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शाह आलम सानी : मुग़ल ताज के आख़िरी बादशाह और उर्दू अदब के शायर

मुग़ल सल्तनत के इतिहास में शाह आलम सानी का नाम एक ऐसे बादशाह के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने मुश्किल हालात में भी इल्म, अदब और सल्तनत की शान को क़ायम रखने की कोशिश की। वे सिर्फ़ दिल्ली के बादशाह ही नहीं थे, बल्कि उर्दू और फ़ारसी के एक उम्दा शायर भी थे। शायरी की दुनिया में उन्होंने ‘आफ़ताब’ तख़ल्लुस अपनाया और अपने दिली जज़्बात को ग़ज़लों और अशआर की शक्ल में बयान किया।

शाह आलम सानी का असली नाम अब्दुल्लाह था। बचपन में उन्हें लाल मियां और मिर्ज़ा बुलाक़ी के नाम से पुकारा जाता था। वे मुग़ल बादशाह (आलमगीर II) के बेटे थे। सन 1754 में उन्हें शहज़ादा अली गौहर का ख़िताब दिया गया और दो साल बाद 1756 में वे शाह आलम के नाम से मुग़ल तख़्त पर बैठे। उस समय मुग़ल सल्तनत अपने पतन के दौर से गुज़र रही थी, लेकिन शाह आलम ने हालात को संभालने की हर मुमकिन कोशिश की।

बचपन से ही शाह आलम सानी बेहद ज़हीन, मेहनती और इल्म से मोहब्बत करने वाले इंसान थे। उन्होंने दीनी तालीम के साथ-साथ तारीख़, फ़लसफ़ा और मशरिक़ी उलूम का गहरा अध्ययन किया। अरबी, फ़ारसी, तुर्की और हिंदुस्तानी ज़बानों पर उनकी शानदार पकड़ थी। वे समकालीन साहित्य के अच्छे जानकार थे और शायरी के बारीक़ उसूलों से भी पूरी तरह वाक़िफ़ थे। यही वजह है कि उनकी ग़ज़लों में भाषा की मिठास, ख़यालों की गहराई और जज़्बात की सच्चाई साफ़ दिखाई देती है।

शाह आलम सानी केवल अदब के सरपरस्त ही नहीं थे, बल्कि एक बहादुर हुक्मरान भी थे। उन्होंने अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभाव का डटकर मुक़ाबला किया। बक्सर की मशहूर जंग में उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी। हालांकि यह जंग उनके हक़ में नहीं रही, लेकिन उनकी हिम्मत और आज़ादी की जद्दोजहद इतिहास का अहम हिस्सा बन गई।

बादशाह बनने के बाद उन्होंने अपने क़ाबिल सिपहसालार मिर्ज़ा नजफ़ ख़ां की मदद से मुग़ल फ़ौज को दोबारा संगठित किया। फ़ौज में अनुशासन और व्यवस्था लाने की उनकी कोशिशों की वजह से उन्हें मुग़ल सल्तनत के आख़िरी असरदार बादशाहों में गिना जाता है। उस दौर में जब सल्तनत चारों तरफ़ से कमज़ोर पड़ रही थी, शाह आलम ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की।

ज़िंदगी ने शाह आलम सानी का कई बार इम्तिहान लिया। अफ़ग़ानों के साथ संघर्ष के दौरान उन्हें ऐसी त्रासदी का सामना करना पड़ा जिसने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी। युद्ध के दौरान उन्हें क़ैद कर लिया गया और उनकी आंखों की रोशनी छीन ली गई। एक बादशाह के लिए इससे बड़ा दर्द शायद ही कोई हो सकता था। लेकिन इस अंधेरे ने उनके हौसले को कमज़ोर नहीं किया। उन्होंने अपने इल्मी और अदबी सफ़र को जारी रखा और अपने जज़्बात को शायरी में ढालते रहे।

शाह आलम सानी का उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों में दीवान मौजूद है। उनकी शायरी में इश्क़, हिज्र, वफ़ा, तन्हाई, बेबसी और इंसानी एहसासात का बेहद ख़ूबसूरत इज़हार मिलता है। उनका कलाम बनावटी अल्फ़ाज़ से दूर और दिल की सच्ची कैफ़ियत से भरपूर है।

  घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया,
जी सीने से निकल गया, दिल हाथ से गया।

इस शे’र में जुदाई का दर्द और मोहब्बत की तड़प बड़ी सादगी से बयान हुई है।

कल का वादा न करो, दिल मिरा बेकल न करो,
कल पड़ेगी न मुझे, मुझसे ये कल-कल न करो।

यह शे’र इंसानी बेचैनी और वक़्त की नापायदारी को बेहद ख़ूबसूरती से पेश करता है।

आज़िज़ हूं तेरे हाथ से, क्या काम करूं मैं,
कर चाक गरेबां, तुझे बदनाम करूं मैं।

इन अशआर से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि शाह आलम सानी की शायरी में सिर्फ़ इश्क़ ही नहीं, बल्कि दर्द, सब्र और ज़िंदगी के तजुर्बात भी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद हैं।

शाह आलम सानी की शख़्सियत इस बात का सबूत है कि एक बादशाह की असली पहचान सिर्फ़ उसकी सल्तनत या ताज से नहीं होती, बल्कि उसके इल्म, फ़िक्र और अदबी विरासत से भी होती है। उन्होंने ऐसे दौर में शायरी की, जब मुग़ल सल्तनत अपने आख़िरी दिनों में थी, लेकिन उनके कलाम में मायूसी के बजाय जज़्बात की सच्चाई और इंसानी एहसास की गर्मी नज़र आती है।

आज भी शाह आलम सानी ‘आफ़ताब’ का नाम उर्दू अदब और मुग़ल इतिहास में बड़े एहतराम से लिया जाता है। वे उन शायर-बादशाहों में शुमार हैं जिन्होंने तख़्त और ताज के साथ-साथ अपने कलाम से भी इतिहास में अमिट पहचान बनाई। उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब के क़द्रदानों के दिलों को उसी तरह छूती है, जैसे अपने दौर में छुआ करती थी।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

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