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छत्तीसगढ़ के जंगलों से आपकी अलमारी तक: शाही और सुकून देने वाली कोसा सिल्क साड़ी का सुनहरा सफ़र

 कोसा सिल्क (Kosa Silk)..ये कोई आम साड़ी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के जंगलों की खामोशी में पली-बढ़ी एक ऐसी आर्टवर्क है जो देखने में जितनी शाही है,पहनने में उतनी ही सुकून देने वाली। ये साड़ी आपको भीड़ में अलग तो दिखाती ही है,साथ ही भारत की उस समृद्ध विरासत से भी जोड़ती है जिसे हम अक्सर भूलते जा रहे हैं।

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कोसा सिल्क आख़िर क्या है?

बहुत सारी औरतें जब साड़ी खरीदने जाती हैं तो उन्हें टसर, मलबरी सिल्क के नाम तो पता होते हैं, लेकिन फ़र्क समझ नहीं पातीं। दरअसल, कोसा सिल्क (Kosa Silk) टसर सिल्क की ही एक ख़ास किस्म है, जो छत्तीसगढ़ की धरती पर पैदा होती है। ये उस रेशम के कीड़े से बनती है जिसे ‘एन्थिरिया मायलिट्टा’ कहा जाता है और जो अर्जुन, साल और साजा जैसे जंगली पेड़ों की पत्तियों पर पलता है।

कोसा सिल्क (Kosa Silk) की सबसे बड़ी खूबी इसकी नैचुरल सुनहरी चमक है,जो चकाचौंध करने वाली नहीं बल्कि धीरे-धीरे निखरने वाली होती है। जैसे-जैसे आप इसे पहनती हैं, ये और नरम होता जाता है। यही वजह है कि कई औरतें इसे अपनी ‘साड़ी’ कहकर नहीं, बल्कि ‘विरासत’ कहकर सहेजती हैं।

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जंगल से अलमारी तक का सफर

कोसा साड़ी बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में रेशम के कीड़े अर्जुन के पेड़ पर कोकून बनाते हैं, जिसे लोकल भाषा में ‘कोसा-फल’ कहते हैं। इन कोकूनों को इकट्ठा करके उबाला जाता है, फिर उनसे धागा निकाला जाता है। इसके बाद धागे को सुखाकर, रंगकर और करघे पर बुनकर साड़ी का रूप दिया जाता है।

एक कोसा साड़ी बनाने में 7 से 8 दिन लग जाते हैं, और इसमें 2 से 3 कारीगरों की मेहनत लगती है। कई परिवार तो पीढ़ी दर पीढ़ी ये काम कर रहे हैं,करीब 80 साल से भी ज्यादा। ख़ास बात ये है कि इसमें औरतों की भी बड़ी भूमिका होती है,जो धागा तैयार करने से लेकर बुनाई तक हर मरहले पर हुनर दिखाती हैं।

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असली कोसा की पहचान कैसे करें?

बाजार में नकली सिल्क की भरमार है, ऐसे में असली कोसा साड़ी पहचानना जरूरी है। सबसे आसान तरीका है कि साड़ी के एक छोटे से धागे को जलाकर देखें। असली कोसा जलने पर बाल जैसी गंध देगा और काला चूरा छोड़ेगा,जबकि नकली सिल्क प्लास्टिक की तरह पिघलेगा और बदबू देगा।

इसके अलावा,असली कोसा की चमक मंद और नौचुरल होती है, बनावट खुरदुरी और दानेदार। इसे अंगूठी के अंदर से आसानी से निकाला जा सकता है क्योंकि ये पतला और चिकना होता है। सबसे बड़ी बात कि असली कोसा में हाथ से बुनाई की वजह से थोड़ी असमानता जरूर दिखती है,जो उसकी खूबसूरती है,कोई ऐब नहीं।

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छत्तीसगढ़ की शान, दुनिया की पसंद

कोसा सिल्क साड़ी की ख्याति अब सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। चांपा,कोरबा,रायगढ़ और बिलासपुर जैसे इलाकों में बनने वाली ये साड़ियां दिल्ली, मुंबई और कोलकाता तक ही नहीं, बल्कि ग्लोबली पहुंच रही हैं। चांपा को तो ‘कोसा की राजधानी’ कहा जाता है।

कोसा साड़ी की कीमत 2,500 रुपये से शुरू होकर 25,000 रुपये तक जा सकती है,जो डिजाइन और कारीगरी पर डिपेंड करती है। बस्तर आर्ट वाली कोसा साड़ियां तो ख़ास तौर पर पसंद की जाती हैं, क्योंकि उनमें छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला की झलक होती है।

सिर्फ कपड़ा नहीं, एक एहसास

कोसा सिल्क की सबसे बड़ी खासियत है ये गर्मियों में ठंडक देती है और सर्दियों में गर्माहट। ये स्किन के लिए पूरी तरह सेफ है और इसे पहनकर कोई एलर्जी नहीं होती। सनातन परंपरा में तो इसे इतना पवित्र माना जाता है कि पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोसा साड़ी खास तौर पर पसंद की जाती है।

शादी हो या त्योहार,रिसेप्शन हो या पूजा, कोसा साड़ी हर मौके पर जचती है। यही नहीं, आजकल तो लड़कियां इसे इंडो-वेस्टर्न स्टाइल में भी पहन रही हैं।

तो अगली बार जब आप साड़ी खरीदने जाएं, तो जरा ठहरिए। छत्तीसगढ़ की इस सुनहरी विरासत को अपनी अलमारी में जगह दीजिए। क्योंकि कोसा सिर्फ एक साड़ी नहीं बल्कि आपकी जड़ों से जुड़ाव है, और उन हजारों कारीगरों की मेहनत का फल है जो हमारी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं।

ये भी पढ़ें- चेट्टीनाड साड़ी: कपास के धागों में पिरोई तमिलनाडु की दास्तान

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