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बिहू: असम की संस्कृति, एकता और समृद्धि का उत्सव

बिहू असम के लोगों के दिलों में बसने वाला एक बेहद ख़ास त्योहार है, जो हर साल तीन बार मनाया जाता है: रोंगाली (बोहाग), कोंगाली (कांति)और माघ। माघ बिहू, जिसे भोगाली भी कहा जाता है, जनवरी के महीने में मनाया जाता है और यह फसल की कटाई के समय को दर्शाता है। फसल के बाद घर में आए अनाज से सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।

पारंपरिक पकवान और मिठास

इसकी शुरुआत 13 जनवरी को होती है, जब लोग खरीदारी करके रात को ‘उरुका’ मनाते हैं। इस दौरान लकड़ी, बांस और घास से ‘मेजी घोर’ तैयार किया जाता है, जिसमें परिवार और दोस्त मिलकर एकत्रित होते हैं। पकवान अलाव पर बनाए जाते हैं, जिनमें बत्तख, मछली, नया चावल और ताजी सब्जियां शामिल होती हैं। 14 जनवरी को लोग नहा धोकर नया गमछा पहनकर ‘मेजी घोर’ को जलाते हैं और अग्नि देवता की पूजा करते हैं। इसके बाद पीठा, नारियल लड्डू और गुड़ का सेवन किया जाता है। 15 जनवरी को, युवा बुजु़र्गों से आशीर्वाद लेने के लिए नया गमछा और उपहार देते हैं, ताकि उनके जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहे।

एकता का ख़ूबसूरत उदाहरण ‘बिहू’

इस त्योहार की ख़ासियत यह है कि यह धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर मनाया जाता है। असम में हिंदू, मुस्लिम और आदिवासी सभी समुदाय एक साथ मनाते हैं, जो इस त्योहार को एकता का प्रतीक बनाता है।असम सरकार भी इस त्योहार की अहमियत को समझती है और लोगों को त्योहार से जुड़ी सभी आवश्यक चीजे़ें समय पर उपलब्ध कराती है। इस त्योहार के रंगीन माहौल में असम की महिलाएं पारंपरिक ‘मैखला चादर’ पहनकर और भी ख़ूबसूरत नज़र आती हैं, जो असम की संस्कृति और परंपरा को जीवित रखते हैं। असम के लोग अपनी संस्कृति से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं और बिहू इस जुड़ाव का सबसे सुंदर उदाहरण है।

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