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हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार

होली बसंत के आगमन का ऐलान है. ख़ुदा-ए-सुखन मीर तक़ी मीर ने होली पर एक मसनवी लिखी है जिसकी शुरुआत में वे कहते हैं-

आओ साक़ी बहार फिर आई
होली में कितनी शादियाँ लाई

और फिर आगे अपनी ही बात पर मोहर लगाते हुए होली को जश्ने-नौरोज़े-हिन्द बताते हैं-

कुमकुमे भर गुलाल जो मारे
महवशां लालारुख हुए सारे
ख्वान भर-भर अबीर लाते हैं
गुल की पत्ती मिला उड़ाते हैं
जश्ने-नौरोज़े-हिन्द होली है
राग रंग और बोली ठोली है

होली और बसंत को विषयवस्तु बना कर उर्दू ज़बान में खूब शायरी की गई है. आगरे के रहने वाले फकीर मौला शायर नज़ीर अकबराबादी के यहाँ होली जीवन का उत्सव है जिसे केंद्र में रखकर उन्होंने कोई दर्ज़न भर लम्बी नज्में कहीं हैं. उनकी रचना ‘जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की’ को सुपरिचित शास्त्रीय गायिका छाया गांगुली ने दुनिया भर में मशहूर किया है. नजीर की कविता में रंग और मस्ती के इस त्यौहार को मनाने का जैसा विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है, वह उस समय के सामाजिक सौहार्द की जीवंत मिसाल है.

नज़ीर अकबराबादी (तस्वीर साभार: Rekhta)

लोगों के दरम्यान होने वाली शरारतें-ठिठोलियाँ और मौज-मस्ती नजीर की होली विषयक शायरी की आत्मा है. मिसाल के लिए-

या स्वांग कहूं, या रंग कहूं, या हुस्न बताऊं होली का
सब अबरन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका
हंस देना हर दम, नाज भरा, दिखलाना सजधज शोख़ी का
हर गाली मिसरी, क़न्द भरी, हर एक कदम अटखेली का
दिल शाद किया और मोह लिया, यह जीवन पाया होली ने

या फिर यह –

जब आई होली रंग भरी, सो नाज़ो-अदा से मटक-मटक
और घूंघट के पट खोल दिये, वह रूप दिखाया चमक-चमक
कुछ मुखड़ा करता दमक-दमक कुछ अबरन करता झलक-झलक
जब पांव रखा खु़शवक़्ती से तब पायल बाजी झनक-झनक

आशिक़ और माशूका की प्यार भरी चुहल, नोंकझोंक और छेड़छाड़ भी नज़ीर अकबराबादी के होली-काव्य में खूब देखने को मिलती है. इस के लिए वे देश की सबसे अधिक प्रचलित कृष्ण-राधा की छवि का इस्तेमाल करते हैं.

घनश्याम इधर से जब आए वां गोरी की कर तैयारी
और आई उधर से रंग लिए खुश होती वां राधा प्यार
जब श्याम ने राधा गोरी के इक भर कर मारी पिचकारी
तब मुख पर छीटे आन पड़ी और भीज गई तन की सारी
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में

नजीर से दो पीढ़ी पहले गुजरात के सूरत में पैदा हुए शायर मीर अब्दुल वली उर्फ़ वली उज़लत के यहाँ भी होली का ज़िक्र आता है –

सहज याद आ गया वो लाल होली-बाज़ जूँ दिल में
गुलाली हो गया तन पर मिरे ख़िर्क़ा जो उजला था

उफ़ुक़ लखनवी साहब का शेर है–

साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की
हर सू बहार पेश-ए-नज़र है बसंत की

उफ़ुक़ लखनवी (तस्वीर साभार: Rekhta)

थोड़ा विषयांतर है कि उफ़ुक़ साहब लखनऊ के एक शायराना खानदान से ताल्लुक रखते थे. उनका असल नाम मुंशी द्वारका प्रसाद था. उनके पिता मुंशी पूरन चंद भी शायरी करते थे और ‘ज़र्रा’ तखल्लुस रखते थे. उनके दादा और परदादा  क्रमशः मुंशी ईश्वर प्रसाद ‘शुआ’ और मुंशी उदय प्रसाद ‘मतला’ भी अपने ज़मानों में मशहूर शायर रह चुके थे. उफ़ुक़ लखनवी अंग्रेज़ी, संस्कृत और उर्दू के विद्वान थे और उन्होंने अनेक ग्रंथों के अलावा ‘महाभारत’ और ‘गीता’ के उर्दू में गद्य अनुवाद किये थे. उनके बेटे हुए मुंशी बिशेश्वर प्रसाद. जीवन यापन के लिए बिशेश्वर प्रसाद ने रेलवे की नौकरी की और अपने कुल की रीति निबाहते हुए शायरी के अलावा अनुवाद में भी उल्लेखनीय काम किया. उनके पिता ने ‘गीता’ का उर्दू गद्य में अनुवाद किया था तो उन्होंने इस काम को पद्य में पूरा किया. ‘नसीम- ए-इरफ़ान’ शीर्षक से छपा यह अनुवाद तारीखी महत्त्व रखता है. मुंशी बिशेश्वर प्रसाद ‘मुनव्वर’ लखनवी के नाम से जाने गए.

जिस लखनऊ ने ऐसे बाकमाल शायर-परिवार को देखा उसी लखनऊ में मीर तक़ी मीर ने अपने जीवन का आखिरी समय गुज़ारा. दिल्ली-आगरा में तमाम तरह के कष्ट झेलने के बाद उन्हें इसी शहर में वह इज्ज़त और शोहरत नसीब हुई जिसके वे हक़दार थे. अपनी मसनवी ‘होली’ में वे इसकी तरफ इशारा करते हुए कहते हैं–

चश्मे-बद्दूर ऐसी बस्ती से
यही मक़सद है मिल्के-हस्ती से
लखनऊ दिल्ली से भी बेहतर है
कि किसू दिल की लाग इधर है

लखनऊ के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के दरबार की होली का शानदार ज़िक्र तमाम जगहों पर देखने सुनने को मिलता है.

वज़ीद अली शाह (तस्वीर साभार: Pinterest)

सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से कहीं भिन्न और सुदूर मेरे कुमाऊँ में परम्परागत तरीके से  हर होली के बाद जिस गीत के साथ सबको मंगल कामनाएं दिए जाने का रिवाज है वह इन्हीं नवाब वाजिद अली शाह का लिखा हुआ है

बारादरी में रंग बन्यो है
कुंजन बीच मची होली
हो मुबारक मंजरी फूलों भरी
ऐसी होली खेलें जनाब-ए-अली

भारत ऐसा ही है. किसी भी गलीचे का कोई तार खींच कर देखिये उसका अगला सिरा खोजने के लिए दुनिया का फेरा लगाना होगा.

अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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