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बिहार के इस गांव का मोहर्रम क्यों है ख़ास?

बिहार के सीवान ज़िले के भीखपुर गांव से निकलने वाला ताजिया हिंदू मुस्लिम एकता का अनूठा उदाहरण है। इस गांव में करीब 350 से 400 घर हैं और हिंदू-मुस्लिम समुदाय की आबादी लगभग बराबर है। यहां के लोगों का मानना है कि यहां ताजिया निकालने की परंपरा करीब 195 साल पुरानी है।

छोटे इमामबाड़े के नाम से फेमस अंजुमन रिज़विया में 80 फीट का ताजिया बनाया गया और बड़े इमामबाड़े अंजुमन अब्बासी में 84 फीट का ताजिया बनाया गया। ताजिया को हिंदू और मुस्लिम कारीगर मिलजुल कर बनाया है। ताजिया जब बनाया जाता है तो गांव से बाहर के युवक भी गांव आ जाते हैं।

सिर्फ मुसलमान ही नहीं गांव में कई हिंदू परिवार भी ताजिया रखते हैं। चैनपुर बाजार के चुन्नीलाल मुन्नीलाल के ताजिया के नाम से प्रसिद्ध ताजिया इस बार भी बन रहा है। चुन्नीलाल का ताजिया करीब 70 सालों से रखा जा रहा है। भीखपुर के ताजिया उठने से पहले यहां के लोग चुन्नीलाल के दरवाजे पर जाकर मजलिस और मातम करते हैं।

इस काम में गांव के हिंदू-मुसलमान दोनों को मुहर्रम के दिन इमामबाड़ा से एक विशाल जुलूस के साथ कर्बला तक ले जाया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु ताजिये पर बताशा, लड्डू, मलीदा, शर्बत, खिचड़ी रोटी, तिलक, नारियल वगैरह रखते हैं।

सीवान जिले के ठेपहा गांव में भी ये जुलूस निकलता है। ठेपहा के निवासी ललन चौधरी के मुताबिक, “हम मुहर्रम मानते भी हैं, और मुसलमानों के साथ ताजिया जुलूस भी निकालते हैं।”गांव की मस्जिद के मौलाना शम्सुल हक का कहना है, “मुहर्रम मनाने वाले हिंदू दूसरों को शांति, सद्भाव और भाईचारे का संदेश देते हैं।”

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