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राफ़िया ज़ैनब: सादगी में ढली मोहब्बत और ज़िंदगी की शायरी

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जो बहुत शोर के साथ सामने नहीं आतीं, लेकिन धीरे-धीरे दिल में अपनी जगह बना लेती हैं। राफ़िया ज़ैनब भी एक ऐसी ही शायरा हैं, जिनके कलाम में सादगी, गहरी सोच और दिल के एहसास एक साथ दिखाई देते हैं। उनकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे कोई शख़्स बहुत क़रीब बैठकर अपने दिल की बात कह रहा हो। उनके कलाम सीधे दिल तक पहुंचता है।

राफ़िया ज़ैनब की पैदाइश 17 मई 1995 को फ़तेहपुर, उत्तर प्रदेश में हुई। कम उम्र में ही उन्होंने शायरी की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश शुरू की। उनकी शायरी की सबसे ख़ास बात यह है कि उसमें मुश्किल अल्फ़ाज़ और पेचीदा अंदाज़ के बजाय आम फ़हम ज़बान दिखाई देती है। यही सादगी उनके कलाम को सीधे पाठक और श्रोता के दिल तक पहुंचाती है।

राफ़िया की ग़ज़लों में इश्क़ का रंग ज़रूर है, लेकिन उनका इश्क़ सिर्फ़ महबूब की तारीफ़ तक महदूद नहीं रहता। उसमें जुदाई, इंतज़ार, तन्हाई और शिकायत है और कभी-कभी अपने ही दिल से होने वाली बातचीत भी है। वह रिश्तों की उन कैफ़ियत को शेर में ढालती हैं, जिन्हें हम अक्सर महसूस तो करते हैं, मगर बयान नहीं कर पाते।

“उम्र गुज़री कि तुझे हम ने भुला रक्खा है
अपने हर जानने वाले को बता रक्खा है”

इन दो पंक्तियों में भूलने का दावा भी है और याद की एक गहरी कसक भी। इंसान अक्सर दुनिया के सामने कह देता है कि उसने किसी को भुला दिया, लेकिन दिल की दुनिया इतनी आसानी से खाली नहीं होती। राफ़िया इसी छुपे हुए एहसास को बहुत सादे अंदाज़ में सामने रख देती हैं।

तन्हाई भी उनकी शायरी का एक अहम रंग है। वह तन्हाई को सिर्फ़ अकेलेपन के तौर पर नहीं देखतीं, बल्कि उसे एक ऐसी कैफ़ियत की तरह पेश करती हैं जिसमें इंसान अपने आप से भी सवाल करने लगता है।

“न सही वस्ल कोई, जिस्म तो हो पहलू में
मुझ को तन्हाई ने दीवाना बना रक्खा है”

यहां मिलने की चाह और अकेलेपन की तकलीफ़ दोनों एक साथ महसूस होती हैं। यही उनकी शायरी की ख़ूबी है कि वह बड़े एहसास को छोटे और आसान अल्फ़ाज़ में कह देती हैं।

“मुतमइन थी मैं, मना लूंगी उसे
ग़ैर क्यों सुलझा गया झगड़ा मेरा”

इस शेर में शिकायत भी है और एक हल्की-सी कसक भी। जिस रिश्ते को अपने हाथों संभालने की उम्मीद थी, उसे किसी और के ज़रिए सुलझते देखना अपने आप में एक अजीब एहसास है।

राफ़िया की शायरी सिर्फ़ इश्क़ की उदासी तक सीमित नहीं है। उसमें ख़ुद से सवाल करने का अंदाज़ भी है। वह मोहब्बत को एक ऐसी कैफ़ियत के रूप में देखती हैं, जिससे इंसान चाहकर भी पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाता।

“दिल को इंकार है मोहब्बत से
और इसका सबब मोहब्बत है”

यह छोटा-सा शेर अपने अंदर एक पूरी कहानी समेटे हुए है। दिल मोहब्बत से इंकार करता है, लेकिन उसी इंकार की वजह भी मोहब्बत ही है। शायद यही इश्क़ की सबसे बड़ी उलझन है जिस चीज़ से बचना चाहते हैं, कई बार वही सबसे ज़्यादा अपने क़रीब होती है।

उनकी शायरी में उम्मीद और रहमत का रंग भी दिखाई देता है। ज़िंदगी की मुश्किल और तपती हुई राहों के बाद जब सुकून का कोई पल आता है, तो उसकी ख़ुशी भी उनके कलाम में महसूस होती है।

“जलती रुतों में उम्र गुज़रने के बाद अब
सरशार एक साया-ए-रहमत ने कर दिया”

राफ़िया ज़ैनब की शायरी में मोहब्बत के साथ-साथ रिश्तों की नज़ाकत भी दिखाई देती है।  

“कभी मुक़द्दर जो ये इनायत करे तो क्या हो
बिछड़ के मुझ से वो मेरी चाहत करे तो क्या हो”

यहां एक उम्मीद है, एक सवाल है और शायद उस रिश्ते के दोबारा लौट आने की हल्की-सी आरज़ू भी।

“मुझे सवाल की शर्मिंदगी से उलझन थी
वो मेरे पूछे बिना हर जवाब रखता था।”

इस शेर में रिश्ते की वह ख़ूबसूरती दिखाई देती है जहां सामने वाला आपकी ख़ामोशी भी पढ़ लेता है। हर बात कहनी नहीं पड़ती, कुछ एहसास आंखों और ख़ामोशी से भी समझ लिए जाते हैं।

राफ़िया ज़ैनब की शायरी की असल ताक़त इसी सादगी में है। वह मुश्किल बात को आसान अल्फ़ाज़ में कहती हैं और फिर उसे इस तरह दिल के सामने रख देती हैं कि पढ़ने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है।

उर्दू शायरी की नई आवाज़ों में राफ़िया ज़ैनब का कलाम इसी वजह से ध्यान खींचता है कम अल्फ़ाज़, गहरे एहसास और रिश्तों की सच्ची तस्वीर। उनकी शायरी हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी दिल की सबसे बड़ी बातें कहने के लिए बहुत ज़्यादा अल्फ़ाज़ की ज़रूरत नहीं होती।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

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