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मीर तक़ी मीर का अहाता

मीर तक़ी मीर के व्यक्तित्व के बारे में सबसे प्रामाणिक जानकारी खुद उनकी लिखी आपबीती ‘ज़िक्र-ए-मीर’ के अलावा जिस एक पुरानी किताब में मिलती है वह है मौलाना मुहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ की तारीखी रचना ‘आब-ए-हयात’।

मौलाना हुसैन की किताब के हवाले से मालूम चलता है कि मीर तक़ी मीर को तमाम तरह के जानवर पालने का शौक़ भी था। उन्होंने एक कुत्ता और एक बिलौटा पाल रखा था। इन दोनों को उन्होंने अपनी शायरी में जगह दी और दोनों पर एक मसनवी लिखी। मसनवी उर्दू कविता का एक विशिष्ट प्रारूप होता है।

उनके यहाँ एक बकरी भी थी जिसके चार थन थे। बकरी ने बच्चे को जन्म दिया तो उसके सिर्फ एक ही थन में दूध उतर सका। नतीजतन दूध की मात्रा मेमने के लिए कम पड़ती थी। मेमने को बचाने की नीयत से बाज़ार से दूध मंगवा पर उसे पिलाया जाता था। मोहब्बत से पाले गए इस मेमने के जीवन, उसकी शैतानियों और उसकी मस्तियों को विषयवस्तु बना कर भी मीर साहब ने एक मसनवी लिखी।

मीर तक़ी ने मुर्गे भी पाले थे जिनमें से एक की बहादुरी के वे कायल थे। एक बिल्ली द्वारा किये गये हमले में उसकी जान चली गई तो उन्होंने उसका मर्सिया लिखा। इस शोकगीत में वे बताते हैं कि वह उनका प्रिय मुर्गा था और बड़ा अच्छा था। जिस रोज़ बिल्ली ने उस पर हमला किया उसने बड़े साहस के साथ अपना बचाव करने की कोशिश की और भरसक लड़ा। लेकिन आखिरकार वह मरा गया। इस साधारण सी थीम पर लिखी उनकी यह कविता बहुत आनंद देती है। इसमें एक शेर इस तरह है:

झुका बसूए क़दम सर से खरोसे बेजां का

ज़मीं पे ताज गिरा हुदहुद-ए-सुलेमां का

Mir Taqi Mir (मीर तक़ी मीर)

हाल के वर्षों में मीर तक़ी मीर की शायरी के अनछुए आयामों को खोजने की गंभीर कोशिशें हुई हैं। ऐसा करने वालों में बड़े साहित्यकार, विद्वान और शोधकर्ता शामिल हैं. इनमें सरे-फेहरिस्त हमारे समय के बड़े अदीब मरहूम शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का नाम लिया जाना चाहिए जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘शेर-ए-शोरअंगेज़’ में मीर की शायरी को देखने के लिए एक नई दृष्टि उपलब्ध कराई है। वे मीर की शायरी को लेकर इस प्रचलित भ्रम को तोड़ने की लगातार कोशिश करते रहे हैं कि वे फ़क़त दर्द और दुःख के शायर हैं। उनकी एकान्तप्रियता और सनकीपन के बारे में फैलाई गयी अनेक झूठी बातों को दरकिनार करते हुए अपने तमाम लेखों, और भाषणों में फारूकी साहब ने इस बात को लगातार रेखांकित किया है कि मीर तक़ी मीर जीवन के उत्सव के शायर हैं जिनकी निगाह से कोई रंग नहीं छूटा।

इस सिलसिले में एक बातचीत में वे मीर की लिखी एक कविता का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने अपनी पालतू बिल्ली पर लिखी थी। बिल्ली पर लिखी इस नज़्म को मौलाना मुहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ की ‘आब-ए-हयात’ में भी जगह मिली है।

मोहनी नाम की इस बिल्ली को मीर साहब बेहद प्यार से याद करते हैं:

एक बिल्ली मोहनी था उस का नाम

उस ने मेरे घर किया आ कर क़याम

एक से दो हो गई उल्फ़त-गुज़ीं

कम बहुत जाने लगी उठ कर कहीं

बोरिए पर मेरे उस की ख़्वाब-गाह

दिल से मेरे ख़ास उस को एक राह

मैं न हूँ तो राह देखे कुछ न खाए

जान पावे सुन मिरी आवाज़-ए-पा पाए

बिल्लियाँ होती हैं अच्छी हर कहीं

ये तमाशा सा है बिल्ली तो नहीं

सबसे आगे आन पहुंचे दर तलक

देखे मेरे पाँव से सर तलक

आँख से मालूम हो मुश्ताक है

बिल्ली या अजूबा-ए-आफाक़ है

वे मोहनी की लताफ़त और नफासत का ज़िक्र करते हुए बयान करते हैं कि वह बिचारी जब कभी बच्चे देती वे मर जाते थे। उन्होंने उसके लिए ताबीज़-गंडे और टोटके तक बनवाये। झाड़-फूंक कराई तब जाकर बड़ी मुश्किल से उसके बच्चे बच सके। पांच बच्चे हुए जो इस कदर दिलकश थे कि –

ज़र्द ज़र्द उनकी दुमें मुंह नर्म नर्म

लच्छे रेशम के चंदी रंगों-खाल

कुछ सफ़ेद औ कुछ सियाह

कुछ ज़रदो-लाल

आ निकलते थे जिधर ये चार-पांच

वो तरफ हो जाती थी बाग़ो-बहार

मीर की भाषा में ऐसी मीठी कूव्वत है कि नज़्म का आखिर आते आते आप मोहनी और उसके पाँचों बच्चों को देख तक सकते हैं। अंत में जब वे किसी दार्शनिक की सी निस्पृहता के साथ उसकी मौत की सूचना देते हैं तो एकबारगी आँखें भर आती हैं।

किस्सा कोताह मोहनी आगे मुई

यक क़यामत जान पर उस बन हुई

सब्र बिन चारा न था आखिर किया

बल्लीमाराँ में उसे गड़वा दिया।

अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। पिछले साल प्रकाशित उनका उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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Ashok Pande
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अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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