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ज़िंदगी चलने का नाम है: आत्मनिर्भर शिल्पकार अब्दुल मजीद की कृतियां

एक कलाकार की आत्मा और विचार उसकी कला में हमेशा नज़र आते हैं, बल्कि ये उस कलाकार की आत्मा और विचार का अक्स होते हैं। अब्दुल मजीद अपने हाथों से छोटी-छोटी साइकिल और रिक्शे बनाते हैं, और ऐसा करके वह बता रहे हैं कि ज़िंदगी बस चलते रहने का नाम है, चाहे रास्ते कितने भी मुश्किल क्यों न हों।

अब्दुल मजीद उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बांगरमऊ के रहने वाले हैं। हर रोज़ शाम को वह कैथेड्रल स्कूल के मेन गेट के बाहर अपने काम में व्यस्त रहते हैं। उनके काम में एक अद्भुत जान होती है, एक ऐसा जादू जो उनके कुशल हाथों से निकलकर बेजान कृतियों में भी जान डाल देता है। लेकिन दुख की बात यह है कि इस अनमोल कला के बदले उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं। उनका कहना है, “इस काम में रोटी कम है, तारीफ ज़्यादा है। लोग मेरा काम बहुत पसंद करते हैं, लेकिन शायद उनकी नज़र में इसकी असल कीमत नहीं है।”

अब्दुल मजीद की कृतियों में बसी आत्मा

अब्दुल मजीद ने इस कला को छोटे भाई को सिखाया। उनका कहना है, “मुझे खाली बैठना बिल्कुल पसंद नहीं है, इसलिए मैं इसे जारी रखता हूं।” उनकी कहानी महज़ एक कारीगर की नहीं, बल्कि एक ज़िंदा दिल की कहानी है। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इन कारीगरों और उनके काम को पहचानें, उनका समर्थन करें, और उनके योगदान को सराहें। चाहे हम उनके उत्पाद खरीदकर, उनकी कहानियों को साझा करके, या उनकी कृतियों को अपनी परियोजनाओं में शामिल करके उनका उत्साह बढ़ाएं, हर छोटा सा कदम बदलाव ला सकता है।

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