उर्दू साहित्य की दुनिया में एहतिशाम ने अपनी शायरी या कहानियों से ही नहीं, बल्कि साहित्य को समझने का नया नज़रिया देकर भी अपनी अलग पहचान बनाई। सैयद एहतेशाम हुसैन ऐसे ही एक बड़े साहित्यकार और आलोचक थे। उन्होंने उर्दू अदब को समाज, इतिहास और इंसानी ज़िंदगी से जोड़कर देखने की नई राह दिखाई। तरक्क़ी पसंद लेखक आंदोलन से जुड़े एहतेशाम हुसैन ने उर्दू आलोचना को एक नई बुनियाद दी।
एहतेशाम हुसैन की शुरुआती पढ़ाई घर पर हुई। इसके बाद उन्होंने बेलजली स्कूल से हाई स्कूल की तालीम हासिल की। आगे की शिक्षा के लिए वह इलाहाबाद पहुंचे, जहां से बी.ए. और एम.ए. की डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद जुलाई 1938 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में अध्यापन शुरू किया। यहीं से उनके तालीमी और साहित्यिक सफ़र को एक नई दिशा मिली।
वादी-ए-शब में उजालों का गुज़र हो कैसे
दिल जलाए रहो पैग़ाम-ए-सहर आने तक
एहतेशाम हुसैन शुरू से ही प्रगतिशील( तरक्क़ी पसंद) लेखक संघ से जुड़े हुए थे। इस आंदोलन का मानना था कि साहित्य का रिश्ता समाज और आम इंसान की ज़िंदगी से होना चाहिए। इसी सोच का असर उनके लेखन पर भी दिखाई देता है। वह साहित्य को सिर्फ़ मनोरंजन या अल्फ़ाज़ों की खूबसूरती तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसके ज़रिए समाज की सच्चाइयों, संघर्षों और बदलावों को समझने पर ज़ोर देते थे।
ग़ालिब, प्रेमचंद और इक़बाल जैसे बड़े साहित्यकारों पर उनके लेखों ने पाठकों और साहित्य के जानकारों का ध्यान खींचा। उनकी किताबें ‘तन्क़ीदी जायज़े’, ‘अदब और समाज’ और ‘अख़बारों-मसायल’ साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में अहम मानी जाती हैं। उन्होंने साहित्य को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों में समझने की कोशिश की। उनका मानना था कि किसी रचना को सही ढंग से समझने के लिए उस दौर, समाज और परिस्थितियों को जानना भी ज़रूरी है, जिनमें वह रची गई है।
मंज़िल न मिली तो ग़म नहीं है
अपने को तो खो के पा गया हूं
साल 1952 में रॉकफेलर फ़ाउंडेशन के सहयोग से उन्हें अमेरिका की यात्रा का अवसर मिला। इस सफ़र के अनुभवों को उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत ‘साहिल और समंदर’ में बयान किया। साल 1961 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए और 1972 तक वहां अपनी सेवाएं देते रहे।
एहतेशाम हुसैन ने शायरी, कहानियों और यात्रा-वृत्तांत के क्षेत्र में भी काम किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान एक प्रगतिशील आलोचक के रूप में बनी। उनकी भाषा सादी, साफ़ और सहज थी। वह भारी-भरकम शब्दों और बनावटी अंदाज़ के बजाय ऐसी ज़बान पसंद करते थे, जो आम पाठक तक आसानी से पहुंच सके। उनके लेखन में गहरी समझ के साथ सादगी और बेबाकी भी दिखाई देती है।
न जाने हार है या जीत क्या है
ग़मों पर मुस्कुराना आ गया है
उनकी दूसरी अहम पुस्तकों में ‘तन्क़ीद और अमली तन्क़ीद’, ‘ज़ौक़-ए-अदब और शऊर’ और ‘अक्स और आईने’ का नाम लिया जाता है। चकबस्त, अकबर और सज्जाद ज़हीर जैसे साहित्यकारों पर लिखे उनके लेख भी उर्दू आलोचना की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी में भी लेखन किया। उनकी पुस्तक ‘उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ हिंदी पाठकों के बीच भी चर्चित रही।
मैं समझता हूं मुझे दौलत-ए-कौनैन मिली
कौन कहता है कि वो कर गए बदनाम मुझे
1 दिसंबर, 1972 को एहतेशाम हुसैन का निधन हो गया, लेकिन साहित्य को देखने और समझने का उनका नज़रिया आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने आलोचना को केवल किसी रचना की अच्छाइयां और कमियां गिनाने का ज़रिया नहीं माना, बल्कि उसे समाज और इंसानी अनुभवों को समझने का ज़रिया बनाया। यही वजह है कि एहतेशाम हुसैन का नाम उर्दू अदब की प्रगतिशील परंपरा में आज भी इज़्ज़त और एहतराम के साथ लिया जाता है। उनका काम याद दिलाता है कि साहित्य सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि अपने दौर की आवाज़ और समाज का आईना भी होता है।
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