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ईरान से भदोही तक: कालीन (Carpet) के धागों में बुनी एक ख़ानदानी दास्तान

“कालीन (Carpet) बनाना हमारा ख़ानदानी काम है। हमारे बाप-दादा यही काम करते थे।” मोहम्मद हयात जब ये बात कहते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे उनके अल्फाज़ में कई पीढ़ियों की मेहनत और यादें छुपी हों। उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िले से ताल्लुक़ रखने वाले मोहम्मद हयात सिर्फ़ कालीन (Carpet) नहीं बनाते, बल्कि अपने हाथों से एक पुरानी विरासत को ज़िंदा रखते हैं।

भदोही का नाम आज पूरी दुनिया में “कालीन नगरी” के तौर पर मशहूर है। यहां के कालीन बड़े-बड़े घरों, होटलों और विदेशों तक पहुंचते हैं। लेकिन इन ख़ूबसूरत कालीनों के पीछे कितनी मेहनत, कितना सब्र और कितनी कहानियां होती हैं, ये बहुत कम लोग जानते हैं।

ईरान से भदोही तक पहुंचा कालीन का हुनर

मोहम्मद हयात ने DNN24 को बताया कि कालीन (Carpet) का असली काम ईरान से हिंदुस्तान आया। मुग़लों के दौर में जब बाबर हिंदुस्तान आया, तब उसके साथ कई कारोबारी और कारीगर भी आए थे। बाद में वक़्त बदला, बादशाह बदले, लेकिन ये लोग यहीं बस गए।

शेरशाह सूरी के वक़्त जब हुमायूं को हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा, तब भी कालीन (Carpet) का कारोबार करने वाले लोग हिंदुस्तान में रह गए। बनारस के राजा ने उन्हें ज़मीन दी और भदोही में बसाया। उसी दौर से ये काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। मोहम्मद हयात कहते हैं, “हमारे लिए कालीन (Carpet) सिर्फ़ कारोबार नहीं, हमारी पहचान है।”

छोटी उंगलियों से शुरू हुआ सफ़र

मोहम्मद हयात बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि स्कूल से आने के बाद वो अपने चाचा के साथ बैठ जाया करते थे। वहीं उन्होंने पहली बार धागों को बुनना सीखा। छोटी-छोटी उंगलियों से तानियों के बीच धागे डालना आसान नहीं था, लेकिन यही उनका बचपन था। उन्होंने कहा कि पहले हर काम हाथों से होता था। लकड़ी का लूम, लोहे के औजार और घंटों की मेहनत। एक-एक गांठ बांधकर कालीन (Carpet) तैयार किया जाता था। आज मशीनें आ गई हैं, लेकिन हाथों की वो सफाई और बारीकी आज भी मशीनें नहीं ला सकती।

रंगों की अपनी एक दुनिया

कालीन (Carpet) सिर्फ़ धागों से नहीं बनता, उसमें रंगों की भी एक पूरी दुनिया होती है। पहले बड़े-बड़े तांबे के देग में रंग पकाए जाते थे। चूल्हों पर धागों को रंगना भी एक हुनर था। मोहम्मद हयात बताते हैं कि कोई भी रंग आसानी से नहीं बनता। जैसे मेरून रंग बनाने के लिए सिर्फ़ मेरून रंग डाल देना काफी नहीं होता। कई रंगों को मिलाकर सही शेड तैयार किया जाता है। तभी जाकर ख़ूबसूरत रंग निकलता है। आज बड़े डाई हाउस और मशीनें आ गई हैं, लेकिन पुराने वक़्त की मेहनत और सब्र की बात ही कुछ और थी।

वक़्त बदला, काम का तरीका भी बदला

पहले सिर्फ़ हैंड-नॉटेड कालीन (Carpet) बनते थे। वो भारी होते थे और उन्हें बनाने में बहुत वक़्त लगता था। अब हैंड-टफ्टेड और हल्के कारपेट भी बनने लगे हैं। डिज़ाइन भी बदल गए हैं। पहले चाकू को पत्थर पर घिसकर तेज किया जाता था। जिसके ज़रिए हर एक धागे को कांटा जाता था। धागे चरखों पर बनाए जाते थे, आज मशीनों पर बनाए जाते हैं। गर्मियों में कारीगर पसीने में भीग जाते थे।

आज एसी, कूलर और नए औजारों ने काम कुछ आसान कर दिया है। लेकिन मेहनत आज भी उतनी ही लगती है। एक अच्छा कालीन (Carpet) बनाने में कई महीने और कभी-कभी साल भी लग जाते हैं। कुछ कालीन (Carpet) ऐसे भी हुए हैं जिन्हें पूरा करते-करते कारीगर की पूरी उम्र गुज़र गई।

भदोही: जहां हर घर का रिश्ता कालीन से है

भदोही और मिर्ज़ापुर को भारत का सबसे बड़ा कालीन (Carpet) हब माना जाता है। जैसे बनारस की साड़ियां फेमस हैं, उसी तरह भदोही की कालीन (Carpet) मशहूर है। यहां लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी इसी काम से चलती है। मोहम्मद हयात बताते हैं कि करीब 18 लाख लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि यहां हर मज़हब और हर जाति के लोग मिल-जुलकर काम करते हैं। यही भदोही की असली पहचान है।

यहां के कालीन (Carpet) सिर्फ़ भारत में नहीं, बल्कि विदेशों में भी पसंद किए जाते हैं। जब तक हम ज़िंदा है तब तक कार्पेट रहेगा। वो कहते हैं कि पहले ट्रेडिशनल डिज़ाइन चलते थे, उसके बाद कुछ मॉडर्न डिज़ाइन आ गए। उनमें ग्राफ़िक्स और ज्योमेट्रिक डिज़ाइन हैं, लेकिन कस्टमर फिर से 10 साल पहले के डिज़ाइन मांगते हैं। जिस तरह कपड़ों के साथ पुराना फ़ैशन वापस लौट आता है।

आजकल मैन्युफैक्चरर कारीगरों को डिज़ाइन और मटेरियल दे देते हैं। कारीगर अपने घरों में काम करके तैयार कालीन वापस लाते हैं। फिर उसकी फिनिशिंग और बाइंडिंग करके बाज़ार में बेचा जाता है। “हमारे पुराने ग्राहक राजस्थान के अलवर में थे। उन्होंने एक बार कालीन देखकर कहा कि अगर डिज़ाइन में थोड़ा बदलाव हो जाए तो ज़्यादा बेहतर लगेगा। हमने वैसा किया और सच में कालीन ज़्यादा ख़ूबसूरत लगा।” दिल्ली के ग्राहकों का टेस्ट अलग होता है। उन्हें हल्के रंग ज़्यादा पसंद आते हैं। वहां लोग डिज़ाइन और रंगों पर बहुत बारीकी से राय देते हैं।

सिर्फ़ कालीन नहीं, एक ज़िंदा विरासत

मोहम्मद हयात के लिए कालीन सिर्फ़ एक सामान नहीं है। ये उनके पुरख़ों की निशानी है, उनकी मेहनत है, उनकी ज़िंदगी है। जब वो कहते हैं, “जब तक हम लोग हैं, तब तक कालीन रहेगा,” तो ये सिर्फ़ एक बात नहीं लगती, बल्कि एक पूरी विरासत की आवाज़ सुनाई देती है। भदोही के कालीन सिर्फ़ ज़मीन पर बिछने वाली चीज़ नहीं हैं। उनमें कारीगरों की मेहनत, उनका सब्र, उनकी मोहब्बत और सदियों पुरानी कहानी बुनी हुई है।

ये भी पढ़ें: मोहनजोदड़ो से मुगल दरबार तक: कैसे बदली Zari-Zardozi की कहानी? भोपाल के सुनहरे धागों में बसती नवाबी कला

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