जब भी बिहार के नालंदा का ज़िक्र होता है, तो सबसे पहले प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय और भगवान बुद्ध की विरासत याद आती है। लेकिन इसी ऐतिहासिक ज़मीन पर एक ऐसी जगह भी है, जहां मिट्टी से सिर्फ़ मूर्तियां ही नहीं बनती, बल्कि महिलाओं की ज़िंदगी भी नए सिरे से संवरती है। ये जगह है ‘शिल्प ग्राम’, जहां ग्रामीण महिलाएं अपने हुनर के दम पर रोज़गार कमा रही हैं और आत्मनिर्भर बनने की मिसाल पेश कर रही हैं।
मिट्टी को देती हैं ख़ूबसूरत शक्ल
हर सुबह आसपास के गांवों से कई महिलाएं शिल्प ग्राम पहुंचती हैं। यहां वो मिट्टी, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस और दूसरी चीज़ों की मदद से भगवान बुद्ध, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और दूसरे देवी-देवताओं की ख़ूबसूरत प्रतिमाएं तैयार करती हैं। एक मूर्ति को बनाने में काफ़ी मेहनत लगती है। पहले उसे सांचे में ढाला जाता है, फिर बारीकी से तराशा जाता है। इसके बाद रंगों और सजावट के ज़रिए उसे अंतिम रूप दिया जाता है। हर प्रतिमा में कारीगरों की मेहनत और उनकी बारीक नज़र साफ़ दिखाई देती है।

आठ साल से हुनर को बना रखा है सहारा
शिल्प ग्राम में काम करने वाली पिंकी देवी कहती हैं कि वो पिछले आठ साल से इस काम से जुड़ी हैं। शुरुआत में ये सिर्फ़ रोज़ी-रोटी का ज़रिया था, लेकिन आज यही काम उनकी पहचान बन चुका है। उनकी तरह कई दूसरी महिलाएं भी अब अपने घर की आमदनी बढ़ाने में अहम किरदार निभा रही हैं। इस काम ने उन्हें आर्थिक मज़बूती के साथ-साथ अपना फ़ैसला ख़ुद लेने का हौसला भी दिया है।
देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच रही है पहचान
शिल्प ग्राम में हर तरह के ख़रीदार का ख़याल रखा जाता है। यहां छोटी प्रतिमाएं 30 रुपये से मिल जाती हैं, जबकि बड़ी और ज़्यादा बारीकी से तैयार की गई मूर्तियां 500 रुपये या उससे ज़्यादा क़ीमत में भी बिकती हैं। अगर किसी को अपनी पसंद के मुताबिक़ ख़ास डिज़ाइन या अलग आकार की मूर्ति चाहिए, तो यहां ऑर्डर पर भी उसे तैयार किया जाता है।
नालंदा घूमने आने वाले देश और विदेश के सैलानी जब प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय और ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल देखने आते हैं, तो शिल्प ग्राम भी ज़रूर जाते हैं। यहां बनी प्रतिमाएं उन्हें इतनी पसंद आती हैं कि वो उन्हें यादगार के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं। यही वजह है कि यहां की मूर्तियां अब सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के कई राज्यों और विदेशों तक भी पहुंच रही हैं।

‘वोकल फ़ॉर लोकल’ की ज़िंदा मिसाल
आज जब ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ और आत्मनिर्भर भारत की बात होती है, तो नालंदा का शिल्प ग्राम उसकी एक बेहतरीन तस्वीर पेश करता है। यहां किसी बड़ी मशीन से ज़्यादा अहमियत इंसानी हाथों के हुनर की है। इन महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अगर मौक़ा और भरोसा मिले, तो गांव की कारीगरी भी दुनिया भर में अपनी पहचान बना सकती है।
शिल्प ग्राम की असली ताक़त यहां की महिलाएं हैं। वो सिर्फ़ मिट्टी को आकार नहीं देती, बल्कि अपने परिवार के बेहतर मुस्तक़बिल की भी बुनियाद रखती है। आज ये जगह सिर्फ़ एक शिल्प केंद्र नहीं, बल्कि महिलाओं की मेहनत, हुनर और ख़ुदमुख़्तारी की ऐसी दास्तान बन चुकी है, जो बताती है कि छोटे गांवों से निकले हाथ भी पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं।
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