उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके अल्फ़ाज़ सीधे दिल में उतर जाते हैं। उनकी शायरी में कभी मोहब्बत की नर्म-सी आहट सुनाई देती है, तो कभी तन्हाई का ऐसा दर्द महसूस होता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयान करना आसान नहीं। ऐसे ही शायरों में एक अहम नाम है मोहसिन नक़वी, जिन्होंने अपने कलाम से मोहब्बत, इंसानी जज़्बात और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों को ख़ूबसूरती से बयां किया।
उनकी शायरी पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे कोई हमारे दिल की अनकही बातें ज़ुबान पर ले आया हो। मसलन, उनके इस शेर में मुस्कुराहट के पीछे छिपे दर्द की तरफ़ इशारा मिलता है।
हर वक़्त का हंसना तुझे बर्बाद न कर दे,
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर।
ये चंद अल्फ़ाज़ हमें याद दिलाते हैं कि हर वक़्त मुस्कुराते रहना ज़रूरी नहीं। इंसान के अंदर भी कई एहसास होते हैं, जिन्हें समझने और महसूस करने के लिए कभी-कभी ख़ुद के साथ वक़्त बिताना पड़ता है। मोहसिन नक़वी की शायरी की ख़ासियत यही है कि वह आम ज़िंदगी के एहसासों को भी गहरी बात में बदल देती है।
मोहब्बत के एहसास और आंखों की ज़ुबान
मोहसिन नक़वी के कलाम में मोहब्बत सिर्फ़ किसी को चाहने का नाम नहीं, बल्कि किसी की मौजूदगी से ज़िंदगी के मायने बदल जाने का एहसास भी है। उनकी शायरी में आंखें कभी यादों का आईना बनती हैं, तो कभी दिल में छिपे सवालों का जवाब।
कौन सी बात है तुम में ऐसी,
इतने अच्छे क्यों लगते हो।
मोहब्बत का यही सादा-सा सवाल अपने अंदर कितनी गहराई समेटे हुए है। किसी का अच्छा लगना हमेशा किसी ख़ास वजह का मोहताज नहीं होता। कभी किसी की बात, कभी उसकी ख़ामोशी और कभी उसका अंदाज़ दिल में ऐसी जगह बना लेता है, जिसका जवाब ख़ुद इंसान के पास भी नहीं होता।
इसी तरह उनकी शायरी में आंखों का ज़िक्र बार-बार आता है। आंखें उनके यहां सिर्फ़ चेहरे का हिस्सा नहीं, बल्कि यादों, ख़्वाबों और जज़्बातों की एक पूरी दुनिया हैं। किसी की आंखों में बीते हुए लम्हे तलाश करना और किसी की निगाहों में अपना अक्स देखना, उनकी ग़ज़लों को एक अलग रंग देता है।
सादगी में छिपी ज़िंदगी की बातें
मोहसिन नक़वी के अशआर की एक ख़ासियत उनकी सादगी है। वह मुश्किल अल्फ़ाज़ के सहारे अपनी बात को भारी बनाने के बजाय आम बोलचाल के लफ़्ज़ों में गहरे एहसास बयान करते हैं। उनकी शायरी में मोहब्बत के साथ ख़ुद्दारी, इंसान की इज़्ज़त और रिश्तों की नज़ाकत भी दिखाई देती है।
सिर्फ़ हाथों को न देखो, कभी आंखें भी पढ़ो,
कुछ सवालों बड़े ख़ुद्दार हुआ करते हैं।
यहां इंसानी जज़्बात को समझने की बात है। हर ज़रूरतमंद अपनी परेशानी ज़ुबान से बयान नहीं कर पाता। कुछ लोग अपनी तकलीफ़ छिपाकर भी जीते हैं, क्योंकि उनके लिए अपनी इज़्ज़त और ख़ुद्दारी बेहद अहम होती है।
ज़िंदगी और अदब का सफ़र
मोहसिन नक़वी की पैदाइश 10 मई 1947 को डेरा ग़ाज़ी ख़ान में हुयी थी। उनका असली नाम ग़ुलाम अब्बास नक़वी था। उन्होंने मुल्तान के गवर्नमेंट कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से मास्टर्स की डिग्री हासिल की। अदब की दुनिया में उन्होंने मोहसिन नक़वी के नाम से पहचान बनाई।
वह ग़ज़ल के साथ-साथ अहले-बैत की शान में लिखे गए अपने कलाम के लिए भी मशहूर हुए। कर्बला और उसकी कुर्बानियों पर लिखी गई उनकी शायरी को पाकिस्तान समेत दुनिया के कई हिस्सों में पढ़ा और सुना जाता है। उनकी किताबों में अज़ाब-ए-दीद, ख़ेमा-ए-जां, बर्ग-ए-सहरा, तलू-ए-अश्क़ और रिदा-ए-ख़्वाब जैसी रचनाएं शामिल हैं।
15 जनवरी 1996 को लाहौर में उनकी हत्या कर दी गई। उनकी ज़िंदगी का यह दुखद अंत उर्दू अदब के लिए एक बड़ा नुक़सान था, लेकिन उनके अल्फ़ाज़ आज भी पढ़ने और सुनने वालों के दिलों में ज़िंदा हैं।
मोहसिन नक़वी की शायरी की ख़ूबसूरती यही है कि वह गुज़रे हुए लम्हों को यादों में बदल देती है और अनकहे एहसासों को ज़ुबान देती है। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत भी है, तन्हाई भी, दर्द भी और उम्मीद भी। शायद इसी वजह से उनके अशआर हर दौर में नए लगते हैं क्योंकि इंसान के दिल के एहसास वक़्त के साथ बदलते नहीं, बस उन्हें बयान करने के अंदाज़ बदल जाते हैं।
ये भी पढ़ें: मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार
आप हमें Facebook,Instagram,Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं



