मूर्तिकला भारत की उन प्राचीन कलाओं में से एक है, जिसमें आस्था, संस्कृति और श्रम तीनों का संगम दिखाई देता है। ये कला सिर्फ़ पत्थर या लकड़ी को आकार देने का जरिया नहीं, बल्कि भावनाओं और भरोसे को जीवंत रूप देने की प्रक्रिया है। बिहार के गया ज़िले के रहने वाले बबलू कुमार ने इसी कला को अपनी पहचान बनाया है। पिछले दस वर्षों से लकड़ी पर अपनी मेहनत और हुनर से मूर्तियां गढ़ रहे बबलू कुमार की कहानी आज उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो परंपरागत कला को रोज़गार और सम्मान का ज़रिया बनाना चाहते हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं डीएनएन 24 पर लकड़ी की मूर्ति बनाने का काम करने वाले बबलू कुमार से। इसके साथ ही जानेंगे मूर्तिकला के इतिहास के बारे में ।
मूर्तिकला: भारत की प्राचीन और जीवंत कला
मूर्तिकला भारत की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक मानी जाती है। ये कला सिर्फ़ पत्थर या लकड़ी को आकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था, संस्कृति और भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। सदियों से मूर्तिकला ने भारतीय सभ्यता की पहचान को जीवित रखा है।
सपनों से शिल्प तक: बबलू कुमार का 10 साल का सफ़र
दस साल पहले सपनों की एक छोटी-सी गठरी लेकर निकले बबलू कुमार आज अपने हुनर के दम पर बिहार और देश के कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उनका सफ़र यह बताता है कि अगर मेहनत और हौसला साथ हों, तो कला भी रोज़गार और पहचान दोनों दिला सकती है। आज हम गया के मूर्तिकार बबलू कुमार की इसी प्रेरक कहानी से रूबरू करा रहे हैं।
बड़े भाई से सीखी मूर्तिकला
बिहार के गया ज़िले के रहने वाले बबलू कुमार पिछले 10 सालों से लकड़ी की मूर्तियां बना रहे हैं। उन्होंने मूर्तिकला की बारीकियां अपने बड़े भाई से सीखीं। परिवार से मिली इस कला को उन्होंने लगातार अभ्यास और अनुभव से और निखारा।
लकड़ी पर उकेरते हैं आस्था की आकृतियां
बबलू कुमार अपने अब तक के सफ़र में कई देवी-देवताओं और धार्मिक संरचनाओं को लकड़ी पर उकेर चुके हैं। वे शिव जी, गणेश जी, हनुमान जी, भगवान बुद्ध और महाबुद्ध टेंपल जैसी आकृतियां बनाते हैं। उन्होंने कई फीट ऊंची मूर्तियों का भी निर्माण किया है।
गम्हार लकड़ी से बनती हैं मूर्तियां
बबलू मूर्तियों के निर्माण में मुख्य रूप से गम्हार पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, इस लकड़ी में बेहतर फिनिशिंग आती है और यह लंबे समय तक टिकाऊ रहती है। एक सामान्य मूर्ति को तैयार करने में लगभग दो दिन का समय लगता है, जबकि बड़ी मूर्तियों में ज्यादा समय लगता है।
पीएम विश्वकर्मा योजना से मिला प्रशिक्षण और पहचान
गया निवासी बबलू कुमार को पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत 6 दिन की विशेष ट्रेनिंग दी गई। इस दौरान उन्हें मूर्तिकला से जुड़ी तकनीकी और कलात्मक जानकारी दी गई। योजना के अंतर्गत उन्हें टूल किट भी प्रदान की गई। बबलू बताते हैं कि इस योजना के माध्यम से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला दिखाने का मंच मिला है।
ग्राहकों की डिमांड पर तैयार होती हैं मूर्तियां
बबलू कुमार ग्राहकों की स्पेशल डिमांड के अनुसार लकड़ी की मूर्तियां बनाते हैं। वे 12 इंच से लेकर 5 फीट तक की मूर्तियों बनाते हैं। उन्होंने भगवान बुद्ध की 5 फीट ऊंची लकड़ी की मूर्ति भी तैयार की है। मूर्ति का आकार जितना बड़ा होता है, उसे बनाने में उतना ही अधिक समय लगता है-आमतौर पर 2 से 5 दिन।
मूर्ति निर्माण की लागत और मुनाफ़ा
बबलू कुमार के अनुसार, एक लकड़ी की मूर्ति बनाने में लगभग 2 हज़ार से 10 हज़ार रुपये तक की लागत आती है। यह खर्च मूर्ति के साइज, डिज़ाइन और लकड़ी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। मुनाफ़े की बात करें तो यह 1500 रुपये से लेकर 8 हज़ार रुपये तक हो सकता है।
मूर्तिकला का इतिहास: सभ्यता से आस्था तक
भारत में मूर्तिकला का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता तक जाता है, जहां से मिली मूर्तियां इसकी प्राचीनता का सबूत हैं। मौर्य, गुप्त, पाल और चोल काल में मूर्तिकला अपने चरम पर पहुंची। मंदिरों, स्तूपों और गुफाओं में बनी मूर्तियां न सिर्फ़ धार्मिक आस्था का प्रतीक रहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक सोच को भी दर्शाती हैं। आज भी यह कला परंपरा और रोज़गार के बीच एक मज़बूत सेतु बनी हुई है।
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