दक्षिण भारत की शादियों में एक ऐसा ज़ेवर है जो सदियों से दुल्हनों की ख़ूबसूरती का ताज है वो है गुट्टापुसालु (Guttapusalu)। ये सिर्फ़ एक हार नहीं, बल्कि मोतियों की एक ऐसी कहानी है जो हर क़दम पर झूमती है, हर लम्हे में चमकती है। अगर आपने कभी किसी दक्षिण भारतीय दुल्हन (South Indian brides) को देखा है जिसके गले में सैकड़ों छोटे मोती हरकत करते हुए चमकते हैं, तो आपने गुट्टापुसालु देखा है।

नाम में ही छुपा है राज़
तेलुगु में गुट्टा का मतलब है झुंड (जैसे छोटी मछलियों का झुंड), और पुसालु का मतलब है मोती। यानी गुट्टापुसालु हार वो सोने का हार है जिसके निचले किनारे पर छोटे मोतियों के गुच्छे लटकते हैं, जिन्हें अक्सर माणिक, पन्ना या पोल्की (कटे बिना) हीरों से सजाया जाता है। ये आंध्र और तेलंगाना की दुल्हनों का पहचान वाला हार है।
ये नाम बेहद सीधा है। यहां के कारीगर जो ये हार बनाते थे, उन्हें मोतियों के ये लटकते गुच्छे पानी में तैरती मछलियों के झुंड जैसे लगते थे गुट्टा। हर मोती, जिसे छेद करके पिरोया जाता था, बन जाता था पुसालु। यानी नाम में वही है जो आंखें देखती हैं, मोतियों के गुच्छे जो दुल्हन की हर हरकत के साथ झूलते हैं।

18वीं सदी से आज तक का सफ़र
गुट्टापुसालु की जड़ें आंध्र प्रदेश के मोती-मछुआरे तटों में 18वीं सदी में पाई जाती हैं। दरबार के सुनारों ने माणिक, पन्ना और पोल्की हीरों को एक चौड़े सोने के आधार पर जड़कर, नीचे मोतियों की झालर लगाकर एक ऐसा हार बनाया जो राजाओं-रानियों के लायक़ था। जो शुरूआत में मंदिर और राजपरिवार का ज़ेवर था, वही धीरे-धीरे दक्षिण भारतीय दुल्हनों की तैयारी का सेंटर प्वाइंट बन गया और ये मुक़ाम आज भी बरक़रार है। आज बॉलीवुड की दुल्हनें भी अपनी शादी के दिन गुट्टापुसालु हार चुनती हैं।

हर दुल्हन इसके बिना अधूरी क्यों?
तीन वजहें इसे हर दुल्हन के जूलरी बॉक्स का दिल बनाती हैं:-
1. शुभ प्रतीक: दक्षिण भारतीय परंपरा में मोती पवित्रता और समृद्धि के प्रतीक हैं। मछली जैसे गुच्छे भरपूर बरकत का इशारा करते हैं, नई शादी के लिए एक दुआ। कई डिज़ाइनों के बीच में देवी लक्ष्मी का पेंडेंट होता है, जो धन और कृपा को दिखाता है।
2. बेमिसाल हरकत और चमक: आम चपटे हार की तरह ये एक जगह रुका नहीं, बल्कि ज़िंदा है। सैकड़ों मोती रोशनी झपकाते हैं और दुल्हन के चलने पर झूलते हैं। कांजीवरम और बनारसी सिल्क के साथ तस्वीरों में बेहद ख़ूबसूरत लगते हैं।
3. विरासत की क़ीमत: 22K सोने, असली मोतियों और बेशक़ीमती पत्थरों से बना गुट्टापुसालु हार मां से बेटी को मिलने वाला ज़ेवर है, जिसके इमोशन और क़ीमत हर पीढ़ी के साथ बढ़ती जाती है।

नेकलेस की चमक
ये डिज़ाइन हर नेकलाइन पर फिट बैठता है। गुट्टापुसालु नेकलेस या चोकर गले की हड्डी के पास बैठता है और मॉडर्न दुल्हनों के लिए बेहतर है जो हल्का लुक पसंद करती हैं। गुट्टापुसालु लॉन्ग सीने के नीचे तक आता है यह क्लासिक ब्राइडल सिल्हूट है, जिसे अक्सर चोकर के ऊपर लेयर किया जाता है। 40–80 ग्राम के हल्के वर्ज़न ने इसे रिसेप्शन, फेस्टिवल और गिफ़्टिंग के लिए भी पहनने लायक़ बना दिया है।
गुट्टापुसालु सिर्फ़ एक ज़ेवर नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की मिट्टी, समंदर और परंपरा की महक है। यह मोतियों की झालर में छुपी एक दुआ है जिसमें है बरकत, पवित्रता और प्यार। जब कोई दुल्हन इसे पहनती है, तो लगता है जैसे सदियों की विरासत उसके गले में झूम रही हो।
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