जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में बसा Mattan (मट्टन) सिर्फ़ एक गांव नहीं है। ये उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की ख़ूबसूरत मिसाल है, जहां पर अलग-अलग मज़हबों के लोग अपनी आस्था के साथ एक-दूसरे की इज़्ज़त और एहतराम करते हुए रहते हैं। यहां मंदिर है, मस्जिद है और गुरुद्वारा भी है, लेकिन इनके बीच कोई दूरी नहीं, बल्कि एक ऐसा रिश्ता है जो बरसों से इस गांव की पहचान बना हुआ है। यहां त्योहार सिर्फ़ खुशियां मनाने का मौक़ा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के क़रीब आने और मोहब्बत बांटने का ज़रिया हैं।
Mattan (मट्टन) में एक तारीख़ी जगह है, जहां एक प्राचीन मंदिर परिसर मौजूद है। इसके पास ही गुरुद्वारा Mattan (मट्टन) साहिब है और कुछ दूरी पर मस्ज़िद भी है। DNN24 की टीम जब इस गांव में पहुंची, तो यहां के स्थानीय निवासी राजीव सिंह ने बताया कि इसी ज़मीन पर सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी ने अपने कदम रखे थे। उनके मुताबिक, इस पाक ज़मीन पर तीनों मज़हबों के लोग रहते हैं और सालों से हिंदू-मुस्लिम-सिख भाईचारा कायम है।
स्थानीय निवासी बसंत कुमार खार बताते हैं कि Mattan में भाईचारे की ये रवायत बहुत पुरानी है। यहां कोई भी त्योहार हो, यहां के लोग मिलजुल कर मनाते हैं। एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना यहां कोई ख़ास बात नहीं, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। खुशियां हों या कोई मुश्किल, पड़ोसी एक-दूसरे के साथ खड़े नज़र आते हैं।

गुरु नानक देव जी के कदमों से जुड़ी Mattan की तारीख़
गुरुद्वारा Mattan (मट्टन) साहिब के हेड ने बताया कि ये एक तारीख़ी गुरुद्वारा है। मान्यता है कि गुरु नानक देव जी 1517 ईस्वी में अपनी तीसरी उदासी (यात्रा) के दौरान Mattan (मट्टन) आए थे। उस दौर में यहां पंडित ब्रह्म दास रहते थे। वो अपने इल्म के लिए मशहूर थे, लेकिन उन्हें अपने ज्ञान पर गुरूर था।
कहा जाता है कि गुरु नानक देव जी ने अपने विचारों के ज़रिए उनका गुरूर ख़त्म किया। इसी दौरान गुरु नानक देव जी ने ‘आसा दी वार’ की एक पंक्ति का उच्चारण किया-
पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥
पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥
पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥
नानक लेखै इक गल होरु हउमै झखणा झाख ॥१॥
गुरुबाणी की इन पंक्तियों के ज़रिए गुरु नानक देव जी ने उनके गुरूर को तोड़ा। गुरु नानक देव जी विचारों से पंडित ब्रह्म दास का गुरूर दूर हुआ और वो गुरु नानक देव जी के सिख बन गए। इसके बाद उन्होंने सिख धर्म के प्रचार में भी अपना योगदान दिया।

फज्र की अज़ान, भजन और गुरबाणी
Mattan (मट्टन) की ख़ूबसूरती सिर्फ़ इसकी तारीख़ में नहीं, बल्कि आज की ज़िंदगी में भी दिखाई देती है। यहां सुबह की शुरुआत अलग-अलग मज़हबों की इबादत से होती है। एक स्थानीय निवासी बताते हैं कि सुबह मुस्लिम समुदाय के लोग फ़ज्र की नमाज़ के लिए उठते हैं। मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आती है। इसके बाद हिंदू अपने भजन शुरू करते हैं और सिख गुरुद्वारे में अपनी अरदास और पूजा-पाठ करते हैं।
लेकिन इन आवाज़ों के बीच कभी कोई इख़्तिलाफ़ या शिकायत नहीं हुई। कोई ये नहीं कहता कि दूसरे की आवाज़ बंद होनी चाहिए। हर कोई अपनी इबादत करता है और दूसरे के मज़हब और आस्था का एहतराम करता है।
त्योहारों के मौक़े पर ये भाईचारा और भी खूबसूरत दिखाई देता है। हिंदू त्योहार हो, मुस्लिम त्योहार या सिखों का कोई पर्व लोग एक-दूसरे के घर और मोहल्लों में पहुंचते हैं, खुशियां बांटते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं।

अमरनाथ यात्रा से जुड़ी है Mattan की आस्था
Mattan (मट्टन) के मार्तंड तीर्थ की भी अपनी ख़ास अहमियत है। यहां मौजूद पवित्र कुंड में रहने वाली मछलियों को लेकर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था है। हिंदू मान्यता के मुताबिक, इन्हें अपने बुज़ुर्गों और पूर्वजों की रूहों से जोड़कर देखा जाता है। लोग इनका एहतराम करते हैं और इन्हें दाना खिलाते हैं। यहां के लोगों के मुताबिक, अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले कई श्रद्धालु यहां भी दर्शन करते हैं। इस वजह से Mattan (मट्टन) की धार्मिक और रूहानी अहमियत और बढ़ जाती है।
लेकिन Mattan (मट्टन) की सबसे बड़ी पहचान इसकी इमारतें या तारीख़ी जगहें नहीं, बल्कि यहां के लोगों के बीच का रिश्ता है। यहां की कहानी किसी बड़ी हेडलाइन की नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे रिश्तों की है, जो हर रोज़ इंसानियत को ज़िंदा रखते हैं। शायद इसीलिए अगर आपको इंसानियत की मिसाल देखनी हो, तो Mattan (मट्टन) ज़रूर आइए।
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