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मुनव्वर राना: मां की ममता से लिपटी उनकी और मुल्क की मोहब्बत से भरे शायर

जब भी शायरी की बात होती है, तो कुछ नाम लफ़्ज़ों की तरह नहीं, जज़्बात की तरह ज़हन में आते हैं। मुनव्वर राना उन्हीं नामों में से एक हैं- वो शायर जिन्होंने ‘मां’ को ग़ज़ल की ज़ुबान दी, और मोहब्बत को अदब की रुह बना दिया। उनकी शायरी में कोई बनावटी शान-ओ-शौकत नहीं, बल्कि सादगी, दिल से निकले लफ़्ज़ और ज़िंदगी के सच्चे तजुर्बे हैं। मुनव्वर राना वो शायर थे जिनकी ग़ज़लें किताबों से निकलकर मां की गोद, चौपाल की मिट्टी और हिजरत के आंसुओं में ढल जाती हैं।

‘किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में मां आई’

मुनव्वर राना

मुनव्वर राना की शायरी में मां की ममता की ऐसी खुशबू है कि हर पढ़ने वाला या सुनने वाला अपनी मां की आंचल की छांव महसूस करने लगता है। उन्होंने सिर्फ़ मां पर ही नहीं लिखा, बल्कि मुल्क, समाज और इंसानी जज़्बातों को भी अपनी शायरी का हिस्सा बनाया। उनकी शख़्सियत सादगी, बेबाकी और मुहब्बत का संगम थी। 

मुनव्वर राना का पूरा नाम मुनव्वर अली राना था। वो एक आम इंसान की तरह ही जीते थे, जिनमें कोई बनावट नहीं थी। उनकी ज़बान में लखनऊ की नफ़ासत थी, तो दिल में हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू। वो जितने बड़े शायर थे, उतने ही बेहतरीन इंसान भी। उनमें गुरूर नाम की कोई चीज़ नहीं थी। किसी से भी मिलते तो ऐसे जैसे बरसों पुरानी जान पहचान हो। उनकी बातचीत में एक अपनापन था जो सामने वाले को बांध लेता था।

लबों पे उस के कभी बद-दु’आ नहीं होती
बस एक मां है जो मुझ से ख़फ़ा नहीं होती

एक आंसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुम ने देखा नहीं आंखों का समुंदर होना

मुनव्वर राना

वो हमेशा सच बोलने से नहीं कतराते थे, चाहे वो कितना ही कड़वा क्यों न हो। यही बेबाकी उनकी शायरी में भी नज़र आती है। उनके शेर सीधे दिल में उतरते थे क्योंकि वो दिल से कहे जाते थे। उन्होंने कभी भी शायरी को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं समझा, बल्कि उसे अपने एहसासात और तजुर्बों को बयान करने का ज़रिया बनाया।

तालीम और इब्तिदाई ज़िंदगी: जद्दोजहद से भरा सफ़र

मुनव्वर राना कि पैदाइश 26 नवंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले में हुई। उनका बचपन तजुर्बों में गुज़रा। तालीम के लिए उन्हें काफ़ी जद्दोजहद करना पड़ा। उस दौर में रायबरेली जैसे छोटे शहर में अच्छी तालीम हासिल करना आसान नहीं था। उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम रायबरेली में ही हासिल की।

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक
मुझ को अपनी मां की मैली ओढ़नी अच्छी लगी

मुनव्वर राना

ख़ानदान की माली हालत ठीक न होने की वजह से उन्हें बचपन से ही ज़िम्मेदारियों का एहसास हो गया था। उन्होंने कलकत्ता का रुख़ किया, जहां उन्होंने टैक्सी भी चलाई और कई छोटे-मोटे काम भी किए। इन संघर्षों ने उन्हें ज़िंदगी के क़रीब से देखने का मौक़ा दिया। उन्होंने समाज के हर तबके के लोगों से मुलाकात की, उनके दुख-दर्द को समझा, और यही सब बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बना। ज़िंदगी की इस पाठशाला ने उन्हें जो सिखाया, वो किसी भी किताब से हासिल नहीं किया जा सकता था।

कलम से निकली मां की ममता

मुनव्वर राना ने शायरी की शुरुआत बहुत कम उम्र में ही कर दी थी। उनकी शायरी में जो गहराई और सच्चाई नज़र आती है, वो उनके शुरुआती संघर्षों का ही नतीजा है। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई हर तरह की शायरी में हाथ आज़माया, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा शोहरत अपनी मां पर लिखी गई शायरी से मिली।

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी मां सज्दे में रहती है

मुनव्वर राना

उनकी शायरी में मां का ज़िक्र इतने खुबसूरत और सच्चे अंदाज़ में मिलता है कि हर कोई उससे खुद को जोड़ पाता है। उनकी सबसे मशहूर पंक्तियों में से एक है: “लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती।”

मुनव्वर राना ने सिर्फ़ मां पर ही नहीं लिखा, बल्कि वतनपरस्ती, भाईचारा और इंसानियत के मौज़ुओं पर भी खूब लिखा। उनकी शायरी में एक पैग़ाम होता था, एक ऐसी बात जो समाज को जोड़ने और बेहतर बनाने की कोशिश करती थी। उन्होंने मुशायरों में अपनी शायरी को जिस अंदाज़ में पेश किया, उससे उन्हें ज़बरदस्त मक़बूलियत मिली। उनकी आवाज़ में एक अलग ही कशिश थी, जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।

मुनव्वर राना की शायरी की एक और ख़ासियत ये थी कि वो आम बोलचाल की ज़बान का इस्तेमाल करते थे। उनकी शायरी को समझने के लिए किसी ख़ास इल्म की ज़रूरत नहीं थी। यही वजह थी कि वो हर तबके के लोगों में मक़बूल हुए। उन्होंने शायरी को किताबों से निकालकर लोगों के दिलों तक पहुंचाया।

मुनव्वर राना की ज़िंदगी के कुछ यादगार लम्हे

मुनव्वर राना की ज़िंदगी कई दिलचस्प किस्सों से भरी थी, जो उनकी शख़्सियत को और भी रोशन करते हैं।

गंगा-जमुनी तहज़ीब के अलंबरदार

मुनव्वर राना हमेशा गंगा-जमुनी तहज़ीब के अलंबरदार रहे। उन्होंने अपनी शायरी में हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे का पैगाम दिया। एक बार उन्होंने एक मुशायरे में कहा, ‘हिंदुस्तान की पहचान उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब है। हम सब एक ही गुलदस्ते के फूल हैं।’ उनकी ये सोच उनकी शायरी में साफ झलकती थी, जहां वो सभी धर्मों और समुदायों के लोगों को एक साथ लेकर चलते थे।

‘ग़ज़ल’ बनाम ‘मां’

एक बार किसी इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि उनकी शायरी में सबसे अहम क्या है – ग़ज़ल या मां? उन्होंने तुरंत जवाब दिया, “मेरे लिए मां से बढ़कर कुछ नहीं। ग़ज़ल तो सिर्फ़ एक ज़रिया है जिसके ज़रिए मैं अपनी मां के जज़्बात और मुहब्बत को बयां करता हूं।” ये दर्शाता है कि उनकी शायरी का आधार उनकी मां ही थीं।

लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं हिन्दी मुस्कुराती है

मुनव्वर राना

एजाज़ात और इनामात

मुनव्वर राना को उनकी शायरी के लिए कई बड़े एजाज़ात से नवाज़ा गया। उन्हें 2014 में उनके काव्य संग्रह ‘शहदाबा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन उन्होंने बाद में ये पुरस्कार लौटा दिया। उनके इस क़दम ने पूरे देश में खूब सुर्खियां बटोरीं और उनकी बेबाकी का एक और सबूत था। उन्हें मिर्ज़ा ग़ालिब अवार्ड, अमीर खुसरो अवार्ड और कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया। इन पुरस्कारों ने उनकी शायरी को और भी पहचान दिलाई, लेकिन वो हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे।

विरासत और आख़िरी सफ़र

मुनव्वर राना का इंतक़ाल 14 जनवरी 2024 को 71 साल की उम्र में हुआ। उनके जाने से उर्दू अदब की दुनिया में एक बड़ा खालीपन आ गया। उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए मां की मुहब्बत, वतनपरस्ती और इंसानियत का जो पैग़ाम दिया, वो हमेशा ज़िंदा रहेगा। उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए है और आने वाली नस्लों को भी प्रेरित करती रहेगी।

उनकी विरासत सिर्फ़ उनके शेर नहीं हैं, बल्कि वो ज़िंदगी जीने का अंदाज़ है जो उन्होंने अपनी बेबाकी, मोहब्बत और सादगी से सिखाया। वो एक शायर ही नहीं, बल्कि एक फ़लसफ़ी थे, जिन्होंने अपने शब्दों से समाज को राह दिखाई। मुनव्वर राना हमेशा एक ऐसे शायर के तौर पर याद किए जाएंगे जिन्होंने अपनी कलम से मां के आंचल की छांव को हमेशा के लिए अमर कर दिया।

हम से मोहब्बत करने वाले रोते ही रह जाएंगे
हम जो किसी दिन सोए, तो फिर सोते ही रह जाएंगे

मुनव्वर राना

मैं अपने आप को इतना समेट सकता हूं
कहीं भी कब्र बना दो, मैं लेट सकता हूं

मुनव्वर राना

ये भी पढ़ें: डॉ. शारिक अक़ील: अलीगढ़ की फ़िज़ा में घुली उर्दू अदब की मिठास

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