Monday, July 27, 2026
36.7 C
Delhi

शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई: सूफ़ी फ़िक्र, इंसानियत और मोहब्बत के अज़ीम शायर

सिंध की सरज़मीं ने अनेक सूफ़ी संतों और शायरों को जन्म दिया, लेकिन शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई का नाम उनमें सबसे बुलंद माना जाता है। वे सिर्फ़ सिंधी भाषा के महान शायर ही नहीं, बल्कि एक सूफ़ी संत, समाज सुधारक और रूहानी रहनुमा भी थे। उनकी शायरी आज भी सिंध ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में बसे सिंधी समाज के दिलों में ज़िंदा है। उनकी तालीम का मक़सद इंसान को मोहब्बत, इंसानियत, सब्र और ख़ुदा की पहचान की राह पर चलाना था।

शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई की पैदाइश करीब 1689 ईस्वी (1102 हिजरी) में सिंध के हैदराबाद ज़िले के हाला हवेली गांव में एक सम्मानित सैयद परिवार में हुयी। उनके वालिद का नाम सैयद हबीबुल्लाह शाह था। बचपन से ही उनका झुकाव दुनियावी ऐशो-आराम की बजाय इल्म, फ़िक्र और रूहानियत की तरफ़ था।

बाद में उनका परिवार कोटड़ी में आकर बस गया, लेकिन शाह लतीफ़ का दिल हमेशा ख़ामोशी, तफ़क्कुर और इबादत में लगा रहता था। आख़िरकार उन्होंने रेत के टीलों वाली एक जगह को अपना ठिकाना बनाया, जिसे बाद में भिट शाह के नाम से जाना जाने लगा। आज यही जगह उनकी दरगाह की वजह से पूरी दुनिया में मशहूर है।

तालीम और रूहानी सफ़र

कहा जाता है कि शाह लतीफ़ ने किसी मदरसे या स्कूल से नियमित तालीम हासिल नहीं की। उन्होंने सफ़र, सूफ़ी बुज़ुर्गों की सोहबत और गहरे अध्ययन से इल्म हासिल किया। उन्हें सिंधी, फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और सराइकी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था।

उन्होंने क़ुरआन शरीफ़, हदीस, मौलाना रूमी की मसनवी और शाह करीम बुलड़ी के कलाम का गहराई से अध्ययन किया। मौलाना रूमी की सूफ़ियाना सोच का असर उनकी शायरी में साफ़ दिखाई देता है।

शाह लतीफ़ की शायरी

शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई की शायरी इंसानियत, मोहब्बत और तसव्वुफ़ का ख़ूबसूरत संगम है। उन्होंने कभी अपनी शायरी ख़ुद नहीं लिखी। जब वे रूहानी कैफ़ियत में होते, तो उनके अशआर ज़ुबान पर आ जाते और उनके मुरीद उन्हें लिख लिया करते थे।

उनकी तमाम शायरी का संग्रह “शाह जो रिसालो” के नाम से मशहूर है। यह सिंधी अदब की सबसे अहम और मुकम्मल किताबों में गिनी जाती है। इसमें करीब 30 सुर, 195 अध्याय और 3000 से ज़्यादा अशआर शामिल हैं। हर सुर किसी न किसी भारतीय राग और संगीत पर आधारित है, इसलिए आज भी उनका कलाम सुरों में गाया जाता है।

शायरी का पैग़ाम

शाह लतीफ़ की शायरी का सबसे बड़ा पैग़ाम है कि इंसान अपनी ज़िंदगी का असली मक़सद पहचाने। उनके मुइंसान की मंज़िल सिर्फ़ दुनियावी कामयाबी नहीं, बल्कि महबूब-ए-हक़ीक़ी यानी अल्लाह की पहचान है।

वे फ़रमाते हैं कि इंसान जब तक अपने नफ़्स, घमंड और ख़ुदपरस्ती को नहीं मिटाएगा, तब तक वह रूहानी बुलंदी हासिल नहीं कर सकता। ख़ुद को मिटाना ही असली कामयाबी है।

उनका मानना था कि अपने मज़हब को सही मायनों में समझना और उस पर अमल करना ही इंसान को सच्ची रूहानियत तक पहुंचाता है।

ख़ुद-शनासी की तालीम

शाह लतीफ़ बार-बार ख़ुद-शनासी (अपने आप को पहचानने) पर ज़ोर देते हैं। उनका कहना था कि जो इंसान अपने रब और अपनी असलियत को पहचान लेता है, उसे दुनिया की तारीफ़, शोहरत और वाहवाही की ज़रूरत नहीं रहती।

ऐसा इंसान हर वक़्त ख़ुदा की याद में रहता है। उसका दिल इलाही मोहब्बत का घर बन जाता है और उसकी ज़िंदगी दूसरों के लिए रहमत बन जाती है।

इंसानियत और बराबरी

शाह अब्दुल लतीफ़ ने अपनी शायरी में इंसानों के बीच किसी भी तरह के भेदभाव का विरोध किया। उन्होंने अमीर-ग़रीब, ऊंच-नीच और मज़हबी नफ़रत से ऊपर उठकर इंसानियत, भाईचारे और मोहब्बत का पैग़ाम दिया।

1742 में अपने वालिद के इंतिक़ाल के बाद शाह लतीफ़ हमेशा के लिए भिट शाह आ गए। ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में वे कई दिनों तक अपनी हुजरे में इबादत और तफ़क्कुर में मशग़ूल रहे।

14 सफ़र 1165 हिजरी (1752 ईस्वी) को 63 साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हुआ। उन्हें भिट शाह में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

आज भी हर जुमेरात (गुरुवार) की रात उनकी दरगाह पर उनका कलाम सुरों में पढ़ा और गाया जाता है। हर साल उनके उर्स पर लाखों अकीदतमंद वहां पहुंचकर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

Sarnath: बुद्ध के पहले उपदेश से UNESCO World Heritage तक का सफ़र

बस यूं समझिए, ये वो मुक़ाम है, जहां ख़ामोश...

आगा मुहम्मद दाऊद: सूफ़ियाना फ़िक्र और उर्दू-फ़ारसी शायरी के रूहानी शायर

उर्दू अदब और तसव्वुफ़ की दुनिया में आगा मुहम्मद...

शाह आलम सानी : मुग़ल ताज के आख़िरी बादशाह और उर्दू अदब के शायर

मुग़ल सल्तनत के इतिहास में शाह आलम सानी का...

Topics

Sarnath: बुद्ध के पहले उपदेश से UNESCO World Heritage तक का सफ़र

बस यूं समझिए, ये वो मुक़ाम है, जहां ख़ामोश...

शाह आलम सानी : मुग़ल ताज के आख़िरी बादशाह और उर्दू अदब के शायर

मुग़ल सल्तनत के इतिहास में शाह आलम सानी का...

मंज़ूर आरिफ़: सादा लफ़्ज़ों में गहरी बात कहने वाले शायर

उर्दू अदब में मंज़ूर आरिफ़ का नाम उन शायरों...

Free Library: एक छोटे से बुक बैंक ने दी लाखों सपनों को नई उड़ान!

समाज में बदलाव सिर्फ़ बड़े-बड़े भाषणों से नहीं आता,...

शैख़ फ़ख़रुद्दीन इब्राहीम इराक़ी: सूफ़ी फ़िक्र की बुलंद आवाज़

शैख़ फ़ख़रुद्दीन इब्राहीम इराक़ी सातवीं सदी हिज्री के उन...

Related Articles

Popular Categories