उर्दू अदब और सूफ़ी शायरी की दुनिया में औघट शाह ‘वारसी’ का नाम बड़ी इज़्ज़त और अक़ीदत के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए मोहब्बत, इश्क़-ए-हक़ीक़ी, इंसानियत और रूहानियत का ऐसा पैग़ाम दिया, जो आज भी लोगों के दिलों को छूता है।
औघट शाह ‘वारसी’ की पैदाइश 8 मुहर्रम 1291 हिजरी को उत्तर प्रदेश के बछरायूं (ज़िला मुरादाबाद) के एक सम्मानित चौधरी परिवार में हुयी। उनके वालिद का नाम शाह शम्सुद्दीन चिश्ती साबरी था। बचपन में उनका नाम बदरुद्दीन रखा गया, जबकि तारीखी नाम असगर था। अफ़सोस की बात है कि बहुत कम उम्र में ही उनके माता-पिता का इंतिकाल हो गया, लेकिन उनके वालिद ने अपनी वसीयत में उन्हें मशहूर सूफ़ी संत हाजी सय्यद वारिस अली शाह से बैअत (आध्यात्मिक मार्गदर्शन) लेने की हिदायत दी थी।
वालिद की वसीयत पर अमल करते हुए वे देवा शरीफ़ पहुंचे और हज़रत वारिस अली शाह के मुरीद बन गए। अपने पीर की सोहबत, तवज्जोह और रहनुमाई में उन्होंने रूहानियत की ऊंची मंज़िलें हासिल कीं। बाद में पीर के हुक्म से उनका नाम बदरुद्दीन से बदलकर औघट शाह रखा गया। इसके बाद उन्होंने फ़क़ीरी की राह अपनाई और अपने वालिद के मज़ार की ख़िदमत में लग गए। वहीं से उनकी आध्यात्मिक और अदबी ज़िंदगी का नया सफ़र शुरू हुआ।
औघट शाह ‘वारसी’ को अपने पीर से बेहद मोहब्बत थी। वे अक्सर सूफ़ियाना कलाम सुनाया करते थे। इसी इश्क़ और रूहानी कैफ़ियत ने उन्हें शायरी की ओर भी आकर्षित किया। धीरे-धीरे वे वारसिया सिलसिले के प्रमुख शायरों में गिने जाने लगे। मशहूर आलिम और लेखक शैदा ‘वारसी’ ने भी उन्हें हज़रत वारिस अली शाह के ख़ास शायरों में शामिल किया है।
उनका काव्य-संग्रह “फ़ैज़ान-ए-वारसी” के नाम से प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी ग़ज़लें, सूफ़ियाना अशआर और रूहानी पैग़ाम शामिल हैं। उनकी शायरी में इश्क़ सिर्फ़ किसी इंसान से नहीं, बल्कि ख़ुदा से मिलने का रास्ता बन जाता है। उनके अशआर सादगी, गहराई और आध्यात्मिक सोच का बेहतरीन नमूना हैं।
“एक ख़ुश-रू से मोहब्बत हो गई,
दिल-लगी की अच्छी सूरत हो गई।”
यह शेर मोहब्बत की मासूमियत और उसके ख़ूबसूरत एहसास को बयां करता है।
“रहे यार आंखों में हसरत यही है,
हमारी नमाज़ और इबादत यही है।”
औघट शाह ‘वारसी’ की शायरी में इश्क़, सब्र, इंसानियत और ख़ुदा से क़रीबी का पैग़ाम मिलता है। उनकी रचनाएं यह बताती हैं कि सच्चा इश्क़ इंसान को बेहतर इंसान बनाता है और उसे रूहानी सुकून की ओर ले जाता है।
“दया बराबर धर्म नहीं, प्रपंच बराबर पाप,
प्रेम बराबर जोग नहीं, गुरु-मंत्र बराबर जाप।”
औघट शाह ‘वारसी’ का विसाल 1372 हिजरी में पटना में हुआ। बाद में उनकी तज्हीज़ और तदफ़ीन बछरायूं में की गई। आज भी उनकी ख़ानकाह बछरायूं में मौजूद है, जहां हर साल उनका उर्स बड़ी अकीदत और शानो-शौकत के साथ मनाया जाता है। दूर-दूर से अकीदतमंद वहां पहुंचकर उनकी याद में फ़ातिहा पढ़ते हैं और उनके सूफ़ियाना पैग़ाम को याद करते हैं।
औघट शाह ‘वारसी’ की शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का संग्रह नहीं, बल्कि मोहब्बत, इंसानियत, भाईचारे और रूहानियत का ऐसा ख़ज़ाना है, जो हर दौर में लोगों को सच्चे इश्क़ और अच्छे इंसान बनने की प्रेरणा देता रहेगा।
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