उत्तराखण्ड के नैनीताल ज़िले में कालाढूंगी नाम का एक छोटा-सा क़स्बा है. यहीं आकर जिम कॉर्बेट ने अपने जीवन का उत्तरार्ध बसाया और इसे एक आत्मीय नाम दिया – छोटी हल्द्वानी।
कॉर्बेट का बचपन भी यहीं बीता. पिता पोस्टमास्टर थे और अंग्रेज़ी सरकार से मिली चालीस एकड़ ज़मीन—एक तरह का शुरुआती विशेषाधिकार—उनके पास था। पढ़ाई के बाद रेलवे की नौकरी, फिर बिहार की पोस्टिंग, और उसके बाद पहला विश्वयुद्ध,जिसके दौरान वे कैप्टन के रूप में कुमाऊं के पांच सौ जवानों को लेकर फ्रांस पहुंचे और मेजर बनकर लौटे. यह वह हिस्सा है जिसे इतिहास साफ-सुथरी पंक्तियों में लिख देता है, लेकिन कॉर्बेट की असल कहानी इन औपचारिक उपलब्धियों के बीच नहीं, उनके बाहर घटती है।
नौकरी छोड़कर उन्होंने प्रॉपर्टी का काम शुरू किया. हफ़्ते के पांच दिन नैनीताल जाना पड़ता और कालाढूंगी से नैनीताल के बीच मंगोली और घटगढ़ के घने जंगलों से होकर घोड़े पर उनका आना-जाना, स्थानीय लोगों की स्मृति में किसी चलती तस्वीर की तरह दर्ज रहा। नैनीताल में उनके अंग्रेज़ दोस्तों की महफ़िलें थीं, आराम की सारी सुविधाएं थीं, फिर भी उनका मन कालाढूंगी में लगता जहां जंगल था, और जंगल के भीतर वह जीवन, जिससे उन्हें बेपनाह मोहब्बत थी।

शुरुआत में शिकारी, बाद में पर्यावरणविद – कॉर्बेट ने तराई और भाबर के जंगलों को सिर्फ नापा नहीं, जिया. 1907 से 1929 के बीच उन्होंने कई नरभक्षी बाघों को मारा – चम्पावत, पनार, रुद्रप्रयाग वगैरह सिर्फ नाम सिर्फ भूगोल नहीं, भय के इतिहास हैं. चम्पावत का बाघ जिसने चार सौ छत्तीस जानें लीं. यह आँकड़ा सुनते ही शिकार की रोमांचकता का जादू टूट जाता है और उसकी जगह एक सामाजिक राहत का बोध आता है।
लेकिन कॉर्बेट को सिर्फ शिकारी कह देना एक तरह की आलस्यपूर्ण सरलीकरण होगा। उनकी किताबें जिनमें शिकार की कहानियां हैं, दरअसल मनुष्यों की डायरी हैं। वे अपने आसपास के लोगों को, उनकी बोलियों, आदतों और दुख-सुख को जिस आत्मीयता से दर्ज करते हैं, वह उन्हें एक किस्म का मानवशास्त्री बना देता है. कालाढूंगी और आसपास के गांवों के लोग उनके लिए चरित्र नहीं, रिश्ते थे जो उनकी मृत्यु तक बने रहे।
उनकी बहन मैगी के साथ कालाढूंगी का घर एक छोटा-सा संसार था। उनके साथ रहने को घरेलू मददगार रामसिंह और उसका परिवार था. 1947 में जब कॉर्बेट ने भारत छोड़कर केन्या बसने का फ़ैसला किया, तो सबसे ऊपर उन्हें इसी परिवार की चिंता थी. ज़मीन का एक टुकड़ा रामसिंह के नाम करना, हर महीने उनकी आर्थिक सहायता का प्रबंध करना और बाद में 1955 में उनकी मृत्यु के बाद मैगी द्वारा इस जिम्मेदारी को निभाते रहना – ये बातें कॉर्बेट के चरित्र को किसी भी औपचारिक सम्मान से बड़ा बना देते हैं।

जिम कॉर्बेट की किताबों में कालाढूंगी वाले उनके संसार के तमाम ज़रूरी लोग हमेशा के लिए दर्ज हैं। हर शिकार में उनके साथी, छोटी हल्द्वानी के ग्राम प्रधान बहादुर ख़ान जो एक कुशल शिकारी और फोटोग्राफर थे. मोती सिंह, जिन्हें कॉर्बेट ने अपने मुख्य सहायक की तरह साथ रखा, एक एक गरीब किसान थे लेकिन जंगल की उनकी समझ असाधारण थी। फिर उसका बेटा पान सिंह और एक कुंवर सिंह भी था जो था तो एक क्रूर शिकारी और जिससे कॉर्बेट अक्सर असहमत रहते थे, लेकिन उससे भी उन्होंने जंगल की कुछ ज़रूरी बारीकियां सीखीं।

और फिर उनके कुत्ते, रोबिन और रोसीना। जिन आत्मीयता से कॉर्बेट ने उन्हें याद किया है, वह किसी भी संवेदनशील पाठक को ठहरकर पढ़ने को मजबूर करता है। कालाढूंगी के उनके घर, जो अब एक संग्रहालय है,के एक कोने में इनकी कब्रें हैं। उन्हें देखना, दरअसल कॉर्बेट के भीतर के आदमी को देखना है।
भारत से उनका प्रेम उनकी किताब ‘माय इंडिया’ में असाधारण तरीके से नज़र आता है। वे जिस अपने भारत’ की बात करते हैं वह दरअसल उन चालीस करोड़ लोगों का भारत था, जिनमें अधिकांश गरीब, ईमानदार और मेहनतकश थे। आज भी यह वही भारत है जो अक्सर हाशिए पर खड़ा दिखाई देता है।

एक शिकारी के रूप में कॉर्बेट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शायद यह था कि उन्होंने बाघों के नरभक्षी बनने के कारणों को समझा। चम्पावत की बाघिन, जिसके दांत एक पुराने गोली के घाव से खराब हो गए थे, सामान्य शिकार करने में असमर्थ होकर मनुष्यों की ओर मुड़ी। यह समझ उन्हें संरक्षण की ओर ले गई। 1936 में भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान, हेली नेशनल पार्क, की स्थापना में उनकी भूमिका निर्णायक रही। इसी काम के लिए उन्हें ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि मिली। बाद में इस पार्क को उन्हीं का नाम हासिल हुआ और आज संसार भर में जिम कॉर्बेट पार्क का बड़ा नाम है
कॉर्बेट को याद करना, दरअसल उस दुर्लभ मनुष्य को याद करना है जिसने बंदूक भी उठाई और जंगल की हिफ़ाज़त की बात भी की। जिसने शिकार किया, और अंततः जीवन की तरफ़दारी की। वे सही मायनों में कैसर-ए-हिन्द कहलाये जाने लायक थे।
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