Tuesday, July 7, 2026
37.4 C
Delhi

जिसकी आवाज़ महफ़िलों पर राज करती थी, वही Rasoolan Bai आख़िर में गुमनाम हो गईं

आज की पीढ़ी ने Rasoolan Bai (रसूलन बाई) का नाम शायद पहली बार संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज़ ‘हीरामंडी’ के ज़रिए सुना होगा। सीरीज़ का गाना ‘फूल गेंदवा न मारो’ सुनकर बहुत से लोगों ने इसकी धुन और बोल की तारीफ़ की। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि ये हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूज़िक की एक पुरानी ठुमरी है, जिसकी सबसे पुरानी रिकॉर्डिंग साल 1935 में Rasoolan Bai (रसूलन बाई) ने गाई थी। अपनी आवाज़, अदायगी और जज़्बात से उन्होंने ठुमरी को ऐसी पहचान दी, जो आज भी संगीत की दुनिया में ज़िंदा है।

बचपन से ही संगीत का हुनर

Rasoolan Bai (रसूलन बाई) की पैदाइश साल 1902 में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर ज़िले में हुई थी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन संगीत उनके ख़ून में था। उनकी मां अदालत बाई खुद भी गायिका थी और उन्होंने ही रसूलन को संगीत की पहली तालीम दी। बचपन से ही Rasoolan Bai (रसूलन बाई) की दिलचस्पी संगीत में थी। उन्होंने आशिक ख़ान और नज्जू ख़ान जैसे उस्तादों से सारंगी और शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में शंभू ख़ान से भी तालीम ली। धीरे-धीरे उन्होंने ठुमरी, दादरा, टप्पा और कजरी जैसी गायकी में ऐसी महारत हासिल की कि लोग उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से आने लगे।

आवाज़ नहीं, जज़्बात गाती थी रसूलन बाई

Rasoolan Bai (रसूलन बाई) की सबसे बड़ी ख़ासियत उनकी आवाज़ का दर्द था। वो ‘बोल बनाव’ अंदाज़ में ठुमरी गाती थी। इस अंदाज़ में सिर्फ़ सुर नहीं, बल्कि हर लफ़्ज़ का एहसास भी उतनी ही अहमियत रखता है। उनकी ठुमरियों में मोहब्बत, इंतज़ार, जुदाई और अधूरी चाहत की ऐसी कैफ़ियत होती थी कि सुनने वाला ख़ुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करने लगता था। यही वजह है कि उनकी गायकी आज भी संगीत सीखने वालों के लिए एक मिसाल मानी जाती है।

बनारस घराने की बड़ी पहचान

Rasoolan Bai (रसूलन बाई) का नाम बनारस घराने की सबसे अहम ठुमरी गायिकाओं में लिया जाता है। उन्होंने सिर्फ़ ठुमरी ही नहीं, बल्कि दादरा, टप्पा और लोकगीत भी पूरे हुनर के साथ गाए। उनके दौर की मशहूर गायिका सिद्धेश्वरी देवी के साथ उनका नाम हमेशा इज़्ज़त से लिया जाता है। बाद में गिरिजा देवी जैसी कलाकारों ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

एक दौर था, जब ठुमरी की महफिलें तवायफों के कोठे में सजती थी। वहीं से इस फ़न को पहचान मिली। लेकिन वक्त के साथ समाज की सोच बदलने लगी। आज़ादी के बाद तवायफ संस्कृति को अच्छी नज़र से नहीं देखा गया। कई कोठे बंद हो गए और इस फ़न से जुड़ी कई कलाकारों का काम भी छिन गया। ठुमरी जैसी खूबसूरत गायकी भी धीरे-धीरे हाशिए पर जाने लगी।

ऑल इंडिया रेडियो तक पहुंचना भी आसान नहीं था

उस दौर में ऑल इंडिया रेडियो पर गाने के लिए महिला कलाकारों को शादी का सबूत देना पड़ता था। कई गायिकाओं ने इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक Rasoolan Bai (रसूलन बाई) ने ये औपचारिकता पूरी की। इसी वजह से उनकी कई रिकॉर्डिंग आज भी मौजूद हैं। अगर उस वक्त उनकी आवाज़ रिकॉर्ड न हुई होती, तो शायद आज हम सिर्फ़ उनके बारे में पढ़ते, उन्हें सुन नहीं पाते।

ज़िंदगी ने कई इम्तिहान लिए

साल 1948 में Rasoolan Bai (रसूलन बाई) ने मुजरा करना छोड़ दिया। उसी साल उन्होंने बनारस की रेशमी साड़ी के कारोबारी सुलेमान से निकाह किया। उनके एक बेटे वज़ीर हुए। कुछ साल बाद उनके शौहर और बेटा पाकिस्तान चले गए, जबकि रसूलन बाई अहमदाबाद में रहने लगी। इसी दौरान उन्हें 1957 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। उसके बाद वो इलाहाबाद लौट आईं और बेहद तंगी में ज़िंदगी गुज़़ारने लगी। कहा जाता है कि गुज़ारे के लिए उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद के बाहर एक छोटा-सा ठेला भी लगाया।

इसी तर्ज पर साल 2009 में सबा दिवान के निर्देशन में बनी शॉर्ट फ़िल्म The others song के ज़रिए रसूलन बाई के जीवन की दास्तां को बखूबी दर्शाया गया है, जिसमें उन हर पहलुओं को उजागर किया गया जिसे समाज ने उस समय तवायफ़ से नाम से ढकने-तोपने की कोशिश की थी| साथ ही, इस फिल्म के ज़रिए उत्तर भारत में तवायफ़ की परंपरा के इतिहास को भी अच्छी तरह समझा जा सकता है|

Rasoolan Bai (रसूलन बाई) सिर्फ़ एक गायिका नहीं, एक विरासत हैं

15 दिसंबर 1974 को Rasoolan Bai (रसूलन बाई) ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने अपने आख़िरी दिन मुफ़लिसी में गुज़ारे, लेकिन उनकी फ़नकारी कभी छोटी नहीं हुई। आज जब ‘हीरामंडी’ में ‘फूल गेंदवा न मारो’ फिर से सुनाई देता है, तो ये सिर्फ़ एक पुराने गीत की वापसी नहीं है। ये उस महान फ़नकार को सलाम है, जिसने अपनी आवाज़ से ठुमरी को ऐसी पहचान दी, जो आज भी बरकरार है। रसूलन बाई की गायकी हमें याद दिलाती है कि असली फ़न कभी पुराना नहीं होता, वो हर दौर में नए दिलों तक अपना रास्ता बना ही लेता है।

ये भी पढ़ें: बेगम रुक़ैया सख़ावत हुसैन: मुस्लिम महिलाओं के लिए स्कूल खोलने वाली महिला

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हिमायत अली शायर: जिनकी कलम ने मोहब्बत और वतन दोनों को आवाज़ दी

उर्दू अदब की दुनिया में पहचान सिर्फ़ उनके अशआर...

प्राचीन प्रम्बानन मंदिर: PM मोदी की इंडोनेशिया यात्रा का ऐतिहासिक पहलू

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क़ाफ़िला इंडोनेशिया पहुंचा, तो...

दिलावर फ़िगार: हंसते-हंसाते समाज का आईना दिखाने वाले शायर 

उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने लोगों...

जीलानी बानो: हैदराबाद की रूह को क़लम में उतारने वाली अफ़सानानिगार

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते...

Topics

हिमायत अली शायर: जिनकी कलम ने मोहब्बत और वतन दोनों को आवाज़ दी

उर्दू अदब की दुनिया में पहचान सिर्फ़ उनके अशआर...

प्राचीन प्रम्बानन मंदिर: PM मोदी की इंडोनेशिया यात्रा का ऐतिहासिक पहलू

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क़ाफ़िला इंडोनेशिया पहुंचा, तो...

दिलावर फ़िगार: हंसते-हंसाते समाज का आईना दिखाने वाले शायर 

उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने लोगों...

गांव की चौखट से GI टैग तक: बिहार की पिड़िया कला की नई उड़ान

जब भी बिहार की लोककलाओं की बात होती है,...

जदीद उर्दू फ़िक्शन का बादशाह: मुंशी प्रेमचंद की क़लम जिसने समाज का आईना दिखाया

"बेहतरीन अफ़साना वही है जिसकी बुनियाद इंसानी नफ़्सियात पर...

Related Articles

Popular Categories