Tuesday, July 14, 2026
36.6 C
Delhi

ख़ुमार बाराबंकवी: एक ज़मींदार घराने का बेटा जब बना ग़ज़ल का नग़्मा-गर

हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ ‘ख़ुमार’
क्या बात हो गई जो ख़ुदा याद आ गया”

ख़ुमार बाराबंकवी

जब मोहब्बत ग़ज़ल का रूप लेती है, और ग़ज़ल सादगी से बहती हुई सीधे दिल में उतरती है, तो किसी नाम की गूंज ज़ेहन में उभरती है- ख़ुमार बाराबंकवी। एक ऐसा शायर जो महज़ अल्फ़ाज़ का जादूगर नहीं, बल्कि जज़्बातों का मुसव्विर था। उनकी शायरी महबूब की झलक, इश्क़ की ख़ामोशी, और ज़िंदगी की रूहानी तर्जुमानी है।

ख़ुमार बाराबंकवी का असली नाम मोहम्मद हैदर ख़ां था। उनका जन्म 15 सितम्बर 1919 को बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के एक ख़ानदानी ज़मींदार घराने में हुआ। लेकिन ये घराना सिर्फ़ ज़मींदारी में ही नहीं, इल्म, तहज़ीब और अदब में भी ख़ास मुकाम रखता था।

उनके वालिद डॉ. अब्दुल ग़फ़ूर ख़ां ‘शौक़ बाराबंकवी’ भी एक नामवर शायर थे। घर का माहौल इल्मी भी था और अदबी भी। यही वजह है कि छोटी उम्र में ही ख़ुमार के लबों पर शेरों की मिठास उतरने लगी थी

“ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं”

ख़ुमार बाराबंकवी

लखनऊ की सरज़मीन पर शायरी की पहली दस्तक

ख़ुमार ने अपनी तालीम लखनऊ और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हासिल की। लखनऊ की नफ़ासत और अदबी हवा ने उनकी शायरी की बुनियाद को और भी मज़बूत किया। वहां के मुशायरों, शायरी की महफ़िलों और उस्तादों से उन्हें ग़ज़ल की बारीकियां सीखने को मिलीं।

ख़ुमार बाराबंकवी का शुरुआती झुकाव ग़ालिब, दाग़, फ़ैज़ और जोश मलीहाबादी जैसे शायरों की शायरी की तरफ़ था। लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली- नर्म लहज़ा, आसान लफ़्ज़ों और इश्क़ से लबरेज़ तर्ज़ की।

ग़ज़ल की दुनिया में पहला क़दम

1938 में जब वो महज़ 19 साल के थे, उनका पहला दीवान छपा और देखते ही देखते वो मुशायरों की जान बन गए। उनका नाम हिंदुस्तान के बड़े-बड़े मुशायरों में शुमार होने लगा।

“भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए”

ख़ुमार बाराबंकवी

ऐसी आसान ज़बान, गहरी बात और नाज़ुक एहसासात- यही ख़ुमार की शायरी का असल सौंदर्य है।

मुशायरों का बादशाह

ख़ुमार बाराबंकवी की शख़्सियत की सबसे ख़ास बात थी उनकी मुशायरा-पसंदी। वो जब भी मंच पर आते, महफ़िल संवर जाती। उनका अंदाज़-ए-बयान, नाज़ुक जज़्बातों की तरतीब, और आवाज़ का उतार-चढ़ाव- सब मिलकर श्रोताओं को दीवाना बना देता। वो न सिर्फ़ हिंदुस्तान, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, यूके, मिडिल ईस्ट और अमेरिका तक मुशायरों में अपना जादू बिखेरते रहे।

फ़िल्मी दुनिया से रिश्ता

1950 के दशक में मुंबई की फ़िल्मी दुनिया ने ख़ुमार की शायरी की ख़ुशबू महसूस की। उन्होंने कुछ फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे जिनमें ‘शबनम’, ‘बरसात की रात’, ‘लैला मजनूं’ शामिल हैं। उनके लिखे नग़मे मशहूर गायक रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद और लता मंगेशकर ने गाए।

“वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं”

ख़ुमार बाराबंकवी

उनकी शायरी में मोहब्बत का जो जादू है, वो परदे पर भी उसी ख़ुशबू के साथ उभरा। ख़ुमार बाराबंकवी की शायरी सिर्फ़ इश्क़ की दीवार तक महदूद नहीं थी। उसमें तन्हाई, विरह, वफ़ा, उम्मीद, और ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयां भी झलकती थीं। वो कहते हैं:

“दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए”

ख़ुमार बाराबंकवी

उनकी ग़ज़लों में जो रवानी है, वो आम इंसान के एहसासात की कहानी है। इसलिए उनकी शायरी हर तबक़े को छूती है। ना ज़्यादा क्लासिकल, ना ही बहुत आम- एक नफ़ासत के साथ।

ताज पोशी और अदबी मुक़ाम

ख़ुमार को उनके अदबी योगदान के लिए कई अवॉर्ड्स मिले जिनमें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवॉर्ड, ग़ालिब अवॉर्ड, और साहित्य सेवा सम्मान जैसे नाम शामिल हैं। उनका शुमार बीसवीं सदी के उन चंद शायरों में होता है जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को आम अवाम तक पहुंचाया।

“मोहब्बत को समझना है तो नासेह ख़ुद मोहब्बत कर
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफ़ां नहीं होता”

ख़ुमार बाराबंकवी

ज़िंदगी की आख़िरी शाम

19 फरवरी 1999, लखनऊ में ख़ुमार बाराबंकवी ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनकी शायरी आज भी मुशायरों की महफ़िलों में गूंजती है, दिलों में बसती है, और महबूब की याद में सिसकते लोगों को सहारा देती है।

ख़ुमार: एक एहसास, एक रूहानी सफ़र

ख़ुमार बाराबंकवी की शायरी आज भी रेडियो के तरन्नुम में, मुशायरों की महफ़िलों में, आशिक़ों की डायरी में और अदब के सफ़ों में ज़िंदा है। वो शायर जिसने मोहब्बत को लफ़्ज़ दिए, तन्हाई को सुकून दिया, और ग़ज़ल को नज़ाकत दी। ख़ुमार अब नहीं हैं, मगर उनके अल्फ़ाज़ आज भी ज़िंदा हैं और रहेंगे, जब तक मोहब्बत ज़िंदा है।

ये भी पढ़ें: मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

 




LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

लद्दाख में प्रशासनिक बदलाव: 7 स्वायत्त पहाड़ी परिषदों की घोषणा

लद्दाख के पहले के जम्मू-कश्मीर राज्य से अलग होकर...

खादी-कुचाई सिल्क : Global Stage पर छा रही है झारखंड की शान

झारखंड (Jharkhand) के गोड्डा, दुमका, खूंटी और रांची के...

सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग: शायरी, सियासत और इल्म की रौशन शख़्सियत

उर्दू अदब की तारीख़ में सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग...

गायब होता शिवलिंग, भगवान नाराज़ या मानवीय लापरवाही

ये बीस साल पहले की बात है। वर्ष 2006...

Topics

लद्दाख में प्रशासनिक बदलाव: 7 स्वायत्त पहाड़ी परिषदों की घोषणा

लद्दाख के पहले के जम्मू-कश्मीर राज्य से अलग होकर...

खादी-कुचाई सिल्क : Global Stage पर छा रही है झारखंड की शान

झारखंड (Jharkhand) के गोड्डा, दुमका, खूंटी और रांची के...

सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग: शायरी, सियासत और इल्म की रौशन शख़्सियत

उर्दू अदब की तारीख़ में सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग...

रेड कॉरिडोर से वापसी का रास्ता

सालों तक, दक्षिण बस्तर के जंगलों में रहने वाले...

मोहसिन ज़ैदी: सादगी, एहसास और उर्दू अदब की पहचान

उर्दू अदब की दुनिया में मोहसिन ज़ैदी ने ग़ज़ल...

मख़मूर सईदी: उर्दू अदब का संजीदा और फ़िक्रमंद शायर

उर्दू शायरी की दुनिया में मख़मूर सईदी का नाम...

Related Articles

Popular Categories