अवध के आख़िरी बादशाह वाजिद अली शाह की शख़्सियत बहुत पेचीदा थी, इसीलिए उन पर हमेशा बहस रही है। अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा करने के लिए उन्हें नाअहल और अय्याश बादशाह कहकर बदनाम किया। दूसरी तरफ़ उनके हिमायती उनकी कमज़ोरियों पर पर्दा डालते हैं। एक बात पर सब सहमत हो सकते हैं: अगर वे बादशाह न भी होते, तो भी इतिहास उन्हें अदब और फ़नों के सरपरस्त के तौर पर याद रखता।
शुरुआती ज़िंदगी
उनका पूरा नाम मिर्ज़ा मुहम्मद वाजिद अली था और तख़ल्लुस “अख़्तर” था। ठुमरियों में वे “अख़्तर पिया” नाम भी इस्तेमाल करते थे। उनकी पैदाइश 30 जुलाई 1822 को हुई। उनकी तालीम का ख़ास इंतिज़ाम किया गया। उनके उस्ताद अमीन उद्दौला इमदाद हसन थे, जिनके नाम पर लखनऊ का मशहूर बाज़ार अमीनाबाद आज भी है।
उन्होंने 18 साल की उम्र में शेर कहना शुरू कर दिया था। वली अहद (उत्तराधिकारी) बनने से पहले ही वे तीन मसनवियां और अपना पहला दीवान तैयार कर चुके थे। 1842 में उनके वालिद अमजद अली शाह के तख़्त पर बैठने के बाद वे वली अहद बने, जबकि उनके बड़े भाई भी मौजूद थे। उस दौर में वे सियासत से दूर रहकर अपने शौक़ पूरे करते थे।
बादशाहत का दौर
1847 में वालिद के इंतिक़ाल के बाद वाजिद अली शाह तख़्तनशीं हुए। शुरू में उन्होंने इंसाफ़ से काम लिया, पुराने ओहदेदारों को उनकी जगह रखा और उनकी तनख़्वाहें बढ़ाईं। लेकिन दो साल बाद वे सख़्त बीमार पड़े और ठीक होने में दस महीने लगे। हकीमों की सलाह पर उन्होंने सल्तनत का काम ससुर नवाब अली नक़ी को सौंप दिया और ख़ुद किताबों, शायरी और फ़नों में मसरूफ़ हो गए।
उनके ज़माने के लेखक अब्दुल हलीम शरर के मुताबिक़ उनके दो ही शौक़ थे अदब-ओ-शायरी और संगीत। वे इतनी रवानी से लिखते थे कि सैकड़ों मर्सिये और सलाम कह डाले।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके हाथ बांध रखे थे। हर छोटी बात के लिए रेज़िडेंट की मंज़ूरी लेनी पड़ती थी और वे सिर्फ़ नाम के बादशाह थे। सल्तनत के हालात जान-बूझकर बिगाड़े गए, और 1856 में अंग्रेज़ों ने बदइंतिज़ामी का इल्ज़ाम लगाकर उन्हें तख़्त से हटा दिया। उन्होंने बिना किसी लड़ाई या ख़ून-ख़राबे के हुकूमत छोड़ दी।
मटिया बुर्ज का दौर
ज़िंदगी के आख़िरी 31 साल उन्होंने कलकत्ता के मटिया बुर्ज में गुज़ारे। अंग्रेज़ों से उन्हें सालाना 12 लाख रुपये वज़ीफ़ा मिलता था। उन्होंने वहां लखनऊ जैसी इमारतें बनवाईं और उसे “छोटा लखनऊ” बनाने की कोशिश की। उनकी रातें मुशायरों, मजलिसों और महफ़िलों में गुज़रती थीं। 1887 में उनका इंतिक़ाल हुआ।
हुकूमत जाने के बाद वे बुझे हुए इंसान ज़रूर थे, मगर यह दौर उनके लिए तख़लीक़ी (रचनात्मक) लिहाज़ से बहुत बड़ी नेमत साबित हुआ। उन्होंने अलग-अलग मौज़ूआत पर क़रीब 100 किताबें लिखीं। कहा जाता है कि उन्होंने 61 नई बहरें ईजाद कीं।
उनके बड़े कारनामे
संगीत: उन्होंने क्लासिकी संगीत को आसान और आम पसंद बनाया। लखनवी ठुमरी और भैरवी की मक़बूलियत उन्हीं की देन है। उनकी ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए” को अनगिनत गायकों ने गाया, पर कुन्दन लाल सहगल ने इसमें जो दर्द भरा, उसकी मिसाल नहीं।
नाटक: उन्होंने नाटक की कला को गलियों से उठाकर महलों तक पहुंचाया। उनका लिखा “राधा-कन्हैया” उर्दू का पहला ड्रामा माना जाता है। रहस के लिए उन्होंने क़ैसरबाग़ और रहस मंज़िल जैसी इमारतें बनवाईं।
किताबों से मुहब्बत: उन्होंने शाही कुतुबख़ाने की फ़ेहरिस्त बनवाई और इश्तिहार देकर मुंह-मांगे दामों पर नई किताबें ख़रीदीं।
शायरी: वे बुनियादी तौर पर मसनवी के शायर थे। उनकी आख़िरी मसनवी “सबात-उल-क़ुलूब” में उनकी सलाहियतें खुलकर सामने आती हैं।
वाजिद अली शाह एक कमज़ोर हुक्मरान माने जा सकते हैं, मगर वे बहुत बड़े फ़नकार और अदब के क़द्रदान थे। लखनऊ की तहज़ीब, संगीत और नाटक में उनका नाम आज भी ज़िंदा है।
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