फ़ारसी के तख़्त का अर्थ है सिंहासन अर्थात सत्ता का आसन लेकिन सिख इतिहास में इस शब्द ने एक बिल्कुल अलग और गहरा अर्थ ग्रहण किया। ये वे स्थान हैं जहां आध्यात्मिकता और सामाजिक-राजनीतिक ज़िम्मेदारी, यानी पीरी और मीरी, एक-दूसरे से मिलती हैं। आज सिख पंथ अपने पांच तख़्तों को सर्वोच्च धार्मिक और सामुदायिक प्राधिकार के केंद्र के रूप में मानता है। ये पांच तख़्त हैं – अमृतसर का अकाल तख़्त, आनंदपुर साहिब का केसगढ़ साहिब, पटना साहिब, नांदेड का हज़ूर साहिब और तलवंडी साबो का दमदमा साहिब।
ये पांचों तख़्त एक ही समय में नहीं बने। इनका इतिहास लगभग एक सदी से अधिक समय में धीरे-धीरे विकसित हुआ। वास्तव में पंज तख़्तों के इतिहास में सिख इतिहास की दीर्घ यात्रा निहित है। इस यात्रा में गुरु हरगोबिंद से लेकर गुरु गोबिंद सिंह तक और फिर गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु के रूप में स्वीकार किए जाने तक के पड़ाव सम्मिलित हैं।

अमृतसर में हरमंदिर साहिब के सामने स्थित अकाल तख़्त पांचों में सबसे पुराना और सर्वोच्च माना जाता है। इसकी स्थापना छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब ने 1606 में की। यह वह समय था जब गुरु अर्जन देव की शहादत के बाद सिख समुदाय के सामने एक नया ऐतिहासिक प्रश्न खड़ा हो चुका था कि क्या धर्म केवल व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग रहेगा या अन्याय के सामने सामुदायिक प्रतिरोध का आधार भी बनेगा? गुरु हरगोबिंद का उत्तर था – दोनों। उन्होंने मीरी और पीरी की अवधारणा के माध्यम से आध्यात्मिक और सांसारिक उत्तरदायित्व को एक साथ रखा।
यदि अकाल तख़्त सिख सत्ता की चेतना का आरम्भ है, तो आनंदपुर साहिब का केसगढ़ साहिब खालसा की आत्मा का जन्मस्थान है। 1699 के साल गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर में वह ऐतिहासिक सभा की जिसमें उन्होंने संगत के सामने अपने लिए एक सिर मांगा। एक-एक करके दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोखम चंद और साहिब चंद आगे आए. यही पांच आगे चलकर पंज प्यारे कहलाए। गुरु ने उन्हें अमृत प्रदान किया और खालसा पंथ की स्थापना हुई।

पटना का तख़्त श्री हरमंदिर साहिब इस बात की याद दिलाता है कि सिख इतिहास कभी केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहा। यहीं 22 दिसंबर 1666 को गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ। इससे पहले गुरु नानक और बाद में गुरु तेग बहादुर भी इस क्षेत्र से जुड़े रहे थे। पटना उस समय पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण नगर था और यहां की संगत ने सिख परम्परा के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई। गुरु गोबिंद सिंह के बचपन की अनेक स्मृतियां इसी भूमि से जुड़ी हैं। इस तख़्त की विशेषता यह है कि यहां सिख इतिहास का वीर और योद्धा रूप दिखाई देने से पहले एक बालक गोबिंद राय दिखाई देता है। यह वही बालक था जिसने आगे चलकर खालसा का सृजन किया। इसलिए पटना साहिब गुरु गोबिंद सिंह की जीवन-यात्रा का आरम्भ-बिंदु है।
पंजाब से लगभग डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के नांदेड में स्थित तख़्त सचखंड श्री हज़ूर साहिब सिख इतिहास के सबसे भावुक अध्याय से जुड़ा है। यहीं 1708 में गुरु गोबिंद सिंह ने अपना अंतिम समय बिताया। इसी ऐतिहासिक पड़ाव पर उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस अर्थ में हज़ूर साहिब सिख इतिहास में एक युग के अंत और दूसरे युग की शुरुआत का प्रतीक है। यहीं गुरु की मुलाक़ात माधो दास बैरागी से हुई, जो आगे चलकर बंदा सिंह बहादुर बने. इस प्रकार नांदेड केवल गुरु के जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि उस राजनीतिक-सामाजिक संघर्ष की भूमिका भी है जिसने आगे पंजाब के इतिहास को बदल दिया।

तलवंडी साबो का दमदमा साहिब पांचों में सबसे नया मान्य तख़्त है। गुरु गोबिंद सिंह 1705-06 में यहाँ लगभग नौ महीने रहे. युद्धों और लगातार संघर्ष के बाद यह स्थान उनके लिए विश्राम, अध्ययन और लेखन का केंद्र बना।
इसीलिए इसे ‘गुरु की काशी’ भी कहा जाता है। परम्परा के अनुसार यहीं गुरु गोबिंद सिंह ने भाई मणि सिंह की सहायता से गुरु ग्रंथ साहिब को अंतिम रूप दिया और गुरु तेग बहादुर की वाणी को उसमें शामिल किया। 18 नवंबर 1966 को शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक समिति ने दमदमा साहिब को पांचवें तख़्त के रूप में मान्यता दी।
पंज तख़्तों की विशेषता यही है कि वे इमारतें कम और सिख इतिहास को अपने में समेटे, जीवंत दस्तावेज अधिक हैं।
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