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आज़ादी की शमा जलाने वाले औलिया बोगा बाबा का मज़ार हिंदू-मुस्लिमों के अटूट रिश्ते की देता है गवाही

असम सैकड़ों सालों से हिंदू और मुस्लिम के सौहार्दपूर्ण रिश्तों की कहानियां बयां करता आया है। आज के वक्त में भी असम के डिब्रूगढ़ ज़िले के मराई गांव में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारा दिखाई पड़ता है जो उनके अटूट रिश्ते की गवाही देता है।

डिब्रूगढ़ ज़िले के मराई गांव से गुजरने वाले नेशनल हाईवे 15 के किनारे है बोगा बाबा का मज़ार। ये मज़ार सौहार्द और भाईचारे का मिसाल है। बोगा बाबा का मज़ार पर सभी धर्मों के लोग आते हैं। मज़ार पर सिर्फ असम के के ही नहीं आते बल्कि देशभर के अक़ीदतमंद लोग आते हैं। दूर-दूर से ट्रक और बसें दान देने और दुआ करने के लिए यहां रुकती हैं। इसके अलावा, दरगाह पर राहगीरों के लिए पीने के लिए मुफ्त पानी की सुविधा मौजूद है।

बोगा बाबा का असली नाम औलिया अब्दुल खालिक था। वो 1919 में सिपाझार के मराई गांव में आए थे और उन्होंने डिब्रूगढ़ ज़िले में इस्लाम का प्रचार किया। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का भी नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

बोगा बाबा का मज़ार की देखरेख करने वाले हाफिज़ अली आव़ाज-द वॉयस को बताते हैं कि, ‘‘मौलवी ने यहां इस्लाम की मशाल जलाई। धर्म का प्रचार करने के साथ-साथ शांति, सद्भाव और भाईचारे का संदेश भी फैलाया। बोगा बाबा को सभी लोग अल्लाह के औलिया (किसी दैवीय शक्ति के स्वामी) मानते हैं।

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