Thursday, October 15, 2026
24.8 C
Delhi

आनंद नारायण मुल्ला: मैं मज़हब छोड़ सकता हूं, मगर मादरी ज़बान उर्दू नही…

हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब की जब भी बात होती है, तो आनंद नारायण मुल्ला का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। वे शायर भी थे, वकील और जज भी, और साथ ही सियासतदां भी। मगर उनकी सबसे बड़ी पहचान उर्दू से उनकी मोहब्बत थी। उनका एक मशहूर जुमला आज भी याद किया जाता है कि वे मज़हब छोड़ सकते हैं, मगर अपनी मादरी ज़बान उर्दू नहीं छोड़ सकते। यह बात उनकी ज़बान और विरासत के लिए इज़्ज़त को बख़ूबी बयान करती है।

ख़ानदान और शुरुआती ज़िंदगी

आनंद साहब का ख़ानदानी ताल्लुक़ कश्मीर से था। उनके एक बुज़ुर्ग पंडित काली दास कश्मीर से लखनऊ आए और हमेशा के लिए वहीं बस गए। इसी शहर में अक्टूबर 1901 को आनंद नारायण मुल्ला पैदा हुए। उनके वालिद पंडित जगत नारायण मुल्ला अपने वक़्त के नामी वकील और सरकारी अभियोजक(Prosecutor) थे।

रोने वाले तुझे रोने का सलीक़ा ही नहीं
अश्क पीने के लिए हैं कि बहाने के लिए

इब्तिदाई तालीम यानी शुरूआती पढ़ाई उन्होंने लखनऊ में हासिल की। आगे चलकर उन्होंने लखनऊ से ही अंग्रेज़ी अदब में एम.ए. किया और फिर क़ानून की डिग्री हासिल की। लखनऊ उस ज़माने में अदब और तहज़ीब का बड़ा मरकज़ था, और इस माहौल ने उनके शायराना मिज़ाज को निखारने में बहुत बड़ा किरदार अदा किया।

तालीम पूरी करने के बाद आनंद साहब ने वकालत शुरू की और जल्द ही अपनी पहचान बना ली। 1954 में वे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में जज बने और 1961 तक इस ओहदे पर रहे।

सियासत का दौर

अदालत की ज़िम्मेदारियों के बाद उन्होंने सियासत का रुख़ किया। 1967 में वे लखनऊ से आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर चौथी लोकसभा के लिए चुने गए और 1970 तक मेंबर रहे। इसके बाद 1972 में वे कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा पहुंचे, जहां 1978 तक रहे। वे अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू के सदर भी रहे, यानी उर्दू की ख़िदमत उन्होंने सिर्फ़ शायरी में नहीं, बल्कि इदारों के ज़रिये भी की।

वो कौन हैं जिन्हें तौबा की मिल गई फ़ुर्सत
हमें गुनाह भी करने को ज़िंदगी कम है

शायरी का सफ़र

दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेज़ी अदब के शौक़ीन तालिब-ए-इल्म होने की वजह से आनंद साहब ने पहले अंग्रेज़ी में शायरी की। बाद में उन्होंने उर्दू को अपना लिया और फिर उसी के होकर रह गए।

उनकी शायरी में ज़िंदगी और दुनिया के बारे में एक सकारात्मक और अख़लाक़ी नज़रिया मिलता है। अल्लामा इक़बाल का असर भी उन पर गहरा रहा, जिसने इस सोच को और पुख़्ता किया। समाज को बेहतर बनाने की उनकी कोशिश उनकी शायरी और नस्र, दोनों में साफ़ दिखाई देती है।

उनके मजमुओं में ये नाम शामिल हैं:

  • जू-ए-शीर (1949)
  • कुछ ज़र्रे कुछ तारे
  • मेरी हदीस-ए-उम्र-ए-गुरेज़ां
  • कर्ब-ए-आगही
  • जादा-ए-मुल्ला

उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मज़ामीन का उर्दू में तर्जुमा भी किया।

सर-ए-महशर यही पूछूंगा ख़ुदा से पहले
तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले

अपनी शायरी, ख़ासकर “मेरी हदीस-ए-उम्र-ए-गुरेज़ां” के लिए उन्हें 1964 में उर्दू का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। बाद में उन्हें इक़बाल सम्मान से भी नवाज़ा गया। कुल मिलाकर उन्हें कई अहम इनाम और एज़ाज़ हासिल हुए।

इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर
या तो बेहोश न हो, हो तो न फिर होश में आ

जून 1997 में दिल्ली में उनका इंतक़ाल हुआ। उस वक़्त उनकी उम्र करीब 96 साल थी। उन्होंने एक लंबी और भरपूर ज़िंदगी जी।

आनंद नारायण मुल्ला इस बात की जीती-जागती मिसाल थे कि ज़बान किसी मज़हब की जागीर नहीं होती। उन्होंने उर्दू को अपनी मां की तरह चाहा, और बदले में उर्दू ने उन्हें अदब की दुनिया में हमेशा के लिए ज़िंदा रखा। आज भी जब उर्दू की मिली-जुली तहज़ीब की बात होती है, तो उनका नाम सबसे पहले ज़ेहन में आता है।

ये भी पढ़ें: आगा हसन अमानत: वो शायर जिसने उर्दू को दिया पहला स्टेज ड्रामा

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories