तरन तारन के गांव कक्का कंडियाला की Baljit Kaur (बलजीत कौर) का हॉकी का सफ़र किसी बड़े स्टेडियम या नेशनल कैंप से शुरू नहीं हुआ था। इसकी शुरुआत एक छोटी-सी दिलचस्पी से हुई। अपनी रिश्तेदार को हर सुबह हॉकी खेलने जाते हुए देखकर। आज 25 साल की Baljit Kaur (बलजीत कौर) भारतीय महिला हॉकी टीम का हिस्सा हैं, जिसने जापान में हुए Asian Games में गोल्ड मेडल जीतकर 44 साल बाद इतिहास रचा। भारत ने 2 अक्टूबर को फाइनल में चीन को 1-0 से हराया।
Baljit Kaur (बलजीत कौर) इस गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम में पंजाब की इकलौती महिला खिलाड़ी थी। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी सिर्फ़ एक मैच या एक मेडल की नहीं है। ये एक गांव की बेटी के उस सफ़र की कहानी है, जिसमें हॉकी का अपना ख़्वाब पूरा करने के लिए उनके परिवार को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
रिश्तेदार को हॉकी खेलते देखकर शुरू हुआ सफ़र
हॉकी इंडिया के मुताबिक, Baljit Kaur (बलजीत कौर) ने साल 2012 में, जब वो सातवीं क्लास में पढ़ती थी, तब हॉकी खेलना शुरू किया। उनकी एक रिश्तेदार हर सुबह हॉकी खेलने जाती थी। Baljit Kaur (बलजीत कौर) उनसे पूछती थी कि वो इतनी सुबह कहां जाती हैं। जब उन्हें पता चला कि वो ग्राउंड में हॉकी की प्रैक्टिस करने जाती हैं, तो Baljit Kaur (बलजीत कौर) की भी इस खेल में दिलचस्पी बढ़ने लगी।
यही छोटी-सी दिलचस्पी धीरे-धीरे उन्हें हॉकी खेलने की तरफ ले गई। बेहतर ट्रेनिंग और ज़्यादा मुकाबलों का मौक़ा पाने के लिए वो तरन तारन के एक स्कूल में चली गई। साल 2017 में उनका सिलेक्शन जूनियर नेशनल कैंप के लिए हुआ। ये उनके हॉकी करियर का एक अहम पड़ाव था।

जब हॉकी के लिए बादाम और चने भी मुश्किल थे
Baljit (बलजीत) का परिवार आर्थिक तौर पर मज़बूत नहीं था। उनके पिता लखविंदर सिंह मज़दूरी करते थे। हॉकी जैसे खेल में सिर्फ़ हुनर ही काफी नहीं होता। खिलाड़ी को अच्छे सामान के साथ अच्छी डाइट की भी ज़रूरत होती है। लेकिन Baljit (बलजीत) के लिए ये भी हमेशा आसान नहीं था। हाल ही में द ट्रिब्यून से बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके कोच खिलाड़ियों को रोज़ चने और बादाम खाने की सलाह देते थे। लेकिन कई बार उनके पास इन्हें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। ऐसे वक़्त में वो दूसरी खिलाड़ियों से कुछ चने और बादाम मांग लेती थी, ताकि अपनी डाइट पूरी कर सकें।
उन्होंने ये भी बताया कि उनके पिता की आमदनी ज़्यादा नहीं थी, लेकिन उन्होंने कभी Baljit (बलजीत) से हॉकी छोड़ने के लिए नहीं कहा। Baljit (बलजीत) के लिए पिता से पैसे मांगना भी आसान नहीं था। उन्हें पता था कि परिवार के लिए पैसों का इंतज़ाम करना मुश्किल था। इसके बावजूद उनके पिता ने उन्हें हॉकी जारी रखने के लिए हमेशा हौसला दिया। जिस हॉकी पर कभी सवाल उठे, वही बनी परिवार की ख़ुशी बलजीत के बड़े भाई दलशेर सिंह, जो अब टैक्सी चलाते हैं, ने भी उनके शुरुआती सफ़र के दिनों को याद किया है।
एक वक़्त था जब वो अपने पिता से पूछते थे कि बलजीत की हॉकी पर इतना पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है। उस समय उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि हॉकी Baljit (बलजीत) को कहाँ तक ले जाएगी। लेकिन आज वही सवाल गर्व में बदल चुका है। Baljit Kaur (बलजीत कौर) के एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने से पहले ही परिवार ने उनके स्वागत की तैयारियां शुरू कर दी थी। उन्होंने अपने भाई से घर लौटने पर ढोल का इंतज़ाम करने के लिए कहा था। आज बलजीत की कामयाबी सिर्फ़ उनकी अपनी ख़ुशी नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए फख्र की वजह बन चुकी है।

गांव से नेशनल टीम तक
Baljit Kaur (बलजीत कौर) ने धीरे-धीरे जूनियर लेवल से सीनियर हॉकी तक अपनी जगह बनाई। हॉकी इंडिया के रिकॉर्ड के मुताबिक, वो इस वक़्त मिडफील्ड में खेलती हैं और साल 2022 में उन्होंने भारतीय सीनियर टीम के लिए डेब्यू किया। इससे पहले वो 2018 यूथ ओलंपिक में भारत की सिल्वर मेडल जीतने वाली टीम का हिस्सा थी और 2021 जूनियर वर्ल्ड कप में भी खेल चुकी हैं। साल 2026 के Asian Games उनके लिए पहले एशियन गेम्स थे। महिला हॉकी के फाइनल में भारत ने चीन को 1-0 से हराया।
मैच के शुरुआती मिनटों में बलजीत ने इशिका के साथ मिलकर चीन के सर्कल में गोल का मौक़ा बनाया। बाद में उन्हें ग्रीन कार्ड भी मिला और वो दो मिनट के लिए मैदान से बाहर रही। भारत के लिए लालरेमसियामी ने 10वें मिनट में गोल किया। वहीं, गोलकीपर सविता ने पेनल्टी स्ट्रोक बचाकर भारत की जीत में अहम रोल निभाया। इस जीत के साथ भारत ने महिला हॉकी में 1982 के बाद पहली बार Asian Games का गोल्ड मेडल जीता।

“दिल्ली नहीं जाना, पहले अपने गांव जाना है”
गोल्ड मेडल जीतने के बाद Baljit Kaur (बलजीत कौर) की एक बात ने ख़ास ध्यान खींचा। हॉकी इंडिया की शेयर की गई एक वीडियो में वो कहती सुनाई दी: “दिल्ली नी जाना, पहले अपने गांव जाना है, आपां चले पंजाब मेडल ले के।” बलजीत ने कहा कि पंजाब के लिए मेडल घर लेकर आना इस कामयाबी को और भी ख़ास बनाता है। उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ। शायद उनकी ये बात उनके पूरे सफ़र को सबसे आसान तरीके से बयां करती है। कक्का कंडियाला से शुरू हुई हॉकी की कहानी अब Asian Games के गोल्ड मेडल तक पहुंच चुकी है। लेकिन बलजीत के लिए उनका गांव आज भी इस कहानी का सबसे अहम हिस्सा है।
उनकी ख़्वाहिश है कि गांव के बच्चों के लिए अच्छे खेल के मैदान और बेहतर सुविधाएं हों, ताकि वो खेलों की तरफ़ आएं और नशे से दूर रहें। ये ख़्वाहिश उनके अपने सफ़र से भी जुड़ी है, क्योंकि उन्होंने भी अपना सफ़र एक गांव से ही शुरू किया था। बलजीत कौर की कहानी सिर्फ़ एक गोल्ड मेडल जीतने वाली हॉकी खिलाड़ी की कहानी नहीं है। ये उस परिवार की कहानी भी है, जिसने सीमित साधनों के बावजूद अपनी बेटी को हॉकी खेलने और अपना ख़्वाब पूरा करने का मौक़ा दिया। और ये उस गांव की कहानी भी है, जहां से एक लड़की हॉकी के मैदान की तरफ़ बढ़ी थी और आज वही लड़की Asian Games की चैंपियन बन चुकी है।
लेख: हरविंदर कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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