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बच्चों को भूख और शिक्षा में से एक को न चुनना पड़े इसलिए खोली फ्री लाइब्ररी

बच्चों को भूख और किताबों में से किसी एक को न चुनना पड़े इसके लिए असम की रहने वाली ऋतूपूर्णा ने ओगने फ्री लाइब्ररी खोली है। उनकी इस पहल को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने सोशल वर्क के क्षेत्र में पढ़ाई की और अमस की अलग अलग सोशल वर्क सोसाइटी के साथ काम करना शुरू किया । 

ऋतूपूर्णा नेओग का बचपन बाकी बच्चों की तरह सामान्य था लेकिन जैसे ही वो किशोर अवस्था में आई उन्हें अपने लड़कियों जैसे स्वभाव के लिए स्कूल में कई ताने सुनने पड़े। यह समय उनके लिए काफी मुश्किलभरा रहा लेकिन माता पिता के साथ ने उन्हें कभी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। 

ऋतूपूर्णा शुरू में ही शिक्षा की ताकत को समझ गई थी। शिक्षा की इस ताकत को हर एक इंसान तक पहुंचाने के लिए उन्होंने गांव में फ्री लाइब्रेरी बनाने का सपना देखा और उसे पूरा भी किया। अपनी 600 किताबों और अपने माता-पिता की मदद से गांव में पहली फ्री लाइब्रेरी ‘Kitape Katha Koi’ की शुरुआत की। 

महज 600 किताबों से शुरू हुई लाइब्रेरी में आज 1200 से ज्यादा किताबें हैं। आज वह असम के दो गांवों में दो फ्री लाइब्ररी के तहत 200 से ज्यादा बच्चों की मदद कर रही हैं। इतना ही नहीं वह समय-समय अलग गांवों में जाकर स्टोरीटेलिंग प्रोग्राम भी करती रहती हैं। 

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ये भी पढ़ें: ‘तहकीक-ए-हिंद’: उज़्बेकिस्तान में जन्मे अल-बीरूनी का हिंदुस्तान की सरज़मीं से ख़ास रिश्ता

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