Monday, August 31, 2026
34 C
Delhi

असग़र गोंडवी: शायरी में मोहब्बत, तसव्वुफ़ और ज़िंदगी की रौशन फ़िक्र

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनका कलाम सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। असग़र गोंडवी उन्हीं शायरों में शुमार हैं। उनकी शायरी में मोहब्बत है, हुस्न है, रूहानियत है और ज़िंदगी को देखने का एक गहरा फ़लसफ़ा भी। उनकी ख़ासियत यह थी कि तसव्वुफ़ जैसे गंभीर विषय को भी उन्होंने बेहद दिलकश, नर्म और ख़ुशगवार अंदाज़ में पेश किया।

गोरखपुर से गोंडा तक का सफ़र

असग़र गोंडवी का असल नाम असग़र हुसैन था। उनकी पैदाइश 1884 में गोरखपुर में हुयी। उनके वालिद तफ़ज़्ज़ुल हुसैन नौकरी के सिलसिले में गोंडा में रहने लगे और बाद में यही शहर असग़र की मुस्तक़िल पहचान बन गया। इसी वजह से वह ‘गोंडवी’ कहलाए। उनका निधन 30 नवंबर 1936 को इलाहाबाद में हुआ।

असग़र की शुरुआती तालीम घर और मकतब से हुई। उन्होंने उर्दू और अरबी की बुनियादी तालीम हासिल की और आगे चलकर गोंडा के सरकारी स्कूल में अंग्रेज़ी की पढ़ाई की। दस्तयाब तफ्सीलात के मुताबिक उन्होंने 1904 में मिडिल यानी 8th क्लास का इम्तिहान पास किया। इसके बाद औपचारिक शिक्षा का सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन उनकी इल्मी प्यास कभी कम नहीं हुई। उन्होंने ख़ुद मेहनत करके उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया।

यही ख़ुद-मुताला’आ आगे चलकर उनकी शायरी और फ़िक्र की सबसे बड़ी ताक़त बना। उन्होंने किसी बड़े विश्वविद्यालय की डिग्री हासिल नहीं की, लेकिन उनकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल बनी कि इल्म सिर्फ़ किताबों और डिग्रियों का मोहताज नहीं होता।

नौकरी से पत्रकारिता तक

असग़र ने ज़िंदगी में अलग-अलग काम किए। कुछ समय रेलवे में नौकरी की और बाद में साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ गए। 1912 में उन्होंने फ़ैज़ाबाद से प्रकाशित होने वाले अख़बार ‘क़ैसर-ए-हिंद’ में काम किया, जो बाद में ‘पयाम-ए-हिंद’ के नाम से प्रकाशित हुआ। उनके शुरुआती कलाम को भी इसी दौर में जगह मिली।

1926 में वह लाहौर के ‘उर्दू मरकज़’ से जुड़े, हालांकि वहां उनका साथ ज़्यादा लंबा नहीं रहा। इसके बाद इलाहाबाद की हिन्दुस्तानी एकेडमी से उनका रिश्ता बना। सर तेज बहादुर सप्रू उनके प्रशंसकों में थे और उनके ज़रिए असग़र का एकेडमी से संबंध हुआ। 1930 से 1936 तक वह इससे जुड़े रहे और साहित्यिक पत्रकारिता में भी अपनी पहचान बनाई।

जिगर मुरादाबादी और असग़र की दोस्ती

असग़र गोंडवी की ज़िंदगी का एक अहम अध्याय जिगर मुरादाबादी से उनकी दोस्ती है। दोनों की मुलाक़ात गोंडा के मुशायरों में हुई और धीरे-धीरे यह रिश्ता गहरी दोस्ती में बदल गया। असग़र ने जिगर की शायरी और ज़िंदगी पर गहरा असर डाला। जिगर भी असग़र की शायरी के इतने क़ायल थे कि उनकी ग़ज़लें अपने साथ रखते और लोगों को सुनाते थे।

शायरी का अलग अंदाज़

असग़र गोंडवी की शायरी को सिर्फ़ इश्क़िया या सिर्फ़ सूफ़ियाना शायरी कहना उनके फ़न को छोटा कर देना होगा। उनकी ग़ज़ल में इश्क़ और रूहानियत एक-दूसरे से इस तरह मिलते हैं कि दुनियावी मोहब्बत भी एक रूहानी एहसास में बदल जाती है।

“चला जाता हूं हंसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
अगर आसानियां हों ज़िंदगी दुश्वार हो जाए।”

असग़र की शायरी की यही ख़ासियत उन्हें अपने दौर के दूसरे शायरों से अलग करती है। वह बहुत ज़्यादा लिखने के बजाय अपने कलाम को संवारने और उसे फ़न की बुलंदी तक पहुंचाने पर ज़ोर देते थे।

तसव्वुफ़ और इंसानी मोहब्बत

असग़र की फ़िक्र पर तसव्वुफ़ का गहरा असर था, लेकिन उनका सूफ़ियाना अंदाज़ मुश्किल और बोझिल नहीं था। उनके अशआर में इश्क़, इंसान और ख़ुदा के बीच के रिश्ते को बेहद नर्म लहजे में महसूस किया जा सकता है।

उनकी शायरी में यही वजह है कि जो पाठक सूफ़ियाना मज़ामीन से बहुत वाक़िफ़ न भी हो, वह भी उनके कलाम की मिठास और रूहानी कैफ़ियत से जुड़ जाता है।

असग़र गोंडवी ने शायरी को कभी महज़ शोहरत हासिल करने का ज़रिया नहीं बनाया। वह कम लिखते थे, लेकिन उनके हर शेर में फ़िक्र, नफ़ासत और एहसास की गहराई दिखाई देती है।

1936 में उनका इंतिक़ाल हो गया, लेकिन उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब में एक ऐसी आवाज़ के तौर पर ज़िंदा है, जिसमें मोहब्बत की गर्मी, तसव्वुफ़ की रौशनी और ज़िंदगी की नफ़ासत एक साथ महसूस होती है।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

इफ़्तिख़ार आरिफ़: शायरी में हिजरत, मोहब्बत और रूहानियत की दास्तान

उर्दू शायरी में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो...

बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात...

जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे...

Topics

बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात...

जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे...

मुनीर शिकोहाबादी: 1857 की क्रांति और शायरी की बुलंद आवाज़

उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद ज़िले में बसा शिकोहाबाद सिर्फ़...

राखी के धागे में बंधा भाई-बहन का प्यार, उर्दू शायरों ने भी सजाए जज़्बात

रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्यार और ख़ुलूस का त्योहार...

Related Articles

Popular Categories