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साग़र सिद्दीक़ी: ‘फुटपाथ का बादशाह’, जिसकी शायरी में दर्द और मोहब्बत की अनकही दास्तान थी

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपनी शायरी के साथ-साथ अपनी ज़िंदगी की दर्दनाक हक़ीक़त की वजह से भी अमर हो गए हैं। इन्हीं में से एक नाम है मोहम्मद अख़्तर, जो बाद में साग़र सिद्दीक़ी के नाम से मशहूर हुए। एक ऐसे शायर जिन्होंने ग़रीबी और बेबसी की ज़िंदगी गुज़ारी, लेकिन उनकी शायरी में जो गहराई और दिलकशी थी, उसने उन्हें अपने दौर के सबसे मक़बूल शायरों की फ़ेहरिस्त में शामिल कर दिया। उनकी शायरी सिर्फ़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं थी, बल्कि दर्द, मोहब्बत और इंसानियत के एहसास से भरी एक रूहानी आवाज़ थी।

साग़र सिद्दीक़ी की पैदाइश 1928 में अंबाला में हुई। उनके घर में बेहद ग़ुरबत थी, जिस वजह से उन्हें कोई इब्तिदाई तालीम हासिल करने का मौक़ा नहीं मिला। लेकिन उनकी क़ुदरती सलाहियत और शेर कहने का शौक़ बचपन से ही ज़ाहिर था। मुहल्ले के एक बुज़ुर्ग हबीब हसन ने उन्हें थोड़ी-बहुत तालीम दी।

जब उनका दिल अंबाला की ग़रीबी से उचाट हो गया, तो वो महज़ 13-14 साल की उम्र में अमृतसर चले आए। यहां उन्होंने कंघियां बनाने वाली एक दुकान पर काम किया और ये हुनर भी सीख लिया। इसी दौरान उनके अंदर का शायर जाग उठा और वो शेर कहने लगे। शुरू में उन्होंने अपना तख़ल्लुस नासिर हिजाज़ी रखा, लेकिन जल्द ही साग़र सिद्दीक़ी के नाम से मशहूर हो गए।

साग़र का अदबी सफ़र उस वक़्त शुरू हुआ जब 1944 में अमृतसर में एक ऑल इंडिया मुशायरा हुआ। एक दोस्त की मदद से उन्हें इस मुशायरे में अपना कलाम पेश करने का मौक़ा मिला। उनकी दिलकश आवाज़ और तरन्नुम ने वहां मौजूद हर शख़्स का दिल जीत लिया और वह रातों-रात शोहरत की बुलंदी पर पहुंच गए। इसके बाद उन्हें लाहौर और अमृतसर के मुशायरों में बुलाया जाने लगा। शायरी सिर्फ़ उनके लिए शोहरत का ज़रिया नहीं बनी, बल्कि रोज़गार का भी ज़रिया बन गई और उन्होंने कंघियां बनाने का काम छोड़ दिया।

मैं आदमी हूं कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया

साग़र सिद्दीक़ी

अदबी सफ़र

हिंदुस्तान की तक़सीम के बाद, वो लाहौर चले गए, जहां उन्होंने उस्ताद शायर लतीफ़ अनवर गुरदासपुरी से इस्लाह ली। 1947 से 1952 का ज़माना उनके लिए सुनहरा दौर साबित हुआ। उनकी ग़ज़लें और नज़्में कई अख़बारों और अदबी रिसालों में छपने लगीं। इसी दौर में उन्होंने फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे। लेकिन 1952 के बाद, बुरी सोहबत की वजह से उनकी ज़िंदगी नशे की लत का शिकार हो गई। वो नशे की हालत में भी शायरी करते रहे और इस दौरान उन्होंने कई शानदार कलाम लिखे।

शायरी का अंदाज़

साग़र की शायरी में दर्द, ग़म-ए-दौरां और इंसानियत की तड़प साफ़ झलकती है। उनकी ज़बान बेहद सादा और दिल को छू लेने वाली थी। उन्होंने अपनी शायरी में मोहब्बत के दर्द, ग़रीबी की कशमकश और सामाजिक ज़ुल्म को बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया। उनके कलाम की सादगी में बहुत गहराई थी। उनके कुछ मशहूर शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।

ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की पाई है सज़ा याद नहीं

कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र
आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं

साग़र सिद्दीक़ी

साग़र सिद्दीक़ी की ज़िंदगी में कई दिलचस्प वाक़िआत मिलते हैं। एक बार, लाहौर में एक मुशायरे में जब उन्हें पढ़ने के लिए बुलाया गया, तो वो नशे की हालत में थे। फिर भी, उन्होंने जब अपनी ग़ज़ल पढ़ना शुरू की, तो उनकी दर्द भरी आवाज़ और तरन्नुम ने समां बांध दिया। उनके कलाम पर लोग बे-इख़्तियार दाद देने लगे। एक और वाक़िया ये भी है कि वो अक्सर अपनी ग़ज़लें और नज़्में राह चलते लोगों को सुनाते थे, और बदले में जो भी उन्हें मिल जाता, उसी से गुज़ारा करते थे। उनकी इस फ़क़ीराना ज़िंदगी ने उनकी शायरी को और भी सच्चा और गहरा बना दिया।

लोग कहते हैं रात बीत चुकी
मुझ को समझाओ! मैं शराबी हूं

साग़र सिद्दीक़ी

अवार्ड और विरासत

साग़र को कोई बड़ा सरकारी या अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड तो नहीं मिला, लेकिन उन्हें लोगों का जो प्यार और अदबी हल्क़ों में जो इज़्ज़त मिली, वो किसी भी अवार्ड से ज़्यादा क़ीमती थी। उनके कलाम की मक़बूलियत इतनी थी कि उनकी कई किताबें जैसे “ज़हर-ए-आरज़ू”, “ग़म-ए-बहार”, “शब-ए-आगाही” और “कुल्लियात-ए-साग़र” ने लोगों के दिलों में जगह बनाई। उनकी शायरी ने आम लोगों को अपना दर्द महसूस करने और उसे लफ़्ज़ों में ढालने का हौसला दिया।

साग़र सिद्दीक़ी की शायरी आज भी ज़िंदा है। उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी नौजवान शायरों को मुतास्सिर करती हैं। उनकी शायरी में जो बेबाक और बेबसी की हक़ीक़त है, वो आज भी मौजूद है। उनके कलाम ने आने वाली नस्लों को ये पैग़ाम दिया कि हक़ीक़ी शायर वो है जो ज़िंदगी के दर्द को महसूस करे और उसे अपनी शायरी में बयान करे, चाहे वह कितना भी मुश्किल क्यों न हो।

साग़र सिद्दीक़ी की ज़िंदगी एक फ़क़ीर की ज़िंदगी थी, लेकिन उनकी शायरी में जो बादशाहत थी, वह बहुत कम शायरों के हिस्से में आती है। वह दर्द, मोहब्बत और फ़क़ीरी का एक ऐसा समंदर थे, जिसकी गहराई का अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है। उनकी वफ़ात 19 जुलाई 1974 को लाहौर में एक फ़ुटपाथ पर हुई। उनकी ज़िंदगी का सफ़र चाहे दुखद था, लेकिन उनकी शायरी हमेशा ज़िंदा रहेगी और उर्दू अदब में उनका मुक़ाम हमेशा बुलंद रहेगा।

ये भी पढ़ें: ख़लील-उर-रहमान आज़मी: जब एक हिंदुस्तानी शायर बना ब्रिटिश स्कॉलर का टीचर 

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