कुछ लोग सिर्फ़ अपने दौर के लिए काम नहीं करते, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए एक रास्ता बना जाते हैं। सैयद मोहम्मद ज़मीन अली साहब भी उन्हीं में से एक थे एक ऐसे इंसान जिन्होंने उर्दू को सिर्फ़ शायरी की महफ़िलों से निकालकर यूनिवर्सिटी की डिग्रियों तक पहुंचाया। ज़मीन अली साहब वो शायर और मुअल्लिम थे जिन्होंने 1924 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उर्दू का पहला विभाग क़ायम कर उर्दू तालीम की बुनियाद रखी। लखनऊ स्कूल की रवायत में शायरी करने वाले इस “बाबा-ए-उर्दू” को नेहरू जी ने अपने दौर का सबसे शानदार उर्दू का सिपाही कहा था।
(वाज़ेह रहे: कुछ हवालों में इनकी पैदाइश 1880 दर्ज है, तो कहीं 1893 — ज़्यादातर मुस्तनद (authentic) सोर्सेज़ 1893 की तस्दीक़ करते हैं, मगर दोनों तारीख़ें अलग-अलग जगह मिलती हैं।)
रायबरेली के एक छोटे से गांव मुस्तफ़ाबाद से निकलकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसे बड़े इदारे तक का उनका सफ़र आसान नहीं था। उस दौर में, जब उर्दू को एक मुस्तक़िल (independent) मुक़ाम हासिल नहीं था वो फ़ारसी और ओरिएंटल स्टडीज़ के साये में दबी हुई थी। ज़मीन साहब ने एक ऐसा ख़्वाब देखा जो उस वक़्त बहुतों को अजीब लगा होगा: उर्दू का अपना अलग विभाग, अपनी अलग शिनाख़्त, अपना अलग मक़ाम।
आप से फ़रियाद करने आई है उर्दू ज़बान
गर मुनासिब हो तो हज़रत सुन लें उसकी दास्तां
यह सिर्फ़ एक एडमिनिस्ट्रेटिव फ़ैसला नहीं था। यह एक तरह की मुहब्बत की दास्तान थी। एक ज़बान से इतनी गहरी मुहब्बत कि इंसान अपनी सारी ज़िंदगी उसे संवारने में लगा दे। सर गंगानाथ झा जैसे संस्कृत के आलिम ने जब उनकी तजवीज़ मंज़ूर की, तो शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि यह फ़ैसला आगे चलकर पूरे मुल्क में उर्दू तालीम की बुनियाद बनेगा।
याद है वो भी जब आशिक जमाना था मेरा
बच्चे-बच्चे की ज़बां पर भी फ़साना था मेरा
एक उस्ताद जो ख़ुद भी शागिर्द था
दिलचस्प बात यह है कि ज़मीन साहब सिर्फ़ एक प्रशासक (administrator) नहीं थे। वो ख़ुद एक हस्सास (sensitive) शायर भी थे। मीर अली ओबैद “नैसा” की शागिर्दी में उन्होंने शायरी सीखी, और मुनीर शिकोहाबादी की रवायत को आगे बढ़ाया। उनकी ग़ज़लें और मर्सिये सादगी और सफ़ाई-ए-ख़याल की मिसाल थीं। न ज़्यादा तकल्लुफ़, न बनावट, बस सीधी दिल से निकली बात।
मुझ पे मरते थे मुसलमान, मुझ पे हिंदू थे निसार
फ़ारसी भी झेनपती थी देख कर मेरा सिंगार
यह बात ग़ौर करने लायक़ है कि जो इंसान ख़ुद शायर था, उसी ने यह भी सुनिश्चित किया कि आने वाली नस्लें सिर्फ़ शायरी पढ़ें नहीं, बल्कि उसे बाक़ायदा एक इल्म (discipline) की तरह सीखें। उनकी किताब “उर्दू ज़बान-ओ-अदब” आज भी उर्दू लिसानियात (linguistics) पर एक मुस्तनद हवाला मानी जाती है। इतनी मुकम्मल कि इसे सर जॉर्ज ग्रियर्सन के मशहूर “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया” से भी ज़्यादा जामे कहा गया।
गांधी जी का ख़्वाब और ज़मीन साहब का साथ
महात्मा गांधी का यह मानना था कि हिंदुस्तान की असली ज़बान वो होनी चाहिए जो हिंदू और मुसलमान, दोनों को जोड़े – हिंदुस्तानी, जो नागरी और उर्दू, दोनों रस्मुल-ख़त (script) में लिखी जा सके। इस ख़्वाब को हक़ीक़त की शक्ल देने के लिए 1926 में जब हिंदुस्तानी अकादमी बनी, तो ज़मीन साहब उसके बानी अराकीन (founding members) में शामिल थे। उन्होंने अकादमी की मैगज़ीन “हिंदुस्तानी” के उर्दू सेक्शन को एडिट किया। यानी एक तरफ़ यूनिवर्सिटी में उर्दू को मज़बूत कर रहे थे, दूसरी तरफ़ क़ौमी एकता की ज़बान बनाने में भी अपना किरदार निभा रहे थे।
बज़्म-ए-आलम हो क्यों तीरा-ओ-तार
शमा-ए-इंसानियत खामोश है आज
आख़िरी सफ़र
25 अप्रैल 1955 को यह चराग़ बुझ गया, मगर इसकी रोशनी आज भी उर्दू विभागों की शक्ल में हिंदुस्तान भर की यूनिवर्सिटीज़ में जल रही है। पंडित नेहरू ने उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा था कि वो अपने दौर के सबसे शानदार सिपाही थे, जो उर्दू की ख़िदमत के लिए लड़ते रहे।
आज जब भी कोई तालिब-ए-इल्म उर्दू में एम.ए. या पीएचडी करता है, तो कहीं न कहीं वो ज़मीन अली साहब की उसी मेहनत का सिला चख रहा होता है एक ऐसा तोहफ़ा जो एक इंसान ने पूरी क़ौम को दिया।
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