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Lucknow के पत्थरों में जिंदा है आग़ा हसन का जादू: Calligraphy का वो ‘ख़त्तात’, जिसने लफ़्जों को दी रूह

“क्या आपने कभी पत्थरों को बोलते देखा है?”

अगर नहीं, तो एक बार लखनऊ आइए… वो शहर जहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि दीवारों, गलियारों और गुंबदों पर जिंदा है। यहां की हर इमारत, हर मस्जिद, हर इमामबाड़े की दीवारों पर उकेरे गए अरबी-उर्दू के अक्षर आपसे बात करेंगे। और अगर आपकी नज़र थोड़ी पैनी हो, तो आप देख पाएंगे। उन अक्षरों के पीछे छुपे एक शख्स के हुनर को, जिसने कैलिग्राफ़ी (Calligraphy) को सिर्फ़ लिखावट नहीं, बल्कि इबादत बना दिया। नाम है-आग़ा हसन अल-ख़त्तात ।

पत्थरों पर उकेरी गई दास्तां: जब अक्षर बन गए इबादत

लखनऊ की बड़ा इमामबाड़ा हो या छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा हो या शाही मस्जिद—इनकी दीवारों पर आपको कुरान की आयतें, उर्दू शायरी और नक़्क़ाशीदार लिखावट मिलेगी। लेकिन ये सिर्फ़ लिखावट नहीं, बल्कि कैलिग्राफ़ी का वो जादू है, जिसे आग़ा हसन ने पत्थरों में उतारा।

उनकी कलम से निकला हर अक्षर एक कहानी कहता है। जब वो ‘ख़त-ए-माहीर’ (मछली जैसी शैली) में लिखते हैं, तो शब्द मछलियों की तरह तैरते नज़र आते हैं। जब ‘ख़त-ए-रिका’ में लिखते हैं, तो अरबी की झलक दिखती है। और जब 42 फीट ऊंचे पत्थर पर कुरान की आयत उकेरते हैं, तो लोग सिर झुकाकर इसे देखते हैं।

‘मशीनें दिमाग़ से चलती हैं, पर हुनर दिल से आता है…’- आग़ा हसन

जब बच्चे खिलौनों से खेलते थे, आग़ा हसन कलम से खेलते थे

आग़ा हसन की पैदाइश लखनऊ में हुआ, लेकिन उनकी कला ने उन्हें दुनिया भर में मशहूर किया। सिर्फ़ 12 साल की उम्र में, जब बच्चे गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं, आग़ा हसन ने कैलिग्राफ़ी सीखना शुरू कर दिया था। उनके उस्ताद ने कहा था—’ये बच्चा एक दिन दुनिया को चौंका देगा।’ और हुआ भी ऐसा ही।

आज वो दुनिया के इकलौते कैलिग्राफर हैं, जिन्होंने 9 नई कैलिग्राफ़ी शैलियां ईजाद कीं। उनमें से एक है- ‘ख़त-ए-माहीर’, जिसमें लिखे शब्द मछलियों की तरह लहराते दिखते हैं।

मदीना से लखनऊ तक: जब शेरेटन होटल ने दी चुनौती

आग़ा हसन सिर्फ़ लखनऊ तक सीमित नहीं रहे। उनका हुनर सऊदी अरब तक पहुंचा। मदीना के शेरेटन होटल ने उन्हें चुनौती दी—’कुछ ऐसा बनाओ, जो दुनिया ने कभी न देखा हो।’ और आग़ा साहब ने क्या किया?
उन्होंने सिर्फ़ लाइनों के ज़रिए पूरे होटल की एक ऐसी तस्वीर बनाई, जो आज भी होटल की लॉबी में लगी है। ये कलाकृति देखकर लोग दंग रह जाते हैं—क्योंकि इसमें कोई रंग नहीं, सिर्फ़ ख़तों का जादू है।

अनाज से बनी तस्वीरें: जब सऊदी राजपरिवार ने दी तारीफ़

आग़ा हसन सिर्फ़ कैलिग्राफ़ी के ही नहीं, बल्कि “फूड ग्रेन आर्ट” के भी मास्टर हैं। उन्होंने चावल, दाल और मसालों के दानों से तस्वीरें बनाईं।

एक बार उन्होंने सऊदी अरब के किंग अब्दुल अज़ीज़ की तस्वीर अनाज से बनाई। जब प्रिंस अब्दुल मजीद ने इसे देखा, तो वो इतने प्रभावित हुए कि उन्हें राजमहल बुलवाया और कहा—
“ये हुनर अल्लाह की देन है।”

भारत में भी उन्होंने अमिताभ बच्चन, सुब्रत रॉय सहारा जैसी हस्तियों की तस्वीरें अनाज से बनाईं। जब बिग बी ने पिता की तस्वीर देखी, तो मुस्कुराकर कहा—
“वाह! ये तो काफी ज़्यादा स्टाइलिश लग रहे हैं!”

कंप्यूटर के ज़माने में हाथ की लिखावट: ‘हुनर कभी मरता नहीं’

एक बार पाकिस्तान के एक कैलिग्राफ़र ने कहा- ‘अब तो कंप्यूटर आ गए हैं, हाथ से लिखने का ज़माना नहीं रहा।‘

इस पर आग़ा हसन ने जवाब दिया- ‘मशीनें दिमाग़ से चलती हैं, पर हुनर दिल से आता है।’

और ये साबित करने के लिए, उन्होंने लखनऊ के एक इमामबाड़े पर 42 फीट ऊंचे पत्थर पर कुरान की आयत लिखी। ये कलाकृति इतनी बेमिसाल है कि लोग इसे देखकर हैरान रह जाते हैं।

गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का सपना

आग़ा हसन की एक ख़्वाहिश है, उनका नाम Guinness Book Of World Records में दर्ज हो। लेकिन उनसे बड़ा रिकॉर्ड क्या हो सकता है? वो ये कि उनकी बनाई हर लकीर आज भी लखनऊ की दीवारों, मदीना के होटलों और दुनिया भर की गैलरियों में ज़िंदा है।

‘हुनर कभी मरता नहीं… बस रूप बदलता है’

अगली बार जब आप लखनऊ जाएं, तो इमामबाड़ों की दीवारों पर लिखे अक्षरों को गौर से देखिएगा। शायद आपको भी आग़ा हसन की कलम की आवाज़ सुनाई दे, जो कहती है-
‘हुनर कभी मरता नहीं… बस रूप बदलता है।’

ये कहानी है लखनऊ के पत्थरों में जिंदा कैलिग्राफ़ी की… उस उस्ताद की, जिसने अक्षरों को रूह दे दी।

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