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लवली कुमारी ने 20,000 बालिकाओं को दी नि:शुल्क मार्शल आर्ट ट्रेनिंग

बिहार के मुंगेर ज़िले की एक ऐसी बेटी, जिसने अपने हुनर और जज़्बे से हज़ारों लड़कियों की ज़िंदगी में उम्मीद की नई किरण जगाई है। बिहार के मुंगेर ज़िले के जमालपुर के नयागांव की रहने वाली लवली कुमारी आज महिला सशक्तिकरण की एक नई पहचान बन चुकी हैं। वह सेवानिवृत्त रेलकर्मी देवनारायण तांती की बेटी हैं। इतिहास विषय में स्नातक करने के बाद लवली ने यह ठान लिया कि वह बेटियों की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए कुछ बड़ा करेंगी।

साल 2016 से 2025 तक, यानी पिछले 9 वर्षों में लवली कुमारी ने बिहार के मुंगेर, पटना, सारण, जमुई, शेखपुरा और अन्य ज़िलों की करीब 20,000 छात्रों को निःशुल्क मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दी। उनका मक़सद साफ़ था—बेटियों को इस लायक बनाना कि वे किसी भी परिस्थिति में अपनी हिफ़ाज़ खुद कर सकें।

ख़ास पहल – नेत्रहीन बच्चों को ट्रेनिंग 

लवली का काम सिर्फ़ सामान्य छात्राओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पटना के कदम कुआं स्थित नेत्रहीन विद्यालय के बच्चों को भी आत्मरक्षा की कला सिखाई। यह पहल दिखाती है कि सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का हक़ हर किसी को है, चाहे वह दृष्टिबाधित क्यों न हो।

लवली कुमारी खुद ब्लैक बेल्ट धारक हैं और राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक भी जीत चुकी हैं।
उनके काम को समाज और सरकार, दोनों ने सराहा है। उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र और सम्मान पत्र मिले।
और उनके योगदान का उल्लेख लोकसभा और विधानसभा तक में हुआ।

उनके पिता देवनारायण तांती कहते हैं कि, मुझे बेहद खुशी है कि मेरी बेटी पूरे बिहार की बालिकाओं को आत्मनिर्भर और सक्षम बना रही है।

उनकी बड़ी बहन निशा कुमारी का कहना है कि, मुझे गर्व है कि मेरी बहन महिला सशक्तिकरण की दिशा में बिहार में एक बड़ा योगदान दे रही है।

लवली कुमारी मानती हैं कि सिर्फ़ सरकारी योजनाएं काफी नहीं। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि आज भी बेटियां छेड़खानी, उत्पीड़न और अपराधों का शिकार होती हैं। ऐसे में आत्मरक्षा सबसे मज़बूत हथियार है।


“लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना ही समाज को सुरक्षित बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है। बेटियों को संरक्षण नहीं, अवसर चाहिए। और जब अवसर मिलते हैं, तो वो देश का भविष्य बदल सकती हैं।”

लवली कुमारी का काम सिर्फ़ प्रशिक्षण नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। उन्होंने यह साबित किया कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो अकेला इंसान भी हज़ारों ज़िंदगियों में बदलाव ला सकता है।

आज वह बिहार की बेटियों के लिए न सिर्फ़ एक नाम हैं, बल्कि एक प्रेरणा, एक चेतना और एक उम्मीद की किरण हैं।  यह कहानी हर उस लड़की को हौसला देती है, जो डर से लड़ रही है और हर उस समाज को आईना दिखाती है, जो बेटियों की सुरक्षा को अब भी चुनौती मानता है।

ये भी पढ़ें: ख़लील-उर-रहमान आज़मी: जब एक हिंदुस्तानी शायर बना ब्रिटिश स्कॉलर का टीचर 

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