, यह जुड़ाव हमेशा सतर्क, धीरे-धीरे बढ़ने वाला और सुरक्षा शर्तों पर आधारित रहा है।

अफगानिस्तान में चीनी निवेश मुख्य रूप से खनन क्षेत्र तक सीमित रहा है, जिसमें सबसे प्रमुख लॉगर प्रांत की मेस ऐनाक तांबा परियोजना है, जो लंबे समय से रुकी हुई है। वर्ष 2007 में एक चीनी समूह को यह परियोजना सौंपी गई थी, लेकिन लगातार असुरक्षा, बुनियादी ढांचे की कमी, प्रशासनिक देरी और पुरातात्विक अवशेषों की मौजूदगी के कारण यह अब तक शुरू नहीं हो सकी। 2022 के बाद तालिबान के आश्वासन और नई बातचीत के बावजूद बड़े स्तर पर खनन अब भी शुरू नहीं हुआ है, जो समझौतों और वास्तविक निवेश के बीच अंतर को दिखाता है।

इसके अलावा, चीनी कंपनियों ने अमू दरिया बेसिन में तेल, साथ ही लिथियम और दुर्लभ खनिजों में भी रुचि दिखाई है। संसाधनों के अलावा, चीन की भागीदारी में सीमित बुनियादी ढांचा विकास, मानवीय सहायता और अफगानिस्तान को पाकिस्तान व मध्य एशिया से जोड़ने वाली परियोजनाओं पर शुरुआती चर्चा शामिल रही है। तालिबान के प्रयासों के बावजूद इन परियोजनाओं में प्रगति धीमी रही है, जिसका कारण असुरक्षा, कमजोर शासन और लंबे समय के लाभ को लेकर अनिश्चितता है। उपलब्ध जानकारी बताती है कि निवेश की घोषणाएं तो हुई हैं, लेकिन वास्तविक पूंजी निवेश बहुत सीमित और चुनिंदा रहा है।

चीनी नागरिकों को निशाना बनाकर किए जा रहे हमले बीजिंग की अफगान नीति के लिए एक बड़ी बाधा बन गए हैं। 2022 से अब तक चीनी नागरिकों और ठिकानों पर कई हमले हुए हैं, जिनमें होटलों पर हमले, परियोजना स्थलों के पास गोलीबारी और अब काबुल में चीनी रेस्तरां पर आत्मघाती हमला शामिल है। साउथ एशियन टेररिज़्म पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर-दिसंबर 2025 के दौरान अफगान सीमा से जुड़े हमलों में कम से कम आठ चीनी नागरिक मारे गए। 26 नवंबर 2025 को ताजिकिस्तान में एक श्रमिक शिविर पर कथित रूप से अफगानिस्तान से छोड़े गए ड्रोन हमले में तीन चीनी श्रमिकों की मौत हुई।

2 दिसंबर 2025 को दो अलग-अलग सीमा पार हमलों में पाँच चीनी नागरिक मारे गए। जनवरी 2026 के काबुल हमले के बाद दो महीनों में अफगान-आधारित हिंसा से जुड़े चीनी नागरिकों की मौत का आंकड़ा नौ हो गया है। ISKP ने शिनजियांग नीति और तालिबान से चीन के संबंधों के कारण चीनी नागरिकों को खुले तौर पर निशाना बनाया है। इन हमलों का दोहरा उद्देश्य है: तालिबान के सुरक्षा दावों को कमजोर करना और ऐसे विदेशी निवेश को रोकना जो शासन को मज़बूती दे सकता है। इसलिए चीनी हितों को निशाना बनाना महज़ संयोग नहीं, बल्कि रणनीति का हिस्सा है।

तालिबान के लिए चीनी नागरिकों की सुरक्षा रणनीतिक रूप से अहम है, क्योंकि चीन उन गिने-चुने देशों में है जो बिना राजनीतिक शर्तों के शासन से आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए हुए है। बावजूद इसके, सुरक्षा बल तैनात करने और जांच के बाद भी तालिबान शहरी इलाकों में सक्रिय ISKP नेटवर्क को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया है। खुफिया कमज़ोरियां, अंदरूनी गुटबाज़ी और सीमित आतंक-रोधी क्षमता बड़े हमलों को संभव बना रही है, खासकर काबुल में।

आधिकारिक आंकड़े सार्वजनिक नहीं हैं, लेकिन खुले स्रोतों के अनुसार अफगानिस्तान में चीनी उपस्थिति सीमित होते हुए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जिसमें किसी भी समय दर्जनों से लेकर सौ से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं। इनमें राजनयिक, इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और खनन, ऊर्जा व बुनियादी ढांचे से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। अधिकांश चीनी नागरिक काबुल में केंद्रित हैं, जबकि कुछ मेस ऐनाक और उत्तरी अफगानिस्तान के ऊर्जा क्षेत्रों में मौजूद हैं। उनकी पहचान योग्य मौजूदगी और सीमित संख्या उन्हें अधिक असुरक्षित बनाती है।

अफगानिस्तान को लेकर चीन का जोखिम आकलन जटिल है। पूरी तरह पीछे हटने से कट्टरपंथी समूहों को खुला मैदान मिल सकता है, जबकि जुड़े रहने से चीनी नागरिक और संपत्ति बार-बार हमलों के जोखिम में रहती है, वो भी सीमित आर्थिक लाभ के साथ। पाकिस्तान या अफ्रीका के कुछ हिस्सों के विपरीत, जहां मजबूत सुरक्षा ढांचा और स्पष्ट लाभ मौजूद हैं, अफगानिस्तान अनिश्चित लाभ वाला उच्च जोखिम क्षेत्र बना हुआ है।

हालिया हमलों ने चीन के भीतर कंपनियों और नीति स्तर पर सतर्कता बढ़ा दी है, जिससे वास्तविक निवेश की इच्छा कम हुई है। इससे बीजिंग पर अपने नागरिकों की सुरक्षा और रणनीतिक धैर्य के बीच संतुलन बनाने का दबाव बढ़ा है। एक मीडिया रिपोर्ट में विश्लेषकों ने कहा कि अस्थिरता और सुरक्षा की कमी के कारण अफगानिस्तान में “बड़े निवेश की स्थितियां मौजूद नहीं हैं”, जो चीनी कंपनियों की हिचक को और मजबूत करता है।

आने वाले समय में चीन संभवतः तालिबान से सुरक्षा गारंटी की मांग बढ़ाते हुए सतर्क जुड़ाव बनाए रखेगा। लेकिन जब तक ISKP पर ठोस नियंत्रण और विदेशी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तब तक अफगानिस्तान में चीन की भूमिका सीमित, धीमी और कड़े सुरक्षा दायरे में ही रहने की संभावना है। काबुल हमला इस सच्चाई की याद दिलाता है कि चीन के लिए अफगानिस्तान आज भी ऐसा क्षेत्र है, जहां रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं लगातार असुरक्षा से बंधी हुई हैं। 

ये भी पढ़ें: जम्मू और कश्मीर-नशीले पदार्थों का ख़तरा

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