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सुलेमान अरीब हैदराबादी: उर्दू अदब का वो नाम, जिसने शायरी से उठाए इंसाफ़ के सवाल

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने अपने अल्फ़ाज़ से सिर्फ़ दिलों के जज़्बात को ही बयान नहीं किया, बल्कि अपने दौर के सामाजिक और सियासी हालात को भी आवाज़ दी। सुलेमान अरीब हैदराबादी ऐसे ही शायर थे। उनकी शायरी में जहां इंसानी रिश्तों की नज़ाकत और दिल के दर्द की झलक मिलती है, वहीं समाज में फैली नाइंसाफ़ी, बेबसी और बराबरी की तलाश भी दिखाई देती है। वह एक ऐसे अदबी शख़्सियत थे, जिन्होंने अपनी कलम को सिर्फ़ इज़हार का ज़रिया नहीं, बल्कि समाज को समझने और बदलने का ज़रिया भी बनाया।

सुलेमान अरीब का ताल्लुक़ हैदराबाद की उस अदबी फ़िज़ा से था, जहां उर्दू ज़बान और शायरी की एक मुकम्मल रिवायत मौजूद थी।

उनके पूर्वज अरब के हद्रामौत इलाके से हैदराबाद आए थे। उनके पिता सुलेमान बिन अब्द अल-रज़्ज़ाक निज़ाम के दौर में हैदराबाद की फ़ौज में रिसालदार के पद पर तैनात थे। इस तरह अरीब का बचपन एक ऐसे माहौल में गुज़रा, जहां तहज़ीब, समाज और बदलते वक़्त के कई रंग मौजूद थे।

उनकी ज़िंदगी में साहित्य का सफ़र कम उम्र में ही शुरू हो गया था। शुरुआत में उन्होंने निबंध और छोटी कहानियां लिखीं, लेकिन धीरे-धीरे शायरी उनके इज़हार का सबसे अहम ज़रिया बन गई। उनके लिए कविता महज़ लफ़्ज़ों को खूबसूरती से सजाने का नाम नहीं थी, बल्कि अपने भीतर के एहसास और बाहर की दुनिया के सवालों को सामने लाने का एक रास्ता थी।

‘सबा’ और उर्दू अदब में योगदान

सुलेमान अरीब की पहचान सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं थी। वह उर्दू साहित्य की मशहूर पत्रिका ‘सबा’ के संपादक और प्रकाशक भी थे। साल 1955 में शुरू हुई इस पत्रिका ने अपने दौर में आधुनिक उर्दू अदब के नए रुझानों और विचारों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

उस दौर में उर्दू साहित्य बदलाव के एक नए दौर से गुज़र रहा था। शायर और लेखक पुराने विषयों के साथ-साथ आम इंसान की ज़िंदगी, सामाजिक असमानता, मेहनतकश तबके की मुश्किलों और सियासी बदलावों पर भी लिख रहे थे। ‘सबा’ ने ऐसे विचारों को जगह दी और नए साहित्यिक नज़रियों को पाठकों तक पहुंचाने का काम किया।

पत्रिका के ज़रिए अरीब ने उर्दू अदब में नई सोच और नए तजुर्बों के लिए जगह बनाने की कोशिश की। उनके लिए साहित्य किसी एक तबके या ख़ास वर्ग तक महदूद नहीं था। वह चाहते थे कि अदब आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े और उनके दुख-दर्द को भी अपनी आवाज़ बनाए।

आंदोलन और तेलंगाना की आवाज़

सुलेमान अरीब अपने दौर के सामाजिक और सियासी सवालों से भी गहराई से जुड़े हुए थे। वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के सक्रिय सदस्य थे और प्रगतिशील लेखक आंदोलन के प्रमुख समर्थकों में गिने जाते थे। इस आंदोलन का मक़सद साहित्य को सामाजिक बदलाव, इंसाफ़ और बराबरी की लड़ाई से जोड़ना था।

हैदराबाद और तेलंगाना के उस दौर में किसानों और मेहनतकश लोगों के अधिकारों को लेकर बड़े आंदोलन हो रहे थे। तेलंगाना किसान विद्रोह ने ज़मीन, शोषण और सामाजिक बराबरी जैसे सवालों को केंद्र में ला दिया था। सुलेमान अरीब ने हैदराबाद के दूसरे प्रगतिशील उर्दू लेखकों के साथ इस आंदोलन का समर्थन किया।

उनकी सोच में साहित्य और समाज एक-दूसरे से अलग नहीं थे। वह मानते थे कि शायर का काम केवल महफ़िल में वाहवाही हासिल करना नहीं, बल्कि अपने दौर की सच्चाई को समझना और उसे बेबाकी से बयान करना भी है। यही वजह है कि उनकी शायरी में व्यक्तिगत दर्द के साथ-साथ समाज की बेचैनी और इंसाफ़ की तलाश भी महसूस होती है।

शायरी में दर्द, बेबसी और मोहब्बत

सुलेमान अरीब के अशआर में इंसानी मन की कई परतें खुलती हैं। कहीं अकेलेपन का एहसास है, कहीं अपने दर्द को दुनिया से छिपाने की कोशिश, तो कहीं ज़िंदगी के सवालों का ऐसा सिलसिला, जिसका जवाब इंसान ख़ुद भी नहीं जानता।

“मेरा साया है मिरे साथ जहां जाऊं मैं
बेबसी तू ही बता ख़ुद को कहां पाऊं मैं”

इन दो मिसरों में अकेलेपन और बेबसी का गहरा एहसास छिपा है। साया इंसान का हमेशा साथ रहता है, लेकिन यहां शायर इसी साथ को एक सवाल बना देते हैं। वह ख़ुद से दूर जाना चाहते हैं, मगर अपने वजूद से बचकर जाएं तो कहां जाएं? यह शेर इंसान के भीतर चलने वाली उस कशमकश को बयान करता है, जब वह अपने ही ख़यालों और परेशानियों से घिर जाता है।

“ज़ख़्म की बात भी होती तो कोई बात न थी
दिल नहीं फूल कि हर शख़्स को दिखलाऊं मैं”

यहां अरीब दिल को एक ऐसे एहसास के तौर पर पेश करते हैं, जिसे हर किसी के सामने खोलकर नहीं रखा जा सकता। जिस तरह फूल नाज़ुक होता है, उसी तरह दिल भी जज़्बात और तकलीफ़ से भरा होता है। हर दर्द को बयान करना ज़रूरी नहीं, कुछ ज़ख़्म इंसान अपने भीतर ही संभालकर रखता है।

उनकी शायरी का एक अहम पहलू मोहब्बत और इंसानियत भी है। वह मोहब्बत को किसी मज़हब की हद में क़ैद नहीं करते। 

“प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई
का’बा-ओ-दैर से मतलब नहीं होता कोई”

इन अशआर में मोहब्बत को इंसानी एहसास के तौर पर देखा गया है। प्यार और दर्द किसी एक मज़हब, पहचान या समुदाय की जागीर नहीं हैं। इंसान का दिल किसी सरहद या धार्मिक पहचान से बंधा नहीं होता। यही ख़याल अरीब की शायरी को एक व्यापक इंसानी मायने देता है।

उनके यहां ज़िंदगी के सवाल भी हैं और उन सवालों के जवाब तलाशने की बेचैनी भी। वह अपनी परेशानियों को दूसरों पर थोपने के बजाय ख़ुद से सवाल करते हैं। उनकी शायरी पाठक को अपने भीतर झांकने और अपने आसपास की दुनिया को नए नज़रिये से देखने का मौक़ा देती है।

उनकी किताबें और अदबी विरासत

सुलेमान अरीब की अहम तख़किलात (कृतियों) में ‘पास-ए-गरेबां’ और ‘हैदराबाद के शायर’, खंड दो का नाम लिया जाता है। उनकी रचनाओं का अंग्रेज़ी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हुआ, जिससे उनकी शायरी और विचार उर्दू पढ़ने वालों से आगे भी पहुंचे।

लेखिका गौसिया सुल्ताना की किताब ‘सुलेमान अरीब: फ़न और शख़्सियत’ में उनके जीवन और साहित्यिक योगदान को समझने की कोशिश की गई है। यह किताब उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक सफ़र पर रोशनी डालती है।

लंबी बीमारी के बाद 7 सितंबर 1972 को सुलेमान अरीब का इंतिक़ाल हो गया। उनकी उम्र उस समय करीब 50 साल थी। उनका जीवन भले ही बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन उनकी शायरी, अदबी ख़िदमात और प्रगतिशील विचार उन्हें उर्दू साहित्य के इतिहास में एक अहम जगह दिलाते हैं।

सुलेमान अरीब हैदराबादी को याद करना उस शायर को याद करना है, जिसने दिल के दर्द को भी ज़बान दी और समाज की बेचैनी को भी अपने अल्फ़ाज़ में जगह दी। उनकी शायरी हमें बताती है कि अदब का रिश्ता केवल ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों से नहीं, बल्कि इंसान के एहसास, उसकी आज़ादी, उसके अधिकार और उसकी इंसानियत से भी होता है।

ये भी पढ़ें: आनंद नारायण मुल्ला: मैं मज़हब छोड़ सकता हूं, मगर मादरी ज़बान उर्दू नही… 

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