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अब्दुल बारी आसी: दर्द को अल्फ़ाज़ और मोहब्बत को आवाज़ देने वाले शायर

“अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को,
मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूं मैं।”

अब्दुल बारी आसी

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ अशआर ऐसे होते हैं, जो सीधे दिल में उतर जाते हैं। अब्दुल बारी आसी का यह शेर भी उन्हीं में से एक है। उनकी शायरी में दर्द भी है, मोहब्बत भी, तजुर्बा भी और ज़िंदगी की सच्चाइयों का एहसास भी। आसी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक आलिम, अनुवादक, उपन्यासकार और क्लासिकी अदब के बेहतरीन तबसीरा निग़ार भी थे।

अब्दुल बारी आसी की पैदाइश साल 1893 में मेरठ में हुयी। उनका घराना अदब और शायरी से जुड़ा हुआ था। उनके वालिद शेख़ हसामुद्दीन, मिर्ज़ा ग़ालिब के शागिर्द थे और खुद भी अच्छे शायर माने जाते थे। यही वजह थी कि बचपन से ही घर का माहौल इल्म और शायरी से भरा हुआ था।

आसी ने अरबी और फ़ारसी की तालीम हासिल की। उस दौर में फ़ारसी भाषा को इल्म और अदब की ज़बान माना जाता था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शाहजहांपुर के एक स्कूल में फ़ारसी शिक्षक के तौर पर काम किया। कुछ समय तक वह मोहम्मद अली जौहर के मशहूर अख़बार “हमदर्द” से भी जुड़े रहे। इसके बाद उनकी ज़िंदगी का एक अहम दौर तब शुरू हुआ, जब वह लखनऊ के मशहूर नवल किशोर प्रेस से वाबस्ता हुए।

नवल किशोर प्रेस उस दौर में उर्दू और फ़ारसी किताबों का बहुत बड़ा मरकज़ था। यहां रहते हुए आसी को क्लासिकी अदब को गहराई से पढ़ने और समझने का मौक़ा मिला। यही वजह है कि उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब और हाफ़िज़ शीराज़ी के कलाम की शानदार व्याख़्या की। उनके ये इल्मी काम आज भी उर्दू अदब में अहम माने जाते हैं।

आसी की तबीअत शुरू से ही शायरी की तरफ़ माइल थी। उन्होंने शुरुआत में मौलाना सिराज अहमद सिराज से इस्लाह ली। बाद में मशहूर शायर नातिक़ गुलावठी के शागिर्द बन गए। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कुछ ग़ज़लें दाग़ देहलवी को भी दिखाईं। यह बात बताती है कि आसी ने उर्दू शायरी की बड़ी रिवायतों से सीख हासिल की थी।

अब्दुल बारी आसी की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सादगी है। उनके अशआर मुश्किल अल्फ़ाज़ से भरे हुए नहीं होते, बल्कि सीधे दिल पर असर करते हैं। उनके यहां मोहब्बत भी है, तन्हाई भी, उम्मीद भी और इंसानी जज़्बात की गहराई भी।

“कहते हैं कि उम्मीद पे जीता है ज़माना,
वो क्या करे जिस को कोई उम्मीद नहीं हो।”

अब्दुल बारी आसी

इस शेर में इंसान की मायूसी और टूटते हुए हौसले की तस्वीर दिखाई देती है। यही वजह है कि आसी के अशआर हर दौर के लोगों को अपने क़रीब महसूस होते हैं। उसमें अपनापन शामिल होता है।

“सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन,
होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ।”

अब्दुल बारी आसी

यह शेर मोहब्बत की उस कैफ़ियत को बयान करता है, जहां इंसान खुद को संभालने की कोशिश तो करता है, लेकिन महबूब की आवाज़ सुनते ही सारे सब्र टूट जाते हैं।

आसी की शायरी सिर्फ़ इश्क़ तक महदूद नहीं थी। उन्होंने रिश्तों, समाज और इंसानी एहसासात को भी बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया।

“इश्क़ पाबंद-ए-वफ़ा है न कि पाबंद-ए-रुसूम,
सर झुकाने को नहीं कहते हैं सज्दा करना।”

अब्दुल बारी आसी

इस शेर में मोहब्बत की असली रूह को बयान किया गया है। आसी बताते हैं कि इश्क़ सिर्फ़ रस्मों का नाम नहीं, बल्कि वफ़ादारी और सच्चे जज़्बात का रिश्ता है।

“जहां अपना क़िस्सा सुनाना पड़ा,
वहीं हम को रोना रुलाना पड़ा।”

अब्दुल बारी आसी

अब्दुल बारी आसी की शख़्सियत कई रंगों से बनी हुई थी। वह शायर भी थे, आलिम, अनुवादक और आलोचक भी। उन्होंने उर्दू अदब को सिर्फ़ खूबसूरत शेर ही नहीं दिए, बल्कि क्लासिकी शायरी को समझने और आगे बढ़ाने में भी अहम किरदार अदा किया।

आज भी जब उर्दू शायरी की महफ़िल सजती है, तो आसी के अशआर लोगों के दिलों में वही असर पैदा करते हैं, जो बरसों पहले किया करते थे। उनकी शायरी हमें यह एहसास दिलाती है कि सादगी में भी गहरी बात कही जा सकती है और दर्द को भी ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ पहनाए जा सकते हैं।

ये भी पढ़ें: वहीद जहां बेग़म: तालीम के ज़रिए समाज बदलने वाली शख़्सियत

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