उर्दू अदब की दुनिया में अमजद हैदराबादी का नाम उन शायरों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी शायरी में ज़िंदगी के दर्द, इंसानी बेबसी, रूहानी एहसास और नैतिक चिंताओं को बेहद सादगी और असरदार अंदाज़ में बयान किया। उनका असली नाम सैयद अहमद हुसैन बताया जाता है। मार्च 1888 में हैदराबाद दकन में पैदा हुए अमजद आगे चलकर रुबाई के एक ऐसे अहम शायर बने, जिनकी पहचान उर्दू अदब में अलग मुकाम रखती है। अदबी हलकों में उन्हें ‘हकीम-उश-शुअरा’ के नाम से भी याद किया जाता है।
अमजद के वालिद सूफ़ी सैयद रहीम अली गहरी धार्मिक आस्था रखने वाले शख़्स थे। अमजद अभी कमसिन (कम उम्र) में ही थे कि उनके वालिद का इंतक़ाल हो गया। शुरुआती तालीम उन्होंने मकतब में हासिल की। इसके बाद उन्होंने हैदराबाद के मदरसा निज़ामिया में निज़ामिया पाठ्यक्रम के मुताबिक़ पढ़ाई जारी रखी। यहां उन्होंने अरबी और फ़ारसी ज़बान पर अच्छी पकड़ हासिल की। यही इल्मी माहौल आगे चलकर उनकी शायरी की बुनियाद बना।
रोज़गार के लिए अमजद ने पहले दारुल उलूम स्कूल में बतौर शिक्षक के तौर पर काम किया। बाद में उन्होंने हैदराबाद रियासत के अकाउंट्स और ऑडिट विभाग में भी अपनी सेवाएं दीं। लेकिन उनकी असल पहचान सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि उनकी शायरी बनी।
मूसी नदी की बाढ़ और ज़िंदगी का सबसे बड़ा सदमा
अमजद हैदराबादी की ज़िंदगी का सबसे दर्दनाक हादसा 28 सितंबर 1908 को आया, जब हैदराबाद में मूसी नदी में भयानक बाढ़ आई। इस क़हर ने शहर में भारी तबाही मचाई। अमजद भी इस सैलाब में फंस गए। उन्होंने एक इमली के पेड़ की शाखाओं को पकड़कर अपनी जान बचाई, लेकिन उनके परिवार के कई लोग इस त्रासदी में बह गए।
इस हादसे ने उनकी पूरी ज़िंदगी और शायरी का रुख़ बदल दिया। मां, बीवी और बेटी को खोने का ग़म उनके दिल में हमेशा के लिए बस गया। वह इस हादसे में अपने परिवार के अकेले बचे सदस्य थे। इस गहरे सदमे और तन्हाई की झलक उनकी बाद की रुबाइयों में बार-बार दिखाई देती है।
मूसी नदी की इस त्रासदी पर उन्होंने ‘क़यामत-ए-सुग़रा’ जैसी मशहूर रचना लिखी, जिसमें उन्होंने उस भयावह मंज़र और अपने निजी दर्द को शब्द दिए। यह सिर्फ़ एक प्राकृतिक आपदा का बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे इंसान की दास्तान थी, जिसने अपनी आंखों के सामने अपनी दुनिया उजड़ते देखी। उन्होंने अपनी निगाहों से जो मंज़र देखे, उनकी पूरी कैफ़ियत उनकी नज़्म में क़यामत के मंज़र की तरह उभरकर सामने आती है।
इतनी दरिया में भी न डूबा अमजद
डूबने वालों को बस एक चुल्लू काफ़ी है
रुबाई को बनाया अपना ख़ास अंदाज़
अमजद हैदराबादी की सबसे बड़ी पहचान रुबाई के शायर के तौर पर है। मशहूर आलोचक फ़रमान फ़तेहपुरी ने अमजद के बारे में कहा कि वह “पहले और आख़िर तक रुबाई के शायर” हैं। अमजद ने रुबाई को सिर्फ़ चार मिसरों की शायरी नहीं समझा, बल्कि इसके ज़रिए ज़िंदगी, मौत, इंसान, तक़दीर, तन्हाई और रूहानी एहसास जैसे विषयों को बेहद गहराई से पेश किया।
उनकी रुबाइयों में एक तरफ़ दुनिया की बेवफ़ाई और इंसानी बेबसी का एहसास मिलता है, तो दूसरी तरफ़ ख़ुदा की तलाश और रूहानी यक़ीन भी दिखाई देता है।
“झोलियां सब की भरती जाती हैं
देने वाला नज़र नहीं आता”
इन अशआर में इंसान की ज़रूरत, उसकी उम्मीद और उस अनदेखी ताक़त पर यक़ीन का ख़ूबसूरत इज़हार मिलता है।
“किस तरह नज़र आए वो पर्दा-नशीं ‘अमजद’
हर पर्दे के बाद और इक पर्दा नज़र आता है”
यहां शायर एक ऐसे हक़ीक़त की तलाश करता दिखाई देता है, जो दिखाई तो नहीं देती, मगर हर तरफ़ अपनी मौजूदगी का एहसास कराती है।
अमजद की शायरी में दर्द है, मगर सिर्फ़ मातम नहीं। उसमें तजुर्बा है, फ़िक्र है और इंसान को अपनी हक़ीक़त समझने की पुकार भी है। वह दौलत, दुनिया की चमक और इंसानी कमज़ोरियों पर भी गहरी नज़र डालते हैं।
अदबी विरासत
अमजद हैदराबादी की किताबों में ‘रुबाइयात-ए-अमजद हैदराबादी’ और ‘अदबी इजलास व मुशायरा’ का ज़िक्र मिलता है। उनके कलाम पर भी कई किताबें लिखी गईं, जिनमें ‘हकीम-उश-शुअरा अमजद हैदराबादी’ और के. सी. कंदा की Masterpieces of Urdu Rubaiyat शामिल हैं।
उनकी रुबाइयां बाद के दौर में भी पढ़ी और सुनाई जाती रहीं। यहां तक कि वारसी ब्रदर्स जैसे मशहूर क़व्वालों ने भी उनके कलाम को अपनी क़व्वालियों में जगह दी। इस तरह अमजद का कलाम सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं रहा, बल्कि महफ़िलों और क़व्वाली की रिवायत के ज़रिए भी लोगों तक पहुंचता रहा।
अमजद हैदराबादी का इंतक़ाल मार्च 1961 में हुआ। लेकिन उनका अदबी सफ़र आज भी ज़िंदा है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े दर्द को मायूसी में गुम करने के बजाय उसे शायरी की ताक़त बना दिया।
उनकी रुबाइयां हमें याद दिलाती हैं कि कभी-कभी इंसान का सबसे बड़ा दर्द ही उसकी सबसे गहरी आवाज़ बन जाता है। अमजद हैदराबादी ने इसी दर्द को अल्फ़ाज़ दिए और रुबाई को ऐसी रूहानी गहराई दी, जिसकी वजह से उनका नाम उर्दू अदब में हमेशा याद किया जाता रहेगा।
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