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दिवाली: गुवाहाटी में दिव्यांग छात्रों ने दीयें बनाकर लोगों के घरों को किया रौशन 

दिवाली खुशियों का त्योहार, रौशनी का त्योहार, जगमग दीयों से सराबोर होते घर गलियारे और चेहरों पर मुस्कान का त्योहार। यह कहना गलत नहीं होगा कि दिवाली लोगों को रोजगार भी देती है। असम के गुवाहाटी में शिशु सरोठी सेंटर फॉर रिहैबिलिटेशन एंड ट्रेनिंग फॉर मल्टीपल डिसेबिलिटी स्कूल में दिव्यांग छात्र मिट्टी के दीये बनाते है। यह संस्था दिव्यांगजनों को छोटी उम्र से ही उनकी स्किल से रूबरू कराने की पहल कर रहा है ताकि वह बड़े होकर आत्मनिर्भर बन सके।

अलग-अलग रंगों से सजे दीपकों पर दिव्यांग छात्रों की मेहनत और लगन की छाप दिखती है। इस काम के लिए सेंटर के वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर में स्टूडेंट को स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। इन छात्रों द्वारा तैयार किए गए यह दीपक गुवाहाटी में सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों में बेचे जाते हैं। दिव्यांग छात्रों को ट्रेनिंग देने का मकसद है कि समाज दिव्यांगों के प्रति अपना नज़रिया बदले और संवेदनशील बने। लोग इस बात को समझे कि अगर ‘दिव्यांग’ बच्चो के अंदर के गुण को पहचान कर उसी दिशा में उन को ट्रेनिंग दी जाए तो वह आत्मनिर्भर बनने के तरफ अपना कदम तेज़ी से बढ़ाएंगे।

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मैनेजर कम्यूनिकेशन राजश्री दास. Image Source by DNN2

गुवाहाटी शिशु सरोठी सेंटर की मैनेजर कम्यूनिकेशन राजश्री दास बताती है कि “दिवाली आने से पहले हम हर साल दीयें बनाते है। दिए के अलावा भी कई चीजें बनाई जाती है। बच्चों को ट्रेनिंग देते है जिससे वह बड़े होकर किसी पर आश्रित न हो और खुद अपनी जिंदगी व्यतीत कर सके। जब कोई इंसान दिव्यांग होता है तो उन्हें बहुत सहानुभूति की नजर से देखा जाता है लोग सोचते है कि वह हमेशा किसी पर आश्रित ही रहेंगे जैसे अपने परिवार और समाज पर, यह सोच लोगों की हम बदलना चाहते है।”

एक छोटे कमरे में सिर्फ दो बच्चों के साथ शुरू किया शिशु सरोठी सेंटर

शिशु सरोठी सेंटर फॉर रिहैबिलिटेशन एंड ट्रेनिंग फॉर मल्टीपल डिसेबिलिटी स्कूल की शुरुआत गुवाहाटी में साल 1987 में एक छोटे से कमरे में केवल दो बच्चों के साथ हुई थी। और आज 150 से ज्यादा दिव्यांग छात्रों को यहाँ आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश जारी है। सेंटर की टीचर बताती हैं कि यहाँ के छात्र प्रतिभाशाली हैं। अगर उन्हें प्यार और धैर्य के साथ कुछ सिखाया जाए तो वो सीख जाते हैं। यहाँ के टीचर इन बच्चों के साथ काम करते हुए बहुत खुश हैं। रंग बिरंगे दीपक बनाने के लिए भी उन्हें ट्रेनिंग दी गई है। कुछ तो खास डिजाइनर दीए बनाने में माहिर हैं। इन बच्चों को दीवाली का इंतज़ार इसलिए भी रहता है कि उन्हें दीया बनाना अच्छा लगता है। ये बच्चे दीए बेच कर अच्छा पैसे भी कमा लेते हैं।

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दिव्यांग छात्रों द्वारा बनाए गए दीयें. Image Source by DNN24

शिशु सरोठी सेंटर ने असम, पूर्वोत्तर भारत के पड़ोसी राज्यों और अलग-अलग विकासात्मक विकलांगताओं वाले हजारों बच्चों तक पहुंचने के लिए सेवाओं का विस्तार किया है। सेंटर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य सेवाओं के साथ, जीवन भर की जरूरतों को पूरा करने के लिए परियोजनाओं और कार्यक्रमों का सहारा लेता है। पिछले तीन से ज्यादा दशकों में अपनी टीम के साथ अवसरों और चुनौतियों का जवाब दिया जब है विकलांगता मामलों पर एक अग्रणी क्षेत्रीय संस्थान शिशु सरोठी सेंटर बनने के लिए विकसित हुए।

कई अवॉर्ड से किया जा चुका है सम्मानित

2016 में विशेष आवश्यकता वाले लोगों के लिए उत्कृष्ट कार्य के लिए नीना सिब्बल मेमोरियल अवार्ड, वर्ष 2013 में पूर्वात्र प्रादेशिक मारवाड़ी युवा मंच महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 2010 में राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार पूर्व निदेशक मीरा कागती को प्रदान किया गया था, 2007 में असम के मुख्यमंत्री से सर्वश्रेष्ठ सामुदायिक सेवा के लिए राज्य पुरस्कार, 2004 में भारत के राष्ट्रपति से सर्वश्रेष्ठ संस्थान का राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल है।

स्कूल की दिव्यांग छात्र त्रिशाह कहती है कि “रेनू दीदी ने मुझे सीखाया है। हर साल दीवाली मनाई जाती है। हम पटाखे भी खरीदते है। ”एक अन्य छात्र आदित्य अग्रवाल कहते है कि “दिया बनाना और उनको कलर्स करना बहुत अच्छा लगता है। मैं दिए बनाकर लोगों को, अपने दोस्तों को बेचता हूं।”

यह बच्चे ना सिर्फ दीपक बनाते हैं बल्कि पेपर क्राफ्टिंग में भी माहिर हैं। यहां बच्चों को स्क्रीन प्रिंटिंग – पोशाक आभूषण, बागवानी और नर्सरी स्किल, और कंप्यूटर की ट्रैनिंग भी दी जाती है। छात्रों द्वारा बनाए गए इन प्रोडक्ट की बिक्री से मिली आमदनी का एक हिस्सा उन्हें मिलता है। इसका उद्देश्य दिव्यांग वयस्कों को सशक्त बनाना है ताकि वे भविष्य में आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकें।

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