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Chain Stitch: कश्मीर की कला को आगे बढ़ाने वाले तीसरी पीढ़ी के कलाकार Farooq Ahmed Bhat

कश्मीर एक हुनर की सरज़मीन है। यहां हर धागा, हर टांका, एक कहानी कहता है और उन कहानियों में से एक है Chain Stitch यानी सिलाई की एक ऐसी तकनीक, जिसमें हर टांका पिछले टांके से जुड़ा होता है, जैसे रिश्तों की ज़ंजीर। इसमें ‘आरी’ टूल का इस्तेमाल होता है, जो सुई और हुक का मिला-जुला रूप है। ये सिलाई की अनूठी कला सिर्फ़ धागों का जाल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बुनती चली आ रही भावनाओं, धैर्य और संस्कृतियों का संगम है।

आरी का जादू और चेन स्टिच के प्रकार

Farooq Ahmed Bhat ने DNN24 को बताया कि चेन स्टिच का इतिहास 14वीं शताब्दी से जुड़ा है, जब फ़ारसी सूफ़ी संत मीर सैय्यद अली हमदानी कश्मीर आए। उन्होंने यहां की लोक-परंपराओं को फ़ारसी शिल्पकला से आधुनिक रूप में पिरोया। धीरे-धीरे कढ़ाई की परंपराएन विकसित हुईं और चेन स्टिच जैसी तकनीकें जन्मीं, जिन्हें आज हम कश्मीर की पहचान मानते हैं।

बाद में, यहां एक एसएमएच हॉस्पिटल में एक अधिकारी थे, जिन्होंने इस कला को बहुत संजोया और आगे बढ़ाया। चेन स्टिच में ‘आरी’ नाम के एक टूल का इस्तेमाल होता है जो सुई और हुक का मिलाजुला रूप है। इस एक टूल से कलाकार कई प्रकार के पैटर्न बनाते हैं जैसे बेसिक चेन, ब्रेड चेन, केबल चेन, नोटेड, ओपन, पेटल, रोसेट, सिंगलस, ट्विस्टेड, वीट और ज़िग-ज़ैग।

फ़ारूक़ अहमद भट: तीसरी पीढ़ी के कलाकार

Farooq Ahmed Bhat, चेन स्टिच और क्रेवल आर्ट के तीसरी पीढ़ी के कलाकार हैं। उनके पिता और दादा ने इस कला को सहेजा और संभाला। करीब 70 वर्षों से ये विरासत उनके परिवार की पहचान बनी हुई है। उन्होंने बताया कि यहां जितने भी कारीगर हैं, वो पुराने, अनुभवी कारीगर हैं जो दशकों से इस काम में लगे हुए हैं। आज इस कला में नए-नए डिज़ाइन भी शामिल हो गए हैं जैसे पिकासो से प्रेरित डिज़ाइंस।

हर टांका एक विश्वास

इस कला को बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले डिज़ाइन ट्रेस किया जाता है, फिर रंगों का चयन होता है, और फिर शुरू होता है सब्र का इम्तिहान। कलाकार महीनों तक एक ही कढ़ाई में डूबा रहता है। हर चेन स्टिच के टुकड़े में सूरत का नक़्शा छिपा होता है। Farooq Ahmed Bhat बताते हैं: “यहां दो प्रकार के सूत आते हैं, जिन्हें यहीं बुना जाता है। उसके बाद ये डिज़ाइनर के पास प्रिंटिंग के लिए जाता है। फिर हम डिज़ाइनिंग करते हैं। कलर कॉम्बिनेशन कहां और कौन-सा रंग लगेगा, ये तय करते हैं। इसके बाद हम इसे कारीगरों को सौंपते हैं कि वो इस पैटर्न के अनुसार काम करें।

Farooq Ahmed Bhat आगे इस आर्ट को लेकर बताते हैं- चेन स्टिच बनाम क्रेवल आर्ट “जब Chain Stitch कपड़े पर बुनी जाती है, तो ये चेन जैसी दिखती है और कपड़े का बैकग्राउंड नज़र नहीं आता क्योंकि ये पूरी सतह को ढक देती है। वहीं Crewel आर्ट में कपड़े का बैकग्राउंड दिखाई देता है और डिज़ाइन भी अलग होते हैं।”

GI टैग: असली कढ़ाई को पहचान

उन्होंने बताया कि हाल ही में Chain Stitch को दिल्ली में GI (Geographical Indication) टैग के लिए अप्लाई किया गया था। इसका मतलब ये है कि अगर Chain Stitch को GI टैग मिलता है तो इसे मशीन से बनी कला से अलग पहचाना मिलेगी। हैंडमेड प्रोडक्ट्स की डिमांड यूरोप में बहुत ज़्यादा है, लेकिन ग्राहकों को ये नहीं पता चलता कि ये कला हाथ से बनी है या मशीन से। GI टैग से ये पहचान संभव होगी कि ये हाथ की बनी असली कढ़ाई है।

मशीन बनाम हाथ की कढ़ाई और कारीगरों की चुनौतियां

आजकल मशीन से भी Chain Stitch तैयार की जा रही है जो जल्दी बनती है और सस्ती होती है। लेकिन हाथ की कढ़ाई में कलाकार का समय, धैर्य और जुनून होता है। मशीन में सिर्फ़ पैटर्न होता है, लेकिन इंसानी हाथों में होता है हुनर का जादू। आज भी कई कारीगरों को उचित मेहनताना नहीं मिल पाता। असली मुनाफ़ा कई बार मीडिएटर या एक्सपोर्टर ले जाते हैं।

कम मज़दूरी के कारण कई कलाकारों को ये कला छोड़नी पड़ी। कुछ थैले बनाने लगे, कुछ सिलाई-कटाई में लग गए। अगर उन्हें सही दाम मिले, तो युवा भी इस विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं। सरकार ने इस दिशा में कुछ पहल की है। कई प्रशिक्षण केंद्र बनाए हैं ताकि नई पीढ़ी इस कला को सीख सकें।

Chain Stitch: कश्मीर की रूह

Chain Stitch कश्मीर की रूह है। हर टांका उस रूह की नज़्म, हर टुकड़ा रंगों की अनोखी दास्तान। कश्मीरी चेन स्टिच सिर्फ़ कपड़े पर रंगों का खेल नहीं, ये भावनाओं का समंदर है। कलाकार रंगों से न सिर्फ़ डिज़ाइन बुनते हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक ज़मीन से जुड़े अरमानों को भी सहेजते हैं। अगर कारीगरों को सही कीमत और बाज़ार तक सीधी पहुंच मिले, तो कश्मीर की Chain Stitch और तरक्की की राह में आगे बढ़ेगी।

ये भी पढ़ें: Ghulam Mohammad Beigh: कश्मीर की पारंपरिक सोज़नी और जमावार कला के संरक्षक

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