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Abdul Khaliq Reshi: कश्मीर के रेपोरा गांव के अंगूरों की मिठास और मेहनत की कहानी

कश्मीर की वादियों को जन्नत-ए-कश्मीर कहा जाता है। यहां की ख़ूबसूरती, हरियाली और ताज़गी पूरे देश और दुनिया को अपनी ओर खींच लेती है। सेब, अखरोट और केसर के बाग़ तो हर जगह मशहूर हैं, लेकिन इन सबके बीच एक गांव ऐसा भी है जिसने अपने रसीले अंगूरों से सबका दिल जीत लिया है। कश्मीर का गांदरबल ज़िले का रेपोरा गांव (Repora village), जिसे लोग प्यार से “Village of Grapes” कहते हैं।

यहां की हवा, धूप और मिट्टी का अपना ही जादू है। करीब 60 हेक्टेयर ज़मीन पर अंगूर की बेल लहराती हैं। जब इन बेलों पर गुच्छे के गुच्छे अंगूर झूमते हैं, तो नज़ारा किसी पेंटिंग जैसा लगता है। इन अंगूरों की ख़ासियत सिर्फ़ उनका स्वाद ही नहीं, बल्कि उनका आकार भी है। जहां दुनिया में एक अंगूर का दाना 4–5 ग्राम का होता है, वहीं रेपोरा के अंगूर 14–15 ग्राम तक पहुंच जाते हैं।

Abdul Khaliq Reshi – अंगूरों से जुड़ी एक ज़िंदगी

रेपोरा गांव (Repora village) की कहानी अधूरी है और उसमें Abdul Khaliq Reshi का ज़िक्र न हो। Abdul Khaliq लगभग 80 साल के हैं और पिछले 50 सालों से अंगूर की खेती कर रहे हैं। ये काम उन्होंने अपने पिता से सीखा और यो परंपरा उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है। DNN24 से बातचीत में वो बताते हैं कि, “ये सिर्फ़ खेती नहीं, हमारे पुरखों की निशानी है। मेरे पिता भी यही काम करते थे। पहले लकड़ी के ढांचे बनाए जाते थे, लेकिन दिसंबर की बर्फबारी में वो टूट जाते थे। हर साल मार्च में हमें नए ढांचे फिर से बनाने पड़ते थे।

लेकिन मेरे समय में बागवानी विभाग ने हमें लोहे के ढांचे दिए, जिससे काम बहुत आसान हो गया।”बागवानी विभाग ने न सिर्फ़ ढांचे दिए, बल्कि अंगूरों को सुरक्षित रखने के लिए जाल (nets) और समय-समय पर दवाइयां भी उपलब्ध कराईं। अब ये ढांचे मज़बूत और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं, जिससे किसानों को बार-बार खर्च और मेहनत नहीं करनी पड़ती।

खेत में मेहनत और परिवार का साथ

Abdul Khaliq Reshi बताते हैं कि पहले वो अकेले ही अंगूर की खेती करते थे, लेकिन अब उनका पोता भी उनके साथ जुड़ गया है। दोनों मिलकर खेत में काम करते हैं। दादा अपने हाथों में कैंची लिए हर उस दाने को हटाते हैं जो खराब हो चुका हो, ताकि बाक़ी अंगूर सलामत और ताज़ा रहें। पोता ध्यान से देखता है, सीखता है और मदद भी करता है। ये नज़ारा सिर्फ़ खेती का नहीं, बल्कि परंपरा के आगे बढ़ने का प्रतीक है।

वो कहते हैं कि, “हम यहां बेलें तैयार करते हैं और सामान्य दाम पर बेचते हैं। हमारे पास कई किस्में होती हैं, लेकिन मैंने सिर्फ़ दो किस्में ‘साहिबी और हुसैनी’ रखी हैं। ये दोनों सबसे ज़्यादा मशहूर और मीठी होती हैं।” अंगूर की पैकिंग खेत में ही की जाती है और फिर शाम को ऑटो ड्राइवर उन्हें लेकर श्रीनगर फल मंडी पहुंचा देता है। वहां से ये अंगूर पूरे देश में भेजे जाते हैं।

चुनौतियां और उम्मीदें

Abdul Khaliq Reshi के मुताबिक, अंगूरों की खेती आसान नहीं है। मौसम की मार, अचानक बारिश या बर्फबारी कई बार बड़ी परेशानी खड़ी कर देती है। वो कहते हैं कि, “सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब सारे अंगूर एक साथ पक जाते हैं। अगर उन्हें जल्दी बाज़ार नहीं भेजा गया, तो वो खराब होने लगते हैं। सरकार अगर कोल्ड स्टोरेज का इंतज़ाम करे, तो हम अंगूरों को ज़्यादा समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।

इससे किसानों को अच्छा दाम मिलेगा और बर्बादी भी रुकेगी।” उनकी आवाज़ में चिंता तो है, लेकिन उम्मीद भी झलकती है। वो आगे कहते हैं कि, “ये अंगूर सिर्फ़ हमारी फसल नहीं, हमारी ज़िंदगी हैं। सुबह से शाम तक हम इनकी सेवा करते हैं, तब जाकर ये इतने मीठे बनते हैं। हमें गर्व है कि हमारे अंगूर पूरे देश में पसंद किए जाते हैं।”

रेपोरा – मिठास और मेहनत की पहचान

रेपोरा गांव (Repora village) से हर साल 750 से 900 मीट्रिक टन अंगूर की पैदावार होती है। जबकि पूरे कश्मीर में लगभग 500 से 600 हेक्टेयर ज़मीन पर अंगूर की खेती की जाती है और 1,100 से 1,500 मीट्रिक टन तक उत्पादन होता है। यानी अकेले रेपोरा गांव (Repora village) का योगदान बहुत बड़ा है। चारों ओर फैली अंगूर की हरी-भरी बेलें, उनमें लटकते हज़ारों गुच्छे और मेहनतकश किसान, यह सब मिलकर रपोरा को खास बनाते हैं।

यहां हर दाना सिर्फ़ एक फल नहीं, बल्कि मेहनत, परंपरा और मिट्टी से मोहब्बत की पहचान है। रेपोरा गांव (Repora village) की कहानी हमें सिखाती है कि खेती सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि एक संस्कृति और ज़िंदगी जीने का तरीका है। यही वजह है कि इस गांव के अंगूर सिर्फ़ स्वाद से नहीं, बल्कि अपनी मिठास और मेहनत की कहानी से भी दिल जीत लेते हैं।

ये भी पढ़ें: झील से चटाई तक: कश्मीर की 300 साल पुरानी परंपरा है Waguv Mat, सांस्कृतिक विरासत की जीती-जागती मिसाल

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