असर लखनवी उर्दू शायरी की उस आख़िरी नस्ल के नुमाइंदे थे, जिन्होंने लखनऊ की तहज़ीब, ज़बान की नज़ाकत और शायराना रिवायत को अपने कलाम में ज़िंदा रखा। उनका असल नाम मिर्ज़ा जाफ़र अली ख़ां था, मगर अदबी हलकों में वह “असर” तख़ल्लुस से पहचाने गए। उनकी पैदाइश 12 जुलाई 1885 को लखनऊ के मुहल्ला कटरा अबुतुराब में हुई, और 6 जून 1967 को उनका इंतिक़ाल हुआ।
असर लखनवी ने अपनी इब्तिदाई तालीम लखनऊ में ही हासिल की और 1906 में मशहूर किंग कालेज (कैनिंग कॉलेज) से बी.ए. की डिग्री ली। तालीम मुकम्मल होने के बाद उन्होंने सरकारी मुलाज़मत इख़्तियार की और 1909 में संयुक्त प्रांत में डिप्टी कलेक्टर मुक़र्रर हुए। अपनी क़ाबिलियत और मेहनत की बिना पर उन्हें 1936 में “ख़ान बहादुर” का ख़िताब और 1939 में “एम.बी.ई.” का एज़ाज़ हासिल हुआ। 1940 में मुलाज़मत से सुबकदोश होने के बाद वह रियासत जम्मू-ओ-कश्मीर में वज़ीर मुक़र्रर हुए, जहां उन्होंने होम मिनिस्टर और वज़ीर-ए-तालीम जैसे अहम ओहदों पर भी ख़िदमत अंजाम दी। बाद में भारत सरकार ने उनकी अदबी और मुलाज़मती ख़िदमात को सराहते हुए उन्हें मुल्क के बड़े सिविलियन एज़ाज़ “पद्म भूषण” से नवाज़ा।
असर लखनवी की शायरी मौज़ूई ऐतबार से रिवायती ही रही, यानी उस दौर के लखनऊ में जो इश्क़िया रंग-ओ-आहंग आम था, उसी से मुताल्लिक़ थी। मगर उनकी असल ख़ूबी यह थी कि उन्होंने इस पुराने और घिसे-पिटे मौज़ू को अपनी सलीक़ामंद ज़बान, रवानी और रोज़मर्रा की बोलचाल के ख़ूबसूरत इस्तेमाल से एक नई ताज़गी बख़्शी। उनके उस्ताद अज़ीज़ लखनवी की रहनुमाई ने भी उनके शे’रों में मज़ीद निखार और चमक पैदा की। यही वजह है कि उनका कलाम आज भी सादगी और असर-अंगेज़ी की मिसाल समझा जाता है।
शायरी के साथ-साथ असर लखनवी एक ज़हीन नस्र-निगार भी थे। मुख़्तलिफ़ अदबी मौज़ूआत पर लिखे गए उनके मज़ामीन का मजमूआ “छानबीन” के नाम से शाया हुआ। इसके इलावा मीर अनीस और मिर्ज़ा ग़ालिब पर लिखी गई उनकी किताबें भी उर्दू तनक़ीद में निहायत अहम मानी जाती हैं। उनका पहला शे’री मजमूआ “असरस्तान” 1934 में मंज़रे-आम पर आया, जिसके बाद “बहारां” (1935), “रंग बसंत” और “लाला-ओ-गुल” जैसे मजमूए शाया हुए। इनमें से कुछ उस ज़माने में तैयार हुए जब वह कश्मीर में वज़ीर के फ़राइज़ अंजाम दे रहे थे।
असर लखनवी का कलाम उन्स-ओ-मुहब्बत, ग़म-ए-दुनिया और ज़िंदगी के फ़लसफ़े जैसे मौज़ूआत को बड़ी नज़ाकत से बयान करता है। उनका मशहूर शे’र “आह किस से कहें कि हम क्या थे, सब यही देखते हैं क्या हैं हम” आज भी उर्दू अदब के हलकों में बड़े चाव से पढ़ा जाता है।
आह किस से कहें कि हम क्या थे
सब यही देखते हैं क्या हैं हम
मजमूई तौर पर असर लखनवी को उस पूरी रिवायत का आख़िरी बड़ा हवाला माना जाता है, जिसने लखनऊ की तहज़ीब को शायरी की ज़बान में ढाला। उनकी सादा-ओ-सलीस शायरी, गहरे जज़्बात और ज़बान की सफ़ाई की वजह से आज भी अदब-दोस्तों के दरमियान ज़िंदा है।
इधर से आज वो गुज़रे तो मुंह फेरे हुए गुज़रे
अब उन से भी हमारी बे-कसी देखी नहीं जाती
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