वक़्त करता है परवरिश बरसों
हादिसा एक दम नहीं होता
ये शेर पढ़ने में सीधा-सादा लगता है, मगर इसके पीछे एक पूरी ज़िन्दगी की दास्तान छिपी है। इसे कहने वाले शायर का नाम है क़ाबिल अजमेरी। उनकी ज़िन्दगी भी इसी शेर की तरह थी: छोटी, मगर गहरी।
शुरुआती ज़िन्दगी और पैदाइश
क़ाबिल अजमेरी का असल नाम अब्दुररहीम था। वो 27 अगस्त 1931 को राजस्थान के अजमेर ज़िले के एक छोटे से क़स्बे चर्ली में पैदा हुए। ये क़स्बा अजमेर शहर से करीब 24 मील के फ़ासले पर है। बाद में उनका परिवार अजमेर शहर में त्रिपोलिया गेट के क़रीब अपने पुश्तैनी घर में रहने लगा।
उनकी शुरुआती तालीम अजमेर शरीफ़ की दरगाह से जुड़े मदरसा निज़ामिया उस्मानिया में हुई। यानी बचपन से ही उनके चारों तरफ़ दीन, दुआ और रूहानियत का माहौल था।
अजमेर की फ़िज़ा और शायरी का शौक़
अजमेर वो शहर है जहां ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है। यहां हर रोज़ अक़ीदतमंद आते हैं और रात-दिन क़व्वालियां गूंजती रहती हैं। नन्हे अब्दुररहीम इन मज़ारों और दरगाहों के बीच बड़े हुए।
क़व्वालियां सुनते-सुनते उन्हें बहुत सारा कलाम ज़ुबानी याद हो गया। जब अल्फ़ाज़ कानों में बस जाएं तो एक दिन ज़ुबान पर भी आ ही जाते हैं। धीरे-धीरे उन्होंने ख़ुद शेर कहना शुरू कर दिया। यही वजह है कि उनकी शायरी में तसव्वुफ़ का रंग, इश्क़ की तड़प और दर्द की गहराई एक साथ दिखाई देती है।
उस्ताद और इस्लाह
उर्दू शायरी में उस्ताद से इस्लाह लेने की पुरानी रिवायत रही है। शाइर अपना कलाम उस्ताद को दिखाता है और वो ग़लतियां दुरुस्त करते हैं। क़ाबिल अजमेरी ने भी अरमान अजमेरी और मानी अजमेरी से अपने कलाम की इस्लाह करवाई। इन दोनों के वो शागिर्द कहलाए। इसी तरबियत से उनकी ज़ुबान में सफ़ाई और बयान में पुख़्तगी आई।
क़ाबिल अजमेरी को कम उम्र में ही तपेदिक (टी.बी.) हो गया था। उस ज़माने में ये बहुत ख़तरनाक बीमारी मानी जाती थी और ग़रीबी में इलाज और भी मुश्किल था। इसी बीमारी से लड़ते हुए 3 अक्टूबर 1962 को हैदराबाद (सिंध) में सिर्फ़ 31 साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हो गया।
मरने के बाद छपी किताबें
अफ़सोस की बात है कि शायर की ज़िन्दगी में उनका कलाम किताबों की शक्ल नहीं ले सका। उनके इंतिक़ाल के बाद उनके तीन काव्य-संग्रह छपे:
- दीदा-ए-बेदार
- ख़ून-ए-रग-ए-जां
- बाक़ियात-ए-क़ाबिल
सिंध की हुकूमत ने उनकी ख़िदमात को सराहते हुए उन्हें “शायर-ए-सिंध” के ख़िताब से नवाज़ा।
कलाम की झलक
इसमें सफ़र की थकान भी है और मंज़िल की दूरी का एहसास भी। चलते जाओ, रास्ता घटता है, मगर फ़ासला फिर भी बना रहता है।
रास्ता है कि कटता जाता है
फ़ासला है कि कम नहीं होता
यहां हौसला बोलता है। शायर कहता है कि हम हवा का रुख़ मोड़ने वाले लोग हैं, दुनिया चाहे तो हमारे साथ आ जाए।
तुम न मानो मगर हक़ीक़त है
इश्क़ इंसान की ज़रूरत है
इश्क़ को ऐश नहीं, ज़रूरत बताना उनकी सोच की ख़ूबसूरती है।
ज़माना दोस्त है किस किस को याद रक्खोगे
ख़ुदा करे कि तुम्हें मुझ से दुश्मनी हो जाए
इस शेर में अजीब सी मासूमियत है। जब सब दोस्त हों तो किसे याद रखें? इसलिए दुआ है कि तुम मेरे दुश्मन बन जाओ, ताकि कम से कम याद तो रहो।
बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से
कहीं ज़िन्दगी को क़रार आ न जाए
यहां दर्द को नेमत की तरह देखा गया है, क्योंकि सुकून मिल गया तो शायद तड़प और तख़लीक़ भी ख़त्म हो जाए।
क़ाबिल अजमेरी की ज़िन्दगी महज़ 31 बरस की थी, मगर उन्होंने उर्दू शायरी को वो अशआर दिए जो आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। अजमेर की दरगाह से सिंध की ख़ाक तक का उनका सफ़र हमें याद दिलाता है कि शाइर की असली उम्र उसके कलाम की उम्र होती है। जिस्म चला गया, मगर शेर आज भी ज़िन्दा हैं।
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